अब अर्थव्यवस्था को सुस्ती से बचाएं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इन दिनों देश और दुनिया के आर्थिक संगठनों की विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि नोटबंदी भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए एक कड़वी आर्थिक दवाई है। मुश्किल भरे शुरुआती समय में अर्थव्यवस्था को सुस्ती से बचाना जरूरी है। हाल ही में उद्योग व्यापार संगठन एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नोटबंदी के चलते नवंबर 2016 में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि रफ्तार धीमी पड़ गई। नकदी की कमी के चलते घरेलू खपत कमजोर पड़ने से वस्तुओं के उत्पादन और कारोबार प्रभावित हुए हैं। बाजार में ग्राहकों की कमी हो गई है। असंगठित क्षेत्र और ग्रामीण इलाके नोटबंदी से अधिक प्रभावित हैं। लोगों की क्रय शक्ति घट गई है। ऐसे में अब अर्थव्यवस्था को सुस्ती से बचाने के लिए नकदी पर राशनिंग जल्द बंद करना होगी। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए सरकार को जहां उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देने होंगे, वहीं सार्वजनिक व्यय बढ़ाने के लिए कदम उठाने होंगे।
उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक ने वर्ष 2016-17 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के अनुमान को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। रेटिंग एजेंसी फिच ने नोटबंदी के मद्देनजर मौजूदा वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का नया अनुमान व्यक्त किया है, जबकि नोटबंदी के पहले उसने 7.4 प्रतिशत का अनुमान व्यक्त किया था। दुनिया की प्रमुखतम रेटिंग एजेंसियों मूडीज और एस ऐंड पी ने कहा है कि नोटबंदी से उद्योग-कारोबार और जीडीपी में कमी आने से भारत की निवेश रेटिंग प्रभावित होगी। कुछ महीनों तक भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। पर अगले वित्त वर्ष 2017-18 में नोटबंदी का भारी लाभ दिखाई देगा। काले धन पर नियंत्रण से ब्याज दरें कम होगी। भ्रष्टाचार घटेगा। सरकार की आय बढ़ेगी। मूडीज ने यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में जो आर्थिक एवं संस्थागत सुधार किए जा रहे हैं, उसके सकारात्मक परिणाम आने पर भारत की रेटिंग बढ़ाई जा सकेगी।
चूंकि एक ओर बाजार मांग की भारी कमी का सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निवेश और मांग की कमी के कारण उद्योग-कारोबार की रफ्तार नहीं बढ़ने से नौकरियां घटने की चिंताएं दिखाई दे रही हैं। यही नहीं, जहां वर्ष 2017 में वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत भी प्रभावित हो सकता है। वहीं ओपेक द्वारा प्रतिदिन 12 लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन में कमी करने के निर्णय से भारत में भी तेल की कीमतें बढ़ेगी। ऐसे में निवेश बढ़ाना, उत्पादकता बढ़ाना और घरेलू मांग का निर्माण करना प्रमुख जरूरत है।
केंद्र सरकार ने कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल पेमेंट पर जो रियायतें घोषित की हैं, उससे कुछ लोगों की कुछ क्रयशक्ति बढ़ेगी। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए सरकारी परियोजनाओं के तहत रोजगार, उद्योग और कारोबार के लिए प्रोत्साहन के कदमों की भी जरूरत है। ऐसा एक मौका हमारे हाथों से निकाल गया है। बड़े मूल्य के नोटों को वापस लेने की प्रक्रिया के चलते उद्योग-कारोबार पर असर पड़ने के मद्देनजर ब्याज दरों में कटौती की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया। ऐसे में अब सरकार को घरेलू मांग के निर्माण के लिए उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देने के साथ सरकारी निवेश में वृद्धि करना होगी।