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अब मुखौटों का क्या करें
सुधीर विद्यार्थी
Updated Wed, 04 Jun 2014 07:28 PM IST
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साधो, पिछले दिनों इतने मुखौटों से सामना हुआ कि असली चेहरा भी अब मुखौटा लगने लगा है। वैसे चेहरे और मुखौटे में ज्यादा फर्क नहीं होता। कई बार नकल इतनी खूबसूरत लगती है कि उसके सामने असल चीजें फीकी लगने लगती हैं। वैसे भी यह नकल का जमाना है। बहुत कम लोग अपने ड्राइंग रूम में असली फूल सजाकर रखते हैं।
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बाजार में भी अब नकली चीजों की भरमार है। पहले के चुनावों में मुखौटों की कोई भूमिका नहीं होती थी। पर अब हर तरफ मुखौटा-दर-मुखौटा। पिछला चुनाव भी मुखौटों के जरिये लड़ा गया। दिल्ली का एक दुकानदार मुझसे कह रहा था, चुनाव में मैंने मोदी के एक लाख मुखौटे बेचे, केजरीवाल के बीस हजार और राहुल गांधी के तीन सौ। मैं चिंता में पड़ गया। अब पीएम हाउस में कोई मोदी का मुखौटा पहन कर आ जाए, तब क्या होगा। सुरक्षा अधिकारी कैसे शिनाख्त करेंगे कि सामने वाला असली मोदी है या उनका मुखौटा। मुखौटे वाले आदमी को रोकना भी कठिन होगा। उसे प्रतिबंधित करना अब राष्ट्रीय अपराध में गिना जाएगा।
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चेहरों पर मुखौटा पहनते अब लोगों को शर्म नहीं आती। ऐसा करके वे गर्व महसूस करते हैं। मैं चिंतित हूं कि चुनाव प्रचार में जो इतने सारे मुखौटे लगाकर लोग घूमते रहे, उनका अब क्या होगा। वे कहां रखे जाएंगे? उनमें से कुछ मुखौटों ने ऐतिहासिक भूमिका अदा की, इसलिए वे कूड़ेदान में फेंके जाने लायक नहीं हैं। जिन मुखौटों के जरिये जीत हासिल हुई है, उन्हें अब राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया जाए।
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पर संकट यह है कि वहां तो पहले से ही कई मुखौटे कब्जा जमाए बैठे हैं। उनमें से कुछ इतने अदृश्य हैं कि उन्हें पहचानना भी कठिन है। देश का इतिहास इन मुखौटों के करतबों से भरा पड़ा है। वहां से मुखौटों को हटा दीजिए, तो बचेगा क्या? वैसे जीवन में मुखौटों की अपनी भूमिका है। अपनी आंखें भी अब मुखौटों को देखने की आदी हो गई हैं। असल को हिकारत से देखना और नकल के सामने दंडवत हो जाना हमारी फितरत में शामिल हो गया है।