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आस्था के नाम पर मनमानी नहीं

Mon, 24 Oct 2016 07:23 PM IST
रविशंकर प्रसाद
रविशंकर प्रसाद Updated Mon, 24 Oct 2016 07:23 PM IST
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Not arbitrary in the name of faith
रविशंकर प्रसाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार जेंडर जस्टिस यानी लैंगिक न्याय को भारत के संविधान की मूल भावना मानती है। धर्म के नाम पर करोड़ों महिलाओं को सामाजिक न्याय से वंचित नहीं रखा जा सकता। हमारा संविधान महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव नहीं करता है, अतः सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह धर्म और जाति के आधार पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करे। लेकिन तीन तलाक के मामले को सामान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। सरकार का यह दायित्व है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष रखे। तीन तलाक लैंगिक न्याय से जुड़ा मामला है, इसलिए किसी को भी इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। महिला सशक्तिकरण देश के सभी राजनीतिक दलों का दायित्व है। इस मसले को धार्मिक रंग भी नहीं देना चाहिए। हमारे संविधान के अनुसार, भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और महिलाओं के साथ न्याय हमारे संविधान के मूल में है। मोदी सरकार धर्म, जाति या पंथ के आधार पर महिलाओं से भेदभाव नहीं कर सकती। हम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकते।

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तीन तलाक पर सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखे जाने के बाद एक वर्ग लगातार सरकार और खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहा है। कई तरह से भ्रम फैलाने की सुनियोजित कोशिशें हो रही हैं। तीन तलाक के मुद्दे को समान नागरिक संहिता के साथ मिलाने की कोशिश हो रही है। सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है कि क्या सरकार आस्था के नाम पर ऐसे रीति-रिवाजों को जारी रखने का समर्थन करेगी, जिनसे संविधान की मूल भावनाओं को ठेस पहुंचती हो। इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का जिक्र करना न्यायसंगत होगा। वास्तविकता यह है कि ये अनुच्छेद लैंगिक समानता, बराबरी और सम्मान के साथ गरिमामय जीवन जीने का अधिकार देते हैं। तो क्या सरकार संविधान की मूल भावनाओं का सम्मान ही न करे? तीन तलाक पर सरकार के पक्ष का विरोध करने वालों को यह जानना चाहिए कि लैंगिक समानता और महिलाओं के सम्मान के मद्देनजर देश के संविधान ने पुरुषों के साथ महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार दिया है। वह भी उस समय, जब दुनिया के कई देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार हासिल नहीं था।
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दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मुद्दे पर सरकार सर्वोच्च न्यायालय में नहीं गई है। जिस समुदाय से विरोध की आवाजें उठ रही हैं, उसी समुदाय की पीड़ित महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय से तीन तलाक से मुक्ति दिलाने की गुजारिश की है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सरकार से अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा था। जहां तक केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सवाल है, तो सरकार और उनके एजेंडे में महिला कल्याण का मुद्दा सर्वोपरि है। मोदी सरकार ने आते ही भ्रूण हत्या खत्म करने के लिए 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरुआत की, सुकन्या समृद्धि योजना लागू की, इसके अलावा भी केंद्रीय योजनाओं में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अलग से कई प्रावधान किए। यहां तक कि लखनऊ में अपने हालिया कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने भ्रूण हत्या का विरोध करते हुए यह याद दिलाया कि एक सीता के लिए लंका जलाई गई, जबकि आज लाखों सीताओं की भ्रूण हत्या हो रही है। ऐसे में क्या यह सरकार आस्था के नाम पर आधी आबादी का दमन करने वाले रिवाजों का समर्थन कर सकती है? फिर सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार कहा है कि धर्मनिरपेक्षता इस देश का मूल तत्व है, जिसे कभी बदला नहीं जाएगा। ऐसे में एक धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के नाम पर एक बड़े वर्ग को असहाय भला कैसे छोड़ा जा सकता है? ऐसे में क्या किसी को आस्था के नाम पर विभेदकारी और घोर महिला-विरोधी प्रथा जारी रखने की इजाजत दी सकती है? तब क्या होगा, जब कोई आस्था के अधिकार के नाम पर छुआछूत और दहेज प्रथा जारी रखने की मांग करेगा? क्या इनका समर्थन सिर्फ इसलिए करना चाहिए कि ये धर्म से जुड़े हैं?
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तीन तलाक पर विवाद खड़ा करने के लिए इस पूरे मामले को धर्म से जोड़कर दिखाने की कोशिश की जा रही है। उदाहरण के लिए, यह तर्क दिया जा रहा है कि तीन तलाक की प्रथा चूंकि मजहब से जुड़ी है, ऐसे में इस मामले में हस्तक्षेप अनुचित है। मगर क्या यह सच नहीं है कि दर्जन भर से अधिक मुस्लिम देशों ने इसे नियंत्रित किया है, इसमें मध्यस्थता की शर्त जोड़ी है और यहां तक कि इसे समाप्त भी किया है? ईरान, मोरक्को, मिस्र, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान इन देशों में शामिल हैं। सवाल यह उठता है कि जब खुद को मुस्लिम बहुल, इस्लामी राष्ट्र घोषित कर चुके मुल्क तीन तलाक प्रथा पर नियंत्रण को पर्सनल लॉ-विरोधी नहीं पाया, तब भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में यही बात पर्सनल लॉ के खिलाफ कैसे हो गई। जहां तक सरकार के पक्ष का सवाल है, तो वह इसमें राजनीति नहीं कर रही। सरकार संविधान की मूल भावनाओं के पक्ष में और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ है। यह किसी धर्म विशेष का नहीं, बल्कि महिला वर्ग के भविष्य और सम्मान का सवाल है।


तीन तलाक पर सरकार के पक्ष को सही परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इस मामले में सरकार की भावना करोड़ों महिलाओं के अधिकार और आत्मसम्मान की है। क्या एक वर्ग की महिलाओं को उनके मूल अधिकारों से सिर्फ राजनीतिक कारणों से वंचित रखना उचित है? आज आजादी के लगभग सात दशक के बाद भी क्या उन्हें समाज में समान अधिकार नहीं मिलना चाहिए? मोदी सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए कृतसंकल्प है।

-लेखक केंद्रीय कानून, न्याय और आईटी मंत्री हैं

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