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न्याय की प्रार्थना करतीं नन

Mon, 21 Jan 2019 06:42 PM IST
bhaskar sai भास्कर साई
Updated Mon, 21 Jan 2019 06:42 PM IST
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Nuns Praying for justice
केरल की नन

केरल, जिसे देवताओं का अपना देश कहा जाता है, वह हाल के दिनों में गलत कारणों से खबरों में है और वह भी देवताओं से जुड़ी चीजों के लिए। इससे पहले कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उठा तूफान शांत हो, एक और विवाद सामने आ गया है और वह भी महिलाओं से संबंधित ही है, लेकिन एक दूसरे धर्म से।


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कोट्टायम कॉन्वेंट की ननों ने, जिन्होंने जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ एक नन का बलात्कार करने के कारण विरोध किया था, केरल के मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि उन्हें कॉन्वेंट में रहने की इजाजत दी जाए। ननों का यह अनुरोध तब आया है, जब मिशनरीज ऑफ जीसस कांग्रेगेशन की तरफ से उन्हें स्थानांतरण के आदेश की याद दिलाने के लिए पत्र मिला। बिशप के खिलाफ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन करने के कुछ महीने बाद ही उनका स्थानांतरण कर दिया गया था।

मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में इस मामले में दखल देने और संरक्षण करने की मांग करते हुए ननों ने कहा है कि 'हम आसन्न खतरों का सामना कर रहे हैं। हमें लगता है कि बलात्कार की शिकार, जो हमारी सहकर्मी / बहन है, का समर्थन करना और साथ निभाना हमारा कर्तव्य है। दूसरे पक्ष की पिछली गतिविधियों, प्रभाव और ताकत पर विचार करते हुए हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि हम किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं हैं।'

बिशप के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में अग्रणी रहने वाली सिस्टर अनुपमा ने एक टीवी चैनल को बताया कि 'यह स्थानांतरण आदेश हमारे भले के लिए नहीं, बल्कि हमें नुकसान पहुंचाने और खत्म करने के लिए है। वे हमें मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। पीड़िता को हमारे समर्थन की जरूरत है और हम उसकी सुरक्षा के लिए यहां रहेंगी।' लगता है कि यह मुद्दा लंबे समय से है। बिशप मुलक्कल पर वर्ष 2014 से 2016 के बीच एक नन के साथ बलात्कार और कई बार अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप है।

मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में, जिस पर चार ननों ने हस्ताक्षर किए हैं, कहा गया है, आरोपी बिशप हर तरह से बहुत ताकतवर व्यक्ति है। उसका उद्देश्य मामले को रफा-दफा करना और बचकर निकल जाना है। हमारा जीवन खतरे में है। अगर हमारा स्थानांतरण होता है, तो हम इस मामले में निर्भयता से सबूत देने की स्थिति में नहीं होंगी। कॉन्वेंट में अलगाव और अपने साथ हो रहे सौतेले रवैये की बात करते हुए ननों ने कहा कि 'कॉन्वेंट के अधिकारी उपचार सहित हमारे जीवन के लिए न्यूनतम जरूरतें भी पूरी नहीं कर रहे हैं। अगर हमें केरल से बाहर भेजा जाता है, तो निश्चित रूप से इससे अभियोजन प्रभावित होगा। उनका इरादा पीड़िता को अकेली छोड़ देना और मामले को कमजोर करने का है।'

मुख्यमंत्री से अपनी भावनात्मक अपील में उन्होंने कहा है कि 'हम एक बार फिर पीड़िता और अपने साथ न्याय की प्रार्थना करते हैं। हमारे पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है या हमारा समर्थन करने का कोई साधन नहीं है। इसलिए हम पर करुणा दिखाई जाए।'

स्थानांतरण आदेश के अनुसार सिस्टर अनुपमा का तबादला पंजाब, जोसफीन का झारखंड, एल्फी का बिहार और अनीता का कन्नूर किया गया है। उनका दावा है कि पीड़ित नन वास्तव में शिकायतकर्ताओं की ताकत और समर्थन पर जी रही हैं। राज्य पुलिस प्रमुख और राज्य महिला आयोग को पत्र की प्रतियां भेजे जाने के साथ यह मुद्दा और गरमा गया है और महिला कार्यकर्ता और संगठन ननों के समर्थन में आगे आ गए हैं।
 
जून, 2018 में एक नन ने पुलिस से शिकायत की थी कि वर्ष 2014 से 2016 के बीच मुलक्कल ने उसके साथ 13 बार बलात्कार किया। बाद में पांच ननों ने आरोपी की गिरफ्तारी की मांग करते हुए कोच्चि में धरना दिया था। आखिरकार कई बार की पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपी बिशप को बीते सितंबर में गिरफ्तार कर लिया। न्यायिक हिरासत में तीन हफ्ते बिताने के बाद आरोपी को जमानत दे दी गई। और उसकी रिहाई के दो हफ्ते के बाद ही मामले के मुख्य गवाह पंजाब में मृत पाए गए।
 
ननों ने खुलेआम विरोध का परचम लहराया, तो चर्च निकाय ने बाद में ननों पर बुरे इरादे से सार्वजनिक बयान जारी करने का आरोप लगाया। चर्च ने उन पर झूठी कहानियां फैलाने का भी दोष मढ़ा और कहा कि नन निर्देशों की अवहेलना करके एम जे कांग्रेगेशन की छवि को धूमिल करने की कोशिश कर रही हैं। इसके अलावा, चर्च की धर्मसभा ने, जिसमें 55 बिशपों ने भाग लिया, कहा कि आंदोलन में भागीदारी और मीडिया चर्चाओं में हिस्सा लेने के लिए धर्म गुरुओं और ननों के लिए एक आचार संहिता पेश की जाएगी।

चर्च के प्रमुख कार्डिनल जॉर्ज एलनचेरी द्वारा जारी एक परिपत्र में कहा गया कि ननों और पादरियों के हालिया आंदोलन ने अनुशासन की सभी सीमाओं को तोड़ दिया। उसमें कहा गया कि यह संदेह है कि कुछ पादरी और नन चर्च विरोधी ताकतों के हाथों की कठपुतली बन गए हैं। धर्मसभा ने विभिन्न धार्मिक मंडलियों के बिशप और वरिष्ठों को 'अनुशासनहीनता की गंभीर घटनाओं' में भाग लेने वाले पादरियों और ननों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

कहा जाता है कि विश्वास डर की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली होता है। लेकिन यहां एक ही धर्म के लोगों द्वारा ऐसा डर फैलाया गया है कि न केवल नन, बल्कि अनुयायियों में डर और शोक की लहरें पैदा हुई हैं। जैसा कि शीजा नाम की एक महिला कार्यकर्ता का कहना है, 'आरोप बहुत गंभीर प्रकृति के हैं और अगर वे सही हैं, तो गलत करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। जिस तरह सबरीमाला मुद्दे में हस्तक्षेप कर सरकार ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की, उसी तरह सरकार को नन वाले मामले में भी उचित कदम उठाना चाहिए।'

गेंद अब मुख्यमंत्री के पाले में है और देश इस बात का इंतजार कर रहा है कि विजयन सरकार इस मामले में क्या कार्रवाई करती है-क्या वह धार्मिक मामलों में दखल देने से इनकार करती है या ननों के आरोपों पर गौर फरमाती है। यह देखना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि केरल सरकार ने सबरीमाला मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया। 

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