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औरतों के मामलों में सनसनी नहीं संवेदना की जरूरत

Fri, 06 Jun 2014 08:00 PM IST
क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Updated Fri, 06 Jun 2014 08:00 PM IST
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Not sensation, be sensitive

इन दिनों उत्तर प्रदेश में बलात्कार और लड़कियों की नृशंस हत्या की अनुगूंज न केवल देश में, बल्कि संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका से लेकर पाकिस्तान तक में सुनाई दे रही है। पाकिस्तान ने तो कहा है कि हिंदुस्तान 'रेप कैपिटल' है। पहले भारत के लोग निर्भया के मसले पर दिल्ली को 'रेप कैपिटल' कह रहे थे, अब पूरे हिंदुस्तान के बारे में यह कहा जा रहा है। पाकिस्तान में सम्मान के नाम पर हत्या (ऑनर किलिंग), बलात्कार और ईश निंदा के नाम पर न जाने कितनी औरतों को मार दिया जाता है; वह भी पत्थरों से। वहां बलात्कार के मामले में मात्र पीड़िता के कहने से काम नहीं चलता, दो औरतों की गवाही चाहिए। इतना ही नहीं, वहां अक्सर इस मामले में दोषी औरत को ही ठहरा दिया जाता है। मगर अब ये बातें पीछे रह गई हैं। चूंकि दूसरे पर उंगली उठाना आसान है, इसलिए पाकिस्तान को भारत में वह सब नजर आ रहा है, जो उसे अपने यहां नहीं दिखता।

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अमेरिका की बात करें, तो वहां नौ-नौ साल के बच्चे मां-बाप बन रहे हैं। वहां टीन-एज प्रेगनेंसी बहुत ज्यादा है। वहां बलात्कार भी काफी होते हैं। मगर अपराध की ऐसी घटनाएं वहां मीडिया हाइप में तब्दील नहीं होतीं, जैसा कि हमारे यहां होता है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई खबर नहीं बनती। कोई वाशिंगटन को 'रेप कैपिटल' नहीं कहता। हालांकि हॉलीवुड की कई अभिनेत्रियां, गायिकाएं बचपन में अपने साथ हुए बलात्कार और यौन शोषण की बात स्वीकार कर चुकी हैं, मगर वहां का मीडिया इन्हें नहीं उछालता। हमारे यहां विज्युअल मीडिया न सिर्फ रात-दिन इसे दिखाता है, बल्कि खुद ही न्यायाधीश, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, ओपिनियन मेकर बन जाता है।
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कोई कहेगा कि औरतों के प्रति अगर कोई अत्याचार हो रहा है, तो उसे दिखाना क्योंकर गलत हुआ। बिलकुल नहीं, मेरा यह आशय नहीं है, बल्कि जिसने भी ऐसे अपराध किए हों, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिले। लेकिन अपराधी को सजा अदालत दे, ट्रायल करके मीडिया नहीं। अव्वल तो मीडिया ट्रायल कर पहले ही आरोपी को अपराधी बना दिया जाता है, फिर अगर कोई आरोपी बेगुनाह साबित होता है, तो वह खबर नहीं बनती, क्योंकि निगेटिव न्यूज का महत्व हमेशा से बहुत अधिक होता आया है।
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इतना ही नहीं, मीडिया कई बार दूसरी पार्टियों का प्रवक्ता बन बैठता है। जब वह किसी एक पार्टी पर आरोप लगाता है, तो जाने-अनजाने दूसरी पार्टियों की मदद कर रहा होता है। फिर एक राज्य की घटनाओं को बार-बार खबर बनाने से ऐसा महसूस होता है कि मानो पूरे भारत में औरतों के प्रति कोई अन्याय-अपराध हो ही नहीं रहा। दिल्ली में केंद्र सरकार की नाक के नीचे क्या बलात्कार नहीं हो रहे हैं? बताया तो जाता है कि मध्य प्रदेश में बलात्कार के आंकड़े उत्तर प्रदेश के आंकड़ों से दोगुने हैं। राजस्थान, बिहार, बंगाल, ओडिशा- आखिर देश का ऐसा कौन-सा राज्य है, जहां औरतें सुरक्षित हैं। आज भी गांव और कस्बों में औरतें दिन ढले तो क्या, सवेरे और दिन में भी बाहर निकलें, तो असुरक्षित हैं।


इसलिए अच्छा तो यह है कि औरतों के प्रति होने वाले अपराधों की मैपिंग की जाए। कहां-किस तरह के अपराध सबसे ज्यादा होते हैं, इस बात की जानकारी अगर हो, तो उन्हें रोकने के प्रयास आसानी से किए जा सकते हैं। जिले दर जिले रेप क्राइसिस सेंटर बनाए जाएं। सुझाव हर जिले में वन स्टॉप रेप क्राइसिस सेंटर बनाने का भी है, जहां महिलाओं को चिकित्सकीय सुविधा से लेकर काउंसलिंग, शिक्षा और रोजगार तक की सुविधा देने की बात शामिल है। ऐसे प्रयास स्वाभाविक तौर पर पीड़ित महिलाओं के जीवन में नई रोशनी ला सकते हैं। उन्हें किसी का आश्रित होने के मुकाबले अपने पांव पर खड़ा कर सकते हैं। संभव हो, तो मीडिया अपनी ऊर्जा इन जरूरतों को पूरी करने में लगाए और अपनी निष्पक्षता पर सवाल उठाने का मौका न दे।

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