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रेल हादसा: आपदा प्रबंधन के स्वघोषित विशेषज्ञों का अज्ञान और स्थानीय लोगों का संज्ञान

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Wed, 07 Jun 2023 06:57 AM IST
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सार
ओडिशा में रेल हादसे के बाद स्थानीय लोगों ने तो तत्परता से बचाव कार्य में हाथ बंटाया, पर सुदूर बैठे स्वघोषित विशेषज्ञ अज्ञानता का परिचय देते रहे।
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odisha train accident self-proclaimed disaster management experts and local people initiative
ओडिशा रेल दुर्घटना की तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पूरे देश को दहला देने वाली तिहरी रेल दुर्घटना में मृतकों के परिवारजनों और घायल सवारियों को ओडिशा के बालासोर जिले के दुर्घटनास्थल के आसपास के स्थानीय निवासियों द्वारा स्वयं आगे बढ़कर हर संभव सहायता देना बहुत प्रशंसनीय कृत्य है। इस प्रशंसनीय प्रतिक्रिया के बरक्स दुर्घटना स्थल से सैकड़ों मील दूर बैठे स्वघोषित विशेषज्ञों की मनोवृत्ति भी कुछ सोचने को बाध्य करती है। इस भीषण दुर्घटना की खबर मिलते ही सोशल मीडिया पर बरसाती मेढ़कों की तरह से हजारों विशेषज्ञ अचानक पैदा हो गए। विविध क्षेत्रों में उनकी विशेष योग्यता चौंकाने वाली थी। इन तुरंता विद्वानों को मोटे तौर पर तीन किस्मों में बांटा जा सकता है।



पहली किस्म के लोग रेलवे व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं के स्वघोषित विशेषज्ञ हैं। उन्होंने इससे पहले कवच सुरक्षा प्रणाली का केवल नाम भर ही नहीं सुन रखा था, उन्हें यह भी मालूम है कि रेलगाड़ियों के बीच संभावित टक्कर रोकने के लिए कवच व्यवस्था नाम की सुरक्षा प्रणाली के लिए 2022 के रेल बजट में खासी बड़ी रकम का प्रावधान किया गया था। उन्हें दुख है कि अब तक रेलवे के विराट जाल के केवल पांच प्रतिशत भाग में यह प्रणाली उपलब्ध कराई जा सकी है। ये सारे विशेषज्ञ आश्वस्त हैं कि यह प्रणाली एक ऐसा ब्रह्मास्त्र या रामबाण है, जिसके सौ प्रतिशत रेलगाड़ियों में उपलब्ध कराने के बाद फिर कभी दो ट्रेनें आपस में नहीं टकरातीं। इन विशेषज्ञों को शायद यह नहीं मालूम कि आमने-सामने या आगे-पीछे एक ही पटरी पर चल रही दो ट्रेनों के इंजन में फिट किए इस कवच के पास ऐसी दो ट्रेनों की आपसी टक्कर होने के पहले लोको पाइलट को सचेत करने और इंजिन की गति पर आटोमेटिक तरीके से बेक लगाने का प्रावधान तो है, लेकिन जब सामने की मेन लाइन खाली हो और सीधी जाती पटरी समांतर बिछी लूप लाइन की पटरी से सिग्नल प्रणाली से जुड़ी पटरियों को जोड़ने वाली इलेक्ट्रोनिक पॉइंट प्रणाली की खराबी के कारण अचानक जुड़ जाए, तो यह कवच भी मदद नहीं कर पाता। रेलवे की जांच कमेटी अपना काम करते हुए इस संभावना पर अवश्य विचार करेगी कि क्या यह मानवीय गलती थी या इसमें मानवीय तोड़फोड़ की भी कोई साजिश थी?


दूसरी किस्म के विशेषज्ञों का अनुसंधान रेलवे मंत्री के तुरंत इस्तीफे देने की मांग पर केंद्रित होता है। उन्हें इस तथ्य का शायद ज्ञान ही नहीं कि लालबहादुर शास्त्री जी के रेलमंत्री होने के समय से लेकर आजतक हर बड़ी रेल दुर्घटना के बाद तत्कालीन रेलमंत्री इस्तीफे देते आए हैं, जिनमें से कुछ स्वीकार किए गए और कुछ को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपने पद पर बने रहने दिया। यदि मंत्रियों का इस्तीफा रेल दुर्घटनाओं को रोकने का कारगर इलाज होता, तो अब से वर्षों पहले रेल दुर्घटनाएं रेल के इतिहास में एक गुजरे हुए जमाने की दास्तान के रूप में दर्ज होतीं। इस्तीफा देने से दुर्घटनाओं का समाधान होने लगता, तो अब तक वायुसेना के मिग 21 लड़ाकू विमान के सिर पर दर्जनों रक्षा मंत्रियों के बेअसर पदत्याग का सेहरा बंध चुका होता। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारतीय सेनाओं की पराजय के पीछे तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन की गलत नीति और असावधानी सर्वमान्य तथ्य थी। अतः तब उनके इस्तीफे की मांग का औचित्य तो समझ में आता है, लेकिन रेल दुर्घटना यदि किसी सिग्नल तकनीशियन की लापरवाही से हुई हो, तब भी रेलमंत्री का इस्तीफा भविष्य में मानवीय लापरवाही से दुर्घटना होने की हर संभावना को सदा के लिए समाप्त कर देगा।

स्वघोषित विशेषज्ञों की तीसरी किस्म राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर के उन नेताओं की सूची तैयार करती है, जो दुर्घटना की खबर मिलते ही तुरंत दुर्घटना स्थल पर नहीं पहुंचे। उन्हें पूरा भरोसा होता है कि दुर्घटना स्थल पर किसी गणमान्य नेता के पहुंचते ही दुर्घटना के हर पीड़ित की जेब में कुछ लाख रुपयों की अंतरिम सहायता पहुंच जाएगी, सारे घायल लोगों का समुचित इलाज हो जाएगा, दुर्घटना में मृत व्यक्तियों के पार्थिव शरीर उनके परिजनों तक पहुंचा दिए जाएंगे। ऐसे विशेषज्ञ भूल जाते हैं कि ऐसी आपदा के समय वीआईपी मूवमेंट पुलिस और स्थानीय प्रशासन के लिए अनावश्यक बोझ बन जाते हैं।

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