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अभी चार गुब्बारे बाकी हैं
वीना सिंह
Updated Tue, 02 Jun 2015 07:31 PM IST
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आज शर्मा जी के धैर्य का बांध टूट ही गया। बड़े ही तीखे स्वर में वह बोले, बहुत हो गया जी आपका यह प्रवचन। ऐसे ही प्रवचन सुनते-सुनते पूरा एक साल निकल गया कि धैर्य रखो, सबका विकास होगा। हर दिन अच्छा होगा। हर महीना अच्छा होगा। अच्छे दिन आएंगे। इन्हीं गोल-गप्पे जैसी बातों से हम सभी का मन भी गुब्बारे की तरह फुलाते रहे। और देखो, परिणाम क्या निकला? पूरा साल हवा भरा गुब्बारा ही साबित हुआ। और आप हैं कि अब भी धैर्य का राग अलापे जा रही हैं। पूरा साल कैसे बीता, यह इंतजार करने वालों से पूछिए?
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उनकी नाराजगी को जायज समझते हुए मैंने बात को संभालते हुए कहा, शर्मा जी, इतना आपा खोने की जरूरत नहीं है। विकास उच्च स्तर से हो रहा है, सो नीचे तक आने में समय लगेगा। अभी विकास को उच्च स्तर के लोग ही देख पा रहे हैं। वह जब नीचे आएगा, तब नीचे के लोग भी देखेंगे।
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मगर वह मेरी बातों से सहमत नहीं हुए और तर्क करते हुए बोले, मैं तो बचपन से ही बड़े-बुजुर्गों के मुख से सुनता आया हूं कि विकास के लिए जड़ को सींचना जरूरी है, कोपलों को नहीं। फिर यह विकास ऊपर से कैसे संभव है। इस बात की क्या गारंटी है कि आने वाले समय में विकास होगा?
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मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, शर्मा जी, आप कुछ ज्यादा ही माथापच्ची कर रहे हैं। आप यह यकीन क्यों नहीं कर रहे हैं कि ऊपर वाला खुश, तो सभी खुश। और फिर अभी चार साल बाकी हैं। यानी कि चार गुब्बारे फूटने बाकी हैं। माना कि एक गुब्बारे की हवा टांय-टांय फुस्स हो गई, पर व्यक्ति का आशावान होना आवश्यक है। रही गारंटी की बात, तो आज के समय में चौबीस कैरेट सोने और महंगे हीरे-जवाहरात की शुद्धता की गारंटी भी नहीं है, तो भला वायदे रूपी गुब्बारों की गारंटी कैसे दी जाए? मगर इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि क्या पता इन चारों गुब्बारे रूपी वर्षों में विकास ही विकास भरा हो। बस इसके लिए जरूरी है, सकारात्मक सोच। इसलिए आप यह सोचकर खुश होइए कि अभी चार गुब्बारे बाकी हैं।