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सुरक्षा की दुहाई, निजता की विदाई
सुभाष गाताडे
Updated Tue, 02 Jul 2013 09:09 PM IST
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ओबामा हुकूमत द्वारा नेशनल सेक्युरिटी एजेंसी के जरिये अमेरिका एवं शेष दुनिया के करोड़ों नागरिकों के संप्रेषणों-फोन कॉल्स, ई-मेल-आदि के इस्तेमाल पर गुप्त ढंग से रखी जा रही नजर पर अमेरिकी नागरिक स्नोडेन द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन को लेकर विश्व जनमत क्षुब्ध है। जहां दुनिया भर के इंसाफ पसंद लोग स्नोडेन के इस साहसी कदम की हिमायत कर रहे हैं, वहीं अमेरिका से ऐसे कार्यक्रम समेटने की मांग भी की जा रही है।
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इसे विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि स्नोडेन के इस रहस्योद्घाटन के बाद अमेरिकी सरकार की तरफ से इसे औचित्य प्रदान करने के लिए तरह-तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं। इसके चलते कितने आतंकी हमले रोके गए, इसकी एक नकली फेहरिस्त जारी की गई है तथा स्नोडेन को चीनी जासूस या देशद्रोही के तौर पर संबोधित किया जा रहा है। अपने यहां भी निवर्तमान केंद्रीय गृह सचिव आर के सिंह ने पिछले दिनों मीडिया को सूचित किया कि वह चाक-चौबंद केंद्रीय निगरानी प्रणाली (सीएमएस) शुरू करनेवाले हैं।
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इसके तहत देश की सुरक्षा की दुहाई देते हुए सुरक्षा एजेंसियां हमारे फोन कॉल और मैसेज पर नजर रखने के साथ ही ई-मेल में भी ताकझांक कर रही हैं। विगत अप्रैल से से सरकार ने व्यापक स्तर पर निगरानी कार्यक्रम शुरू कर दिया गया है। न केवल सुरक्षा एजेंसियां, बल्कि आयकर विभाग भी अदालत की अनुमति लिए बगैर लोगों के ई-मेल और फोन कॉल्स टैप कर सकते हैं। हमारी सरकार का तर्क भी वही है, जो चर्चित ह्विसलब्लोअर स्नोडेन द्वारा अमेरिका के एनएसए के संबंध में किए गए रहस्योद्घाटन के संदर्भ में अमेरिकी सरकार द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है कि निजता बनाम सुरक्षा के बीच जारी जंग में वह सुरक्षा की हिमायती है।
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उल्लेखनीय है कि केंद्रीय निगरानी प्रणाली की घोषणा 2011 में हुई थी, लेकिन इस पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की गई। अब इस योजना के तहत देश के करीब 90 करोड़ लैंडलाइन और मोबाइल फोन उपभोक्ताओं और एक करोड़ बीस लाख इंटरनेट उपभोक्ताओं में किसी को भी निशाना बनाया जा सकेगा। एजेंसियां लोगों के फेसबुक-ट्वीटर पर भेजे संदेशों की भी निगरानी कर सकेंगी और गूगल पर की गई सर्च पर भी निगाह रख सकेंगी। अगस्त, 2011 में तत्कालीन केंद्रीय संचार राज्यमंत्री मिलिन्द देवड़ा ने राज्यसभा को एक लिखित वक्तव्य में बताया था कि केंद्र सरकार ने फेसबुक एवं ट्वीटर की पूरी निगरानी शुरू की है तथा वेबसाइट्स एवं ब्लॉग्स को ब्लॉक करने की तकनीक भी हासिल की है।
निजता के अधिकार का हनन हम लगातार देख ही रहे हैं। पिछले साल बाल ठाकरे की मौत पर दो लड़कियों द्वारा फेसबुक पर की गई टिप्पणी को लेकर उनकी गिरफ्तारी को हम देख चुके हैं। एयर इंडिया से जुड़े दो अग्रणी ट्रेड यूनियन कर्मियों को भी फेसबुक पर की गई उनकी टिप्पणी को आधार बनाकर जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है, जहां से उन्हें मुश्किल से जमानत मिली। असीम त्रिवेदी जैसे कार्टूनिस्ट पर इसी के तहत दर्ज देशद्रोह का मुकदमा सबके सामने है।
जनतंत्र पर यकीन रखने वाले तमाम लोगों एवं संगठनों को ‘सुरक्षा’ की आड़ में सरकारों द्वारा उठाए जा रहे ऐसे कदमों का विरोध करना होगा, साथ ही, बुनियादी मुद्दों को भी उठाना होगा। चर्चित अमेरिकी विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर जेम्स पेट्रास अपने एक हालिया आलेख, द डीपर मीनिंग ऑफ मास स्पाइंग इन अमेरिका में पूछते हैं कि इस किस्म की सार्वजनिक जासूसी सत्ताधारियों के लिए इतनी अहम क्यों हो गई है? एक तरफ ‘बचत’ के नाम पर सामाजिक कार्यक्रमों में कटौती की जा रही है, दूसरी तरफ सैकड़ों अरब डॉलर लगाकर जासूसी का विशाल तंत्र खड़ा किया जा रहा है।
ब्राजील एवं तुर्की में हालिया दौर में खड़े हुए जनांदोलन गवाह हैं कि सोशल नेटवर्क के माध्यम से किस तरह जन असंतोष को दिशा दी जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि नीति नियंता खुद अपने इतिहास को भी ठीक से पढ़ नहीं पा रहे। पूरी दुनिया पर निगरानी रखने के लिए आमादा अमेरिका क्यों भूल रहा है कि उसके यहां अभी कुछ समय पहले ही ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ नाम से जनांदोलन खड़ा हुआ था, जिसने पूंजीवाद को लेकर बुनियादी सवाल खड़े किए थे।