राम मंदिर बनाने की इच्छाशक्ति नहीं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विगत लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान में नरेंद्र मोदी ने फैजाबाद संसदीय सीट की सभा में, जिसमें अयोध्या भी शामिल है, राम मंदिर मुद्दे पर चुप्पी साधना ही उचित समझा था। पर जब गृह मंत्री राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष के नेत्र चिकित्सालय के एक अंग का भूमि पूजन करने अयोध्या पहुंचे और उन्हें विहिप समर्थक संतों ने घेरा कि अब भाजपा सत्ता में है, तो वह संसद में कानून पारित कराकर राम मंदिर निर्माण क्यों नहीं करा सकते, तब राजनाथ सिंह ने सफाई दी कि चूंकि राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है, इसलिए राम मंदिर के लिए कानून बनाना संभव नहीं है। राम मंदिर, अनुच्छेद-370 और समान आचार संहिता पर भाजपा या मोदी सरकार की वास्तविक इच्छाशक्ति कितनी है, इसका निर्धारण तो उन्हें ही करना है। पर ये तीन ऐसे प्रश्न हैं, जिन्हें भाजपा के सत्ता में आने के बाद शीतगृह में डाल दिया जाता है।
जहां तक राजनाथ सिंह के बयान का संबंध है, तो राम मंदिर निर्माण संबंधी कानून तो संसद के ऐक्ट संख्या-33 (1993) के रूप में पारित हो चुका है, जिसमें कहा गया है कि अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के समाधान के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था व विभिन्न वर्गों के बीच सद्भाव की रक्षा हो और भारत में समान भातृत्व का विकास हो सके। इसलिए इस क्षेत्र को अधिग्रहीत करना आवश्यक है। जब मुस्लिम पक्ष की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में इस कानून को चुनौती दी गई, तो इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति वेंकटचेलैया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की पीठ ने कहा कि राज्य के पास सार्वजनिक उपयोगिता और शांति व्यवस्था की स्थापना के लिए किसी भी भूमि का अधिग्रहण करने का अधिकार है।
अब सवाल है कि जो मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और जिस पर शीर्ष अदालत ने अधिग्रहण कानून की धारा-4 (3) को वैकल्पिक न्यायिक व्यवस्था के अभाव में रद्द किया था, उसका क्या होगा? इससे बचाव के लिए तो पहले से परंपरा चली आ रही है। उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी कानून के तहत भी यह व्यवस्था है कि चकबंदी से पहले के मामले कहीं भी किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष विचाराधीन हों, तो वहां से वापस सहायक चकबंदी अधिकारी उसके संबंध में निर्णय करने का अधिकारी होगा। इस प्रकार अयोध्या विशेष क्षेत्र भूमि अधिग्रहण कानून की धारा-4 (3) में सुनवाई के लिए भी केवल एक अधिकारी को नामित करना है, जिससे सुनवाई की वैकल्पिक व्यवस्था पूरी हो सके।
तीन अप्रैल, 1993 को यह कानून बनाते समय जो कमी रह गई हो, उसकी पूर्ति संसद कभी भी कानून में परिवर्तन करके कर सकती है। तब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। उस समय भाजपा इस कानून की समर्थक थी। कांग्रेस द्वारा बनाए गए किसी कानून का परिमार्जन यदि भाजपा करना चाहे, तो इसका विरोध उन लोगों द्वारा कैसे होगा, जो इस कानून को पारित कराने में समर्थक की भूमिका निभा रहे थे? इसलिए गृह मंत्री का बयान भ्रामक है कि मंदिर बनाने का कानून पारित कराने की स्थिति इस समय नहीं है। जहां तक अधिग्रहण संबंधी कानून की धारा-4 (3) में दोषों का प्रश्न है, तो उसके परिमार्जन की शक्ति तो संसद के ही पास है। हां, मौजूदा सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव जरूर दिखता है।