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मुद्दा: क्या होगा पूर्वोत्तर के कलादान प्रोजेक्ट का... लगातार आपूर्ति के लिए सशक्त नेवी आधारित टास्कफोर्स अहम

Thu, 05 Sep 2024 03:16 AM IST
r vikram singh आर विक्रम सिंह
Updated Thu, 05 Sep 2024 03:16 AM IST
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सार
म्यांमार गृह युद्ध, रोहिंग्या संघर्ष और बांग्लादेशी अस्थिरता का समाधान भारत के सीधे बस में तो नहीं है, फिर भी रास्ते तो निकाले जा सकते हैं।
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Northeast Kaladan project future Strong Navy based task force vital for continuous supply
कलादान परियोजना (फाइल) - फोटो : पीआईबी

विस्तार

बांग्लादेश वर्षों से हमारा मित्र देश रहा है, फिर भी भारत सरकार के अनुरोधों के बावजूद चटगांव या त्रिपुरा के माध्यम से हमें हमारे पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में आपूर्ति हेतु व्यापारिक मार्ग उपलब्ध नहीं कराया गया। हमारे पास मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा के लिए व्यापार का एकमात्र मार्ग सिलीगुड़ी कॉरिडोर के माध्यम से ही उपलब्ध है। कोलकाता से इंफाल तक जाने में हमारे ट्रकों को चार दिन लगते हैं। यदि हमें चटगांव से होकर मार्ग मिल गया होता, तो समय एवं परिवहन व्यय में बहुत बचत होती और व्यापारिक माल 36 से 48 घंटों में पहुंच जाता। शुल्क का लाभ बांग्लादेश को भी मिलता, लेकिन वह सहमत नहीं हुआ।



अब पूर्वोत्तर के लिए वैकल्पिक मार्ग हमारी रणनीतिक जरूरत है। युद्ध की स्थितियों में सिलीगुड़ी कॉरिडोर को काटकर असम, अरुणाचल प्रदेश व पूर्वोत्तर के शेष राज्यों से संपर्क बाधित कर देना चीन का लक्ष्य है। संपर्क मार्ग की तलाश में विशद सर्वेक्षणों में पाया गया कि म्यांमार के रखाइन राज्य में स्थित कलादान नदी इस उद्देश्य की पूर्ति  हेतु उपयुक्त है। म्यांमार सरकार की सहमति से यह प्रोजेक्ट अमल में आया है। कलादान नदी बंगाल की खाड़ी में गिरती है। भारत सरकार ने इस प्रोजेक्ट का नाम कलादान मल्टीनोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (केएमटीटीपी) रखा है। कलादान नदी की ड्रेजिंग करके उस पर स्थित बंदरगाह 'सितवे' की क्षमताएं पर्याप्त बढ़ाई गईं। सितवे से पलेटवा और पलेटवा से भारतीय सीमा तक 270 किमी लंबा राजमार्ग लगभग पूर्ण हो चुका है। सीमा से नेशनल हाईवे-54 को जोड़ने वाला 110 किमी का मार्ग भी पूरा होने के निकट है। सितवे बंदरगाह का उद्घाटन भारत के केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल एवं म्यांमार के मंत्री द्वारा 9 मई,  2023 को हुआ और तब से विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए 70 जहाजों का आगमन हो चुका है। अब तक 111 हजार टन सामान की ढुलाई की जा चुकी है। इस मार्ग से सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लंबे रास्ते की तुलना में समय एवं परिवहन व्यय में लगभग आधे की बचत हो रही है। अभी व्यापार की गति धीमी है।


नई समस्या यह है कि म्यांमार गृहयुद्ध के लपेटे में आ चुका है और सितवे नगर के आसपास युद्ध चल रहा है। इस मार्ग का एक महत्वपूर्ण स्टेशन पलेटवा नगर म्यांमार की सरकारी सेनाओं के कब्जे से निकलकर अराकान आर्मी नामक विद्रोही संगठन के कब्जे में आ गया है। यही क्षेत्र रोहिंग्याओं का भी है, जिनमें से बहुत से बांग्लादेश और भारत भाग चुके हैं। अभी भी उनकी छह लाख की आबादी यहां शेष है। अब जैसे इतना दुर्भाग्य ही कम नहीं था, उधर बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद वहां भी भीषण अस्थिरता व भय का माहौल है। अचानक मोड़ ले रहीं इन घटनाओं का प्रभाव व्यापार आपूर्ति आदि पर पड़ना अवश्यंभावी है। सितवे पोर्ट व संपूर्ण प्रोजेक्ट के संचालन पर संदेह के बादल छा गए हैं। यह भारत के राष्ट्रीय हित की दृष्टि से महत्वपूर्ण तीन हजार करोड़ की धनराशि के व्यय से बनाया गया प्रोजेक्ट है।

म्यांमार गृहयुद्ध, रोहिंग्या संघर्ष व बांग्लादेशी अस्थिरता की समस्याओं का समाधान भारत सरकार के सीधे बस में तो नहीं है, फिर भी रास्ते तो निकाले जा सकते हैं। यहां पर सबसे बड़ा हितधारक भारत ही है। म्यांमार से समझौते द्वारा ही भारत का यह प्रोजेक्ट चल रहा है। वह और भारत एक मेज पर हैं, लेकिन वहां म्यांमार के स्थान पर आज विद्रोहियों की सत्ता है। एक आकलन के अनुसार विद्रोहियों की सेनाओं की संख्या 15 से 30 हजार के बीच में होगी। वे कार्य बाधित करने में सक्षम हैं। बहरहाल, उनसे भी उनके हितों के मुताबिक वार्ता कर समाधान निकाला जा सकता है।

बतौर क्षेत्रीय विद्रोही संगठन उनके भी हित बंदरगाह के संचालन से जुड़ जाएंगे। यह सड़क बांग्लादेश की सीमा के चटगांव हिल क्षेत्र के समानांतर चलती है। जहां तक बांग्लादेश की अराजकता की बात है, तो वहां कोई क्षेत्रीय शक्ति ही अपना वर्चस्व कायम करेगी। इस तरह इस इलाके में अफ्रीका जैसा कानूनविहीन क्षेत्र बन जाने की पूरी आशंका है, जहां व्यवस्था कायम कर पाना बहुत बड़ी चुनौती होगी। उस अराजक क्षेत्र के प्रबंधन की जिम्मेदारी अंततः भारत के ही सिर पर आएगी। हमारा ही तो सबसे बड़ा हित भी प्रभावित हो रहा है।

चूंकि क्षेत्रीय बौनी शक्तियों के बीच में सबसे बड़ा हितधारक भारत ही है, ऐसी स्थिति में अराजकता को नियंत्रित करने के लिए हमें अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना आवश्यक होगा। भारतीय सेना और नेवी से गठित एवं नियंत्रित एक टास्कफोर्स को इस संपूर्ण कलादान व्यापारिक प्रोजेक्ट की रक्षा व प्रबंधन की जिम्मेदारी दी जा सकती है, जिससे क्षेत्रीय शक्तियां बंदरगाह के संचालन में दखल न दे सकें। बांग्लादेश के नए भारतविरोधी सत्ताधारी विदेशी शक्तियों, जेहादियों व आईएसआई जैसे संगठनों के संपर्क में हैं। वे भारत की समस्याएं बढ़ाने में हाथ बंटाएंगे। कलादान क्षेत्र में एक सशक्त नेवी आधारित टास्कफोर्स हमारी पूर्वोत्तर की आपूर्ति को लगातार संचालित रखना सुनिश्चित कर सकती है।

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