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उदासीन माहौल में नेपाली चुनाव

Wed, 23 Oct 2013 07:42 PM IST
यशोदा श्रीवास्तव
यशोदा श्रीवास्तव Updated Wed, 23 Oct 2013 07:42 PM IST
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No exitment about Nepali election

नेपाली संविधान सभा के दूसरे कार्यकाल के चुनावों को लेकर मतदाताओं में कोई उत्साह नहीं दिख रहा है। यह रुख बरकरार रहा, तो मतदान प्रतिशत काफी कम रहेगा। चुनाव आयोग भी काफी सख्त है। आचार संहिता की ऐसी घेरेबंदी दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश के चुनाव में शायद ही पहले कभी देखी गई हो। उम्मीदवार बिना माइक के केवल दो जीपों का ही प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे में घर-घर जाकर वोट मांगना सबसे सही विकल्प साबित हो रहा है। हर उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की सीमा 10 लाख नेपाली रुपये रखी गई है। भारतीय रुपये से तुलना करने पर यह तकरीबन छह लाख रुपये के आसपास है।

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दरअसल, अप्रैल 2008 में संविधान सभा के लिए हुए चुनाव का मूल उद्देश्य संविधान का निर्माण करना था। पर देश की पहली संविधान सभा इसमें विफल रही। इसलिए दूसरी बार चुनाव कराने की नौबत आई है। संविधान सभा के दूसरे कार्यकाल में देश के संविधान का निर्माण हो पाता है या नहीं, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन चुनाव को लेकर पौने तीन करोड़ जनता की बेरुखी वहां के निराशाजनक हालात बताने के लिए काफी है।
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इस बार संविधान सभा का कार्यकाल दो वर्ष का होगा, जबकि पिछली बार ढाई वर्ष का समय तय किया गया था। ढाई वर्ष के प्रस्तावित कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाया गया। इस दौरान प्रचंड से लेकर माधव कुमार नेपाल, शेर बहादुर देउबा और बाबूराम भट्टराई, सभी ने नेपाली जनता के हित में लोक कल्याणकारी संविधान की रचना का भरोसा दिया, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
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नेपाल के कुल 75 जिलों में 240 सीटें हैं। इतनी ही सीटों पर अप्रत्यक्ष चुनाव होगा। इन सीटों पर जीत-हार का फैसला पार्टी को मिले कुल वोटों के प्रतिशत से तय होगा। लेकिन अलग-अलग सीटों पर मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता भी है। मसलन, कुछ सीटों पर 20 हजार मतदाता हैं और कुछ पर केवल पांच हजार। नेपाल की 65 फीसदी आबादी तराई में निवास करती है। यहां के 22 जिलों में कुल 116 सीटें हैं। इसलिए सभी पार्टियों का यहां विशेष जोर रहता है। इस क्षेत्र को एक जमाने में नेपाली कांग्रेस का गढ़ माना जाता था।

इस चुनाव में सभी राजनीतिक दलों का वायदा तो संविधान निर्माण का ही है, लेकिन नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इसे लेकर सबसे ज्यादा जोश में दिख रही है। यह अलग बात है कि सभा के पहले कार्यकाल में संविधान निर्माण न कर पाने का दाग इसी के ऊपर है। पिछले दिनों बुटवल शहर में एक चुनावी सभा के दौरान नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड ने विश्वास से लबरेज होकर कहा कि उनकी पार्टी भारी बहुमत से चुनाव जीतने जा रही है और वे लोग ही संविधान का निर्माण करेंगे। इस पार्टी में दूसरे नंबर के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ बाबूराम भट्टराई यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं।


बुटवल पहाड़ और तराई का संगम माना जाता है, इसलिए भट्टराई को यहां से चुनाव लड़ाने के पीछे पार्टी की मंशा पहाड़ और तराई, दोनों का हितचिंतक साबित करना है। लेकिन जिस तरह प्रचंड की चुनावी सभा में तकरीबन 500 लोग ही जुटे, उससे इतना तो साफ हो गया है कि तराई क्षेत्र में 2008 की तरह 42 सीटें जीत पाना पार्टी के लिए बेहद मुश्किल है। कुल मिलाकर, इस चुनाव में प्रचंड की पार्टी को लेकर जनता में वैसा जोश और जनून नहीं दिख रहा है, जैसा 2008 में था। बल्कि इस बार तो मतदाताओं का झुकाव थोड़ा नेपाली कांग्रेस की तरफ दिख रहा है। रही बात मधेशी दलों की, तो मधेश क्षेत्र में उनकी विश्वसनीयता काफी गिरी है। पूरे चुनावी परिदृश्य से एक बात तो स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ रही है कि नेपाली कांग्रेस की सीटें कुछ बढ़ सकती हैं, लेकिन सरकार बनाने का उनका दावा दूर-दूर तक फलीभूत होता नहीं दिख रहा है। दूसरी ओर प्रचंड की पार्टी को भी पूर्ण बहुमत मिलने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। ऐसे में संविधान सभा के दूसरे चुनाव के बाद भी गठजोड़ वाली सरकार बनने के पूरे आसार हैं और इसमें मधेशी दलों और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाली एमाले कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

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