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लौटकर कब आओगे बापू!
अशोक बंसल
Updated Mon, 01 Oct 2012 09:35 PM IST
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बापू! संपूर्ण देश आज आपका जन्मदिन मना रहा है। आपका प्रिय भजन, 'रघुपति राघव राजा राम' बजाया जा रहा है। आपके फोटो सरकारी भवनों में टंगे हैं। पांच सौ रुपये के नोट पर आप मुस्करा रहे हैं। आपकी समाधि पर नेता पुष्पांजलि अर्पित करेंगे, फिर साल भर सत्ता के मद में चूर होकर तांडव करेंगे। आज राजनेता इतने साहसी हो गए हैं कि घोटालों एवं भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भी मुस्कराते नजर आते हैं।
बापू, आपने तो गरीबी को सबसे बड़ी हिंसा का दरजा दिया था, लेकिन आजादी के 65 वर्षों बाद भी यह हिंसा जारी है। अनाज गोदामों और खुले में सड़ रहा है और आधा भारत भूखा मर रहा है। आपका नाम जपने वाले इन नेताओं को गरीबों की सुध लेने की फुरसत नहीं है।
कुछ वर्ष पूर्व मैं आपके पोरबंदर वाले घर गया था। उसे अब सरकार ने संग्रहालय बना दिया है। बापू आप तो हाड़-मांस के इनसान थे, भगवान नहीं। फिर वहां आपका मंदिर क्यों बनवाया गया है? देश के नेता नहीं चाहते कि जनता आपके आदर्शों पर चले, सत्याग्रह और अनशन करे। इसलिए तो वे आपके रास्ते पर चलने वाले अन्ना हजारे के पराजय से खुश हैं। कुरसी पर बैठे नेताओं को डर है कि अगर लोग आपके रास्ते पर चलेंगे, तो उन्हें भी गोरों की तरह कुरसी छोड़नी पड़ेगी। शायद इसलिए उन्होंने आपको भगवान बना देने की चाल चली है। बापू, कितनी मजेदार बात है कि गोडसे के प्रशंसक भी अब चुनाव के वक्त आपका नाम बड़ी शिद्दत से लेने लगे हैं और कभी-कभी आपकी समाधि पर फूल-माला चढ़ा आते हैं। आज जनता को नहीं सूझ रहा कि क्षेत्रीयता को बढ़ावा देने वाले इन राजनेताओं से कैसे पार पाएं।
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बापू, आप आजादी की पूर्व संध्या पर कितने दुखी थे। सांप्रदायिकता का नंगा नाच हो रहा था और आपकी आत्मा बिलख रही थी। आप बिलकुल अकेला महसूस कर रहे थे। आपकी व्यथा नेहरू-पटेल को लिखे पत्रों में साफ झलकती है। देश की दिशा का अंदाजा तो आपको शायद हो ही गया था, लेकिन आपके जाने के बाद तो नेताओं ने विकास, सेवा, जनहित, स्वराज जैसे शब्दों की अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं। आपने तो शरीर और आत्मा की स्वतंत्रता को स्वराज माना था, इन लोगों ने येन-केन-प्रकारेण हासिल सत्ता को ही स्वराज मान लिया है। आज देश की जनता इनके लिए मात्र एक वोट है। बापू, हमें आपकी बेहद जरूरत है, इन देशी अंगरेजों को हटाने के लिए। आप कब आओगे?
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बापू, आपने तो गरीबी को सबसे बड़ी हिंसा का दरजा दिया था, लेकिन आजादी के 65 वर्षों बाद भी यह हिंसा जारी है। अनाज गोदामों और खुले में सड़ रहा है और आधा भारत भूखा मर रहा है। आपका नाम जपने वाले इन नेताओं को गरीबों की सुध लेने की फुरसत नहीं है।
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कुछ वर्ष पूर्व मैं आपके पोरबंदर वाले घर गया था। उसे अब सरकार ने संग्रहालय बना दिया है। बापू आप तो हाड़-मांस के इनसान थे, भगवान नहीं। फिर वहां आपका मंदिर क्यों बनवाया गया है? देश के नेता नहीं चाहते कि जनता आपके आदर्शों पर चले, सत्याग्रह और अनशन करे। इसलिए तो वे आपके रास्ते पर चलने वाले अन्ना हजारे के पराजय से खुश हैं। कुरसी पर बैठे नेताओं को डर है कि अगर लोग आपके रास्ते पर चलेंगे, तो उन्हें भी गोरों की तरह कुरसी छोड़नी पड़ेगी। शायद इसलिए उन्होंने आपको भगवान बना देने की चाल चली है। बापू, कितनी मजेदार बात है कि गोडसे के प्रशंसक भी अब चुनाव के वक्त आपका नाम बड़ी शिद्दत से लेने लगे हैं और कभी-कभी आपकी समाधि पर फूल-माला चढ़ा आते हैं। आज जनता को नहीं सूझ रहा कि क्षेत्रीयता को बढ़ावा देने वाले इन राजनेताओं से कैसे पार पाएं।
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बापू, आप आजादी की पूर्व संध्या पर कितने दुखी थे। सांप्रदायिकता का नंगा नाच हो रहा था और आपकी आत्मा बिलख रही थी। आप बिलकुल अकेला महसूस कर रहे थे। आपकी व्यथा नेहरू-पटेल को लिखे पत्रों में साफ झलकती है। देश की दिशा का अंदाजा तो आपको शायद हो ही गया था, लेकिन आपके जाने के बाद तो नेताओं ने विकास, सेवा, जनहित, स्वराज जैसे शब्दों की अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं। आपने तो शरीर और आत्मा की स्वतंत्रता को स्वराज माना था, इन लोगों ने येन-केन-प्रकारेण हासिल सत्ता को ही स्वराज मान लिया है। आज देश की जनता इनके लिए मात्र एक वोट है। बापू, हमें आपकी बेहद जरूरत है, इन देशी अंगरेजों को हटाने के लिए। आप कब आओगे?