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इतनी सारी इच्छाओं के वे दिन चले गए
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
Updated Tue, 05 Nov 2013 07:46 PM IST
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शीर्ष कवि-आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के निधन से साहित्य का जो नुकसान हुआ है, वह तो हुआ ही है, लेकिन गोरखपुर ने एक आत्मीय साहित्यकार खो दिया है। उनका जाना मेरे लिए एक व्यक्तिगत क्षति भी है। मैंने तीस वर्षों से भी ज्यादा पुराने स्नेही मित्र को खो दिया है।
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गोरखपुर में नई कविता के साथ जो नई पीढ़ी आई, परमानंद जी उसी पीढ़ी के सदस्य थे। उन्होंने गोरखपुर के साहित्य जगत में नई साहित्यिक चेतना का आरंभ किया। 1957 में मैं गोरखपुर आया था। प्रायः उसी वर्ष परमानंद जी की सेंट एंड्रयूज कॉलेज में नियुक्ति हुई थी। उन दिनों वह गोरखपुर में साहित्यिक वातावरण तैयार करने में सक्रिय रहते थे और शहर की साहित्यिक दुनिया के राजकुमार थे। तब लेखक संघ गोरखपुर में इतना सक्रिय नहीं था। इसलिए लेखकों के बीच किसी तरह का मतभेद नहीं था। शहर में अक्सर कोई न कोई साहित्यिक गोष्ठी हुआ करती थी और नए-पुराने सभी लेखक अत्यंत आत्मीय वातावरण में उनमें शरीक हुआ करते थे। वह बहुत अच्छा बोलते थे और प्रायः सभी साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन करते थे। उनकी आवाज एवं उनकी वाग्मिता ने ही मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया था। उन दिनों गोरखपुर में जो नवलेखन मंडली सक्रिय थी, उसमें अगर आचार्य शुक्ल के शब्द उधार लेकर कहें, तो कह सकते हैं कि उस गोरखपुरी अष्टछाप में सबसे ऊंची और सुरीली आवाज परमानंद श्रीवास्तव की वीणा की थी। सचमुच वह अत्यंत सुरीली आवाज में अपने गीत गाते थे। बाद में उन्होंने मुक्त छंद के एक कवि और प्रतिबद्ध आलोचक की गंभीरता ओढ़ ली, तो प्रकृति प्रदत्त इस मोहिनी शक्ति को भी छिपा लिया। लेकिन तब भी कभी-कभी आग्रह करने पर जब वह-पल छिन चले गए/इतनी सारी इच्छाओं के वे दिन चले गए अपने सुरीले कंठ से सुना देते थे, तो घर लौटने पर भी उसे ही दोहराने की इच्छा होती थी।
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लगभग तीस वर्षों तक हम दोनों ने एक साथ अध्यापन कार्य किया। परमानंद जी बहुत अच्छे अध्यापक भी थे। यों तो अक्सर वह साहित्यिक गोष्ठियों के सिलसिले में बाहर रहते थे, लेकिन जब भी वह शहर में होते, तो नियमित विभाग में आते और टनाटन आवाज में छात्रों को पढ़ाना नहीं भूलते थे। देश भर में जहां कहीं भी साहित्यिक गोष्ठियां होती थीं, प्रायः हम दोनों को एक साथ बुलाया जाता था। यह सिलसिला उनके बीमार होने से पहले तक चलता रहा और इस तरह हम दोनों ने साथ-साथ लगभग पूरे देश की यात्राएं कीं।
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प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद भी वह इतने उदार थे कि सभी गोष्ठियों में जाते थे और शहर के तमाम लेखकों से वह घुले-मिले थे। ऐसे उदार लेखक की कमी गोरखपुर को जरूर खलेगी। उनमें एक विशेष गुण था कि किसी के भी सहयोग मांगने पर वह उदार हृदय से मदद करते थे, कभी-कभी बेमन से भी। परमानंद जी में कई विशेषताएं थीं, जो प्रभावित करती थीं। जैसे, क्रोध पर उनका अधिकार वैसे ही था, जैसे हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार भाषा पर कबीर का। शायद ही कभी किसी ने उन्हें क्रोध करते हुए देखा हो। उनकी सक्रियता और कर्मठता ऐसी थी, जो किसी भी रचनाकार के लिए अनुकरणीय है। पिछले दो-तीन दशकों की कोई भी पत्रिका उठा लें, उनमें उनकी कोई न कोई रचना मिल ही जाएगी। मैं अक्सर मजाक में कहा भी करता था कि शायद ही कोई अभागी पत्रिका हो, जिसे परमानंद जी का प्रसाद न मिला हो।
परमानंद जी ने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी, लेकिन आलोचना के क्षेत्र में भी उन्होंने गंभीर काम किया और उन्हें मान्यता भी आलोचना के क्षेत्र में ही मिली। डॉ नामवर सिंह के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आलोचना का कुछ वर्षों तक उन्होंने सह-संपादन भी किया था। हालांकि जीवन के उत्तरार्द्ध में वह ज्यादा दिल्ली में ही रहते थे, पर दिल्ली के बड़े कद के लेखकों के जितना बड़ा कद वह नहीं बना पाए। इसलिए दिल्ली के बड़े कद वाले लेखकों के बीच वह छिप जाते थे। मगर गोरखपुर में उनका बहुत बड़ा कद है। उनकी आत्मीयता एवं सहजता को यह शहर बहुत याद करेगा।
(लेखक साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष हैं।)