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फ्रांस में कुछ ठीक नहीं हो रहा: बढ़ता कर्ज, नाराज युवा और राजनीतिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

Fri, 16 Oct 2026 08:16 AM IST
निर्मल कांत मुजतबा रहमान, द न्यूयॉर्क टाइम्स
मुजतबा रहमान, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 16 Oct 2026 08:16 AM IST
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सार
फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है। छात्र आंदोलन चरम पर है, जिसकी चिंताएं शैक्षिक सुधार से लेकर देश में दक्षिणपंथी उभार तक को लेकर हैं। इस स्थिति के लिए राष्ट्रपति मैक्रों के अलावा बुरी तरह बंटा हुआ विपक्ष भी कोई कम जिम्मेदार नहीं।
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Nothing Is Going Right in France: Rising Debt, Angry Youth and Political Crisis Deepen the Trouble
फ्रांस - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

फ्रांसीसी भाषा में एक मुहावरा है: अन एंग्रेनेज, यानी एक ऐसा दुष्चक्र, जो लगातार गहरा होता जाता है। फ्रांस अभी इसी स्थिति में फंसा है। यहां कई संकट लंबे समय से पनप रहे थे; और अब हालात ऐसे हैं कि हर संकट दूसरे संकट को और तेजी से बढ़ाने का खतरा पैदा कर रहा है।


वर्तमान सरकार के लिए पहला संकट सर्वेक्षणों में मिल रहे संकेत हैं, जो कहते हैं कि अगले वसंत में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में धुर दक्षिणपंथी गुट सत्ता में आ सकता है। दूसरा संकट वित्तीय कुप्रबंधन का है। फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज रिकॉर्ड 40 खरब डॉलर तक पहुंच गया है, और सरकार के लिए नया कर्ज लेना कहीं अधिक महंगा हो गया है। तीसरा संकट युवाओं की नाराजगी का है। जर्जर स्कूलों और सीमित अवसरों के खिलाफ विरोध जताते हुए, फ्रांसीसी छात्रों ने पिछले कुछ हफ्तों में देश के लगभग आधे हाई स्कूलों को बंद करा दिया है। छात्रों के प्रदर्शन देश के हर हिस्से में-बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों के सरकारी स्कूलों तक फैल गए हैं। वे लंबी पढ़ाई के घंटों, बड़ी कक्षाओं, शिक्षकों की बार-बार अनुपस्थिति और जर्जर होती स्कूल की इमारतों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।


हालांकि, संकेत भी साफ तौर पर मिल रहे हैं कि आंदोलनकारियों को ग्लोबल वार्मिंग और नौकरियों पर एआई के खतरे के अलावा, दक्षिणपंथी विचारधारा के उभार की भी चिंता है। फ्रांसीसी सरकार शिक्षा पर काफी खर्च करती है-हर साल लगभग 100 अरब डॉलर, जो कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5.1 प्रतिशत है। यह यूरोपीय संघ के औसत से भी अधिक है। लेकिन, इस रकम का एक-चौथाई से ज्यादा हिस्सा रिटायर हो चुके शिक्षकों की पेंशन देने में खर्च होता है। सरकारी खर्च का लगभग एक-चौथाई हिस्सा पेंशन में चला जाता है; और एक और चौथाई हिस्सा सामाजिक सेवाओं पर खर्च होता है, जिसमें स्वास्थ्य सेवा से लेकर बेरोजगारी भत्ते तक शामिल हैं।

पिछले 52 वर्षों में फ्रांस की किसी भी सरकार ने अपना बजट संतुलित नहीं किया है। इसके बावजूद, फ्रांस पर कर्ज का बोझ (जो उसके जीडीपी का 119 प्रतिशत है) अमेरिका सहित कई अन्य देशों की तुलना में कम है। 2019 में, राष्ट्रपति मैक्रों वार्षिक घाटे को यूरोपीय संघ (ईयू) के तीन प्रतिशत जीडीपी वाले लक्ष्य के दायरे में लाने में सफल रहे थे। फिर महामारी आ गई। लॉकडाउन के दौरान फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने की कोशिश के चलते 2020 में घाटा बढ़कर जीडीपी का 9.2 प्रतिशत हो गया। एक साल में कुल कर्ज 335 अरब डॉलर बढ़ गया। फिर, 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला किए जाने के बाद, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से फ्रांस को बचाने के लिए सरकार ने 95 अरब डॉलर और खर्च किए। इसके बाद, मैक्रों का नियंत्रण खत्म हो गया।

2022 में वह फिर से चुने गए, लेकिन नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल करने में नाकाम रहे। 2023 में उन्होंने पेंशन व्यवस्था में कुछ बदलाव किए, जिसके तहत सेवानिवृत्ति की उम्र को 62 से बढ़ाकर 64 साल कर दिया गया। लेकिन, फ्रांस के 70 प्रतिशत से अधिक लोग इससे सहमत नहीं थे, और कुछ लोगों ने तो हिंसक विरोध भी किया। इसके जवाब में, मैक्रों ने 2024 में जल्दबाजी में चुनाव कराने का एक गलत फैसला लिया, जिससे उनके मध्यमार्गी गठबंधन की ताकत और कम हो गई। तब से, दो प्रधानमंत्रियों ने खर्च को कम करने के लिए कुछ उपाय सुझाए हैं। लेकिन, नेशनल असेंबली में वामपंथी और धुर-दक्षिणपंथी सांसदों के बहुमत ने उन दोनों को ही सत्ता से बाहर कर दिया। नतीजा यह हुआ है कि देश में एक अजीब-सी स्थिति पैदा हो गई है।

इस गड़बड़ी के लिए कुछ हद तक मैक्रों स्वयं जिम्मेदार हैं। विपक्ष भी इसके लिए जिम्मेदार है, जिसमें ‘फ्रांस अनबोड’ जैसे धुर-वामपंथी गुट से लेकर मरीन ले पेन की ‘नेशनल रैली’ जैसे धुर-दक्षिणपंथी गुट तक शामिल हैं। इन्होंने आने वाले वित्तीय संकट को सुलझाने के बजाय राजनीतिक खेल खेलना ज्यादा पसंद किया। फरवरी में, मध्य-वामपंथी सोशलिस्टों ने इस साल के बजट को पास होने तो दिया, लेकिन शर्त रखी कि मैक्रों के पेंशन सुधारों को रोक दिया जाए।

मौजूदा प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने 2027 के बजट में ऐसे बदलावों का प्रस्ताव रखा है, जो तकलीफदेह तो हैं, पर बहुत कठोर नहीं। इन बदलावों से घाटे को जीडीपी के पांच प्रतिशत तक लाया जा सकेगा। आगामी 20 अक्तूबर को अगर उनकी सरकार बजट पारित कराने में नाकाम रहती है, तो फ्रांस के कर्ज का ब्याज चुकाने का खर्च बहुत तेजी से बढ़ सकता है। ऐसे में, फ्रांस को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मदद मांगने और यूरोपीय सेंट्रल बैंक से गुहार लगाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जो बेहद शर्मनाक बात होगी। कई मायनों में फ्रांस आज भी समृद्ध देश है। फ्रांस को लेकर बाजारों में जो अविश्वास है, वह आर्थिक से कहीं अधिक राजनीतिक है। बाजारों को इस पर संदेह है कि क्या बुरी तरह बंटी हुई राजनीतिक व्यवस्था कभी उन कठिन बदलावों के लिए सहमत हो पाएगी, जो सरकारी वित्त को वापस पटरी पर लाने के लिए जरूरी हैं? उन्हें डर है कि यह देश सामाजिक रूप से अस्थिर और संस्थागत रूप से पंगु होता जा रहा है। यही कारण है कि फ्रांस से भरोसा कम हो गया है, जिसकी वजह से वहां कर्ज लेने की लागत आसमान छूने लगी है।

इससे बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है। मई 2027 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में जो भी जीतेगा, उसे संसदीय चुनावों में बहुमत पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ेगा, जिससे राजनीतिक उथल-पुथल और बढ़ सकती है। इसके अलावा, कई लोगों को इस पर भी संदेह है कि क्या दक्षिणपंथी ले पेन (जो फिलहाल सबसे आगे चल रही हैं) इस संकट का ईमानदारी से सामना करना चाहती हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने पांच साल की एक बजट योजना पेश की, जो वैचारिक आग्रहों और हिसाब-किताब की चालाकियों से भरी थी।

दूसरी ओर, ले पेन जानती हैं कि बाजार उनके राष्ट्रपति बनने की योजना को सफल बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। वह यह साबित करना चाहती हैं कि वह एक समझदार राजनेता हैं, न कि सब कुछ बर्बाद करने वाली। इसे ध्यान में रखते हुए, वह संभवतः असेंबली में बजट पास होने दे सकती हैं। इससे शायद फिलहाल संकट को टाला जा सके, लेकिन फ्रांस में समस्याओं का दुष्चक्र अभी बना रहेगा।
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