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ओबामा पर भारी मोदी

Thu, 29 Jan 2015 11:16 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Thu, 29 Jan 2015 11:16 PM IST
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obama and modi.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की हालिया भारत यात्रा की प्रतीकात्मकता पर बहुत ज्यादा चर्चा हुई। लेकिन क्या यह केवल ओबामा के चलते हुआ है? तथ्य यह है कि जो मोदी नौ महीने पहले तक अमेरिका की धरती पर पैर नहीं रख सकते थे, वह अब वहां के राष्ट्रपति को बराक कहकर बुला रहे थे। यह प्रतीकात्मक दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं था। क्या हैदराबाद हाउस में चाय पर चर्चा के दौरान मोदी के चाय पीने का दृश्य, ओबामा के साथ बैठकर गणतंत्र दिवस की परेड देखना और फिर मन की बात साझा करना अपने समर्थकों के साथ-साथ भारत के पड़ोसी देशों और व्यापक स्तर पर दुनिया को एक सशक्त संदेश देने के लिए पर्याप्त नहीं है? सामान्य रूप से कहें, तो भारत के नए प्रधानमंत्री एक उभरते और आकांक्षी भारत का नेतृत्व करते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ वैश्विक परिदृश्य पर प्रकट हुए हैं। हर तरह से यह भव्य मोदी शो था, जिसमें आश्चर्यजनक ढंग से ओबामा दूसरे नंबर के खिलाड़ी नजर आ रहे थे!

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लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्तिगत सौजन्यता कितनी भी सहायक क्यों न हो, वह मीडिया की नजरों से दूर अपने राष्ट्रीय हितों के लिए जरूरी पारस्परिक लाभप्रद समझौतों के लिए होने वाली गंभीर वार्ता की जगह नहीं ले सकती।
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परमाणु सामग्री/उपकरणों की निगरानी और जवाबदेही से संबंधित प्रावधान असैन्य परमाणु समझौते के व्यावसायिक परिचालन की राह में एक बड़ी बाधा रही। मोदी और ओबामा ने इसकी राह आसान की है। अब जापान और ऑस्ट्रेलिया भी भारत के साथ परमाणु व्यवसाय करना चाहेगा और फ्रांस व रूस भी खुश होगा। हालांकि ओबामा ने भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बनाने में सहयोग का आश्वासन दिया है, लेकिन चीन ने साफ कर दिया, यह आसान नहीं होगा।
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जैसी कि उम्मीद थी, रक्षा ढांचा समझौते का अगले दस वर्षों के लिए नवीनीकरण किया गया है और रक्षा व्यापार एवं प्रौद्योगिकी पहल शुरू की गई है। चार चुनिंदा क्षेत्रों में सह-उत्पादन के लिए समझौता एक नई कोशिश की विनम्र शुरुआत है। जहां तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पुनर्गठन की स्थिति में भारत को स्थायी सदस्यता दिलाने में अमेरिकी सहयोग का सवाल है, तो यह कोई नई घोषणा नहीं है। हां, अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के बीच हॉटलाइन पर बातचीत का विचार जरूर स्वागतयोग्य है, आपात स्थिति में यह बेहद मददगार हो सकता है। ओबामा के चार अरब डॉलर निवेश (एक अरब छोटे एवं मंझोले उद्यमों के लिए, एक अरब दो वर्षों तक अमेरिका निर्मित वस्तुओं के भारत में निर्यात के लिए और दो अरब अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में) के वायदे का सकारात्मक असर पड़ेगा, क्योंकि इससे प्रवासी भारतीय निवेश की पहल करेंगे।

हालांकि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा ओबामा के ध्यान में था, लेकिन उन्होंने कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के लिए चीन-अमेरिका जैसा कोई समझौता करने के लिए मोदी पर दबाव नहीं डाला। हो सकता है कि मोदी उन्हें यह समझाने में सफल रहे हों कि पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और ऊर्जा के अन्य स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाने की अपनी कोशिशों तथा स्वच्छ ऊर्जा तकनीक (संभवतः जिसकी आपूर्ति अमेरिका करे) के प्रयोग से भारत कार्बन उत्सर्जन को संभवतः कम कर लेगा।
द्विपक्षीय निवेश संधि पर बातचीत अभी जारी है। इसी तरह बौद्धिक संपदा अधिकार के मुद्दे पर समझौता नहीं हुआ है, लेकिन कुछ व्यावहारिक उपायों को खारिज नहीं किया जा सकता, खासकर कैंसर, एचआईवी/एड्स की दवाओं और किताबों, डीवीडी, सीडी, आदि के पेटेंट से संबंधित। एच1बी, एल1 वीजा के मामलों पर गौर करने संबंधी ओबामा के वायदे से भारतीय आईटी/दवा कंपनियों को खुश होना चाहिए।

एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र के लिए नई दिल्ली में जारी संयुक्त रणनीतिक दृष्टिकोण समुद्री सुरक्षा, समुद्री परिवहन एवं उस क्षेत्र से होकर गुजरने वाले विमानों की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय व समुद्री विवाद का समाधान, अंतरराष्ट्रीय कानूनों/संयुक्त राष्ट्र की संधियों के अनुपालन के मुद्दे पर चीन को एक स्पष्ट संदेश है। चीन की प्रतिक्रिया भारत-अमेरिका के बीच गहराते रिश्ते से उपजी उसकी बेचैनी को कमोबेश बयान कर ही देती है। हालांकि सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टाइम्स की टिप्पणी, कि भारत कभी किसी का पिछलग्गू नहीं रहा, यही बताती है कि भारत की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है। मई में मोदी की चीन यात्रा उनकी गलतफहमियों को दूर कर देगी।

हालांकि विदा होने से कुछ घंटे पहले सीरी फोर्ट में ओबामा ने विदाई संदेश में यह कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना और देश के संविधान का अनुपालन करना सरकार की जिम्मेदारी है। इस बयान को विपक्ष ने मोदी सरकार की आलोचना के रूप में लिया है। ओबामा ने महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण, सबके लिए पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा मुहैया कराने, गरीबी कम करने और एक समावेशी समाज की रचना करने जैसे मुद्दों पर जोर देकर लोगों के मर्म को छू लिया। ओबामा की अद्भुत वक्तृत्व कला एवं आदर्शवाद ने दरअसल जॉन एफ कैनेडी की कैमिओलेट छवि वाले दौर की याद दिला दी है।


अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने और मोदी की साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से उठकर शीर्ष पदों पर पहुंचने का जो संदर्भ दिया, वह युवाओं को प्रेरित करने वाला था। उन्होंने यहां की सरकार और समाज को यह याद दिलाया कि जरूरतमंद बच्चों को मौका जरूर दें, क्योंकि एक दिन उनमें से कोई बच्चा ओबामा या मोदी बनेगा। अपनी यात्रा के दौरान वह बार-बार यह कहते नजर आए कि अमेरिका भारत का सबसे अच्छा मित्र है। यह तो वक्त ही बताएगा कि इसमें कितनी सच्चाई है।

पूर्व राजदूत एवं अध्यक्ष, इंडो-अमेरिकन फ्रेंडशिप एसोसिएशन

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