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सियासत: इतनी भगदड़ के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व के रवैये में बदलाव नहीं
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मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी।
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विस्तार
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में धूमिल संभावनाओं को देखते हुए कांग्रेस एक विखंडित पार्टी के रूप में नजर आ रही है। वर्ष 2014 लेकर अब तक पार्टी ने 50 से ज्यादा प्रभावशाली नेताओं, जिनमें 15 मुख्यमंत्री और इतने ही पूर्व केंद्रीय मंत्री, एआईसीसी पदाधिकारी और अन्य प्रतिष्ठित लोग शामिल हैं, को बाहर निकलते देखा है। पिछले दस वर्षों में पंद्रह पूर्व मुख्यमंत्रियों के पार्टी से बाहर जाने के बावजूद एक भी मामले में कांग्रेस नेतृत्व ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि इतने सारे वरिष्ठ और दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर क्यों जा रहे हैं। इसने डॉ अजय कुमार, अरविंदर सिंह लवली, कृष्णा तीरथ, अलका लांबा जैसे उन थोड़े से पार्टी नेताओं से प्रतिक्रिया लेने की भी कोशिश नहीं की, जो वास्तव में पार्टी में लौट आए थे।संयोग से यह पहला अवसर नहीं है, जब कांग्रेस का भविष्य खराब दिख रहा है या गांधी परिवार पर हमले हो रहे हैं। इंदिरा गांधी को दो बार 1969 एवं 1977 में ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने अपने विरोधियों को परास्त कर बाजी पलट दी।
यहां तक कि जब 1987 में राजीव गांधी का पतन शुरू हुआ, तो कई नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनमोर्चा के गठन के लिए पार्टी छोड़कर चले गए। नरसिंह राव के कार्यकाल में अरुण सिंह, एनडी तिवारी, एस बंगरप्पा, माधवराव सिंधिया और ममता बनर्जी पार्टी जैसे नेता पार्टी से बाहर हो गए। वर्ष 1999 में शरद पवार ने अपनी अलग राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई। लेकिन 2014 के बाद कोई विभाजन नहीं हुआ, जो थोड़ा असामान्य है।
क्या ऐसा इसलिए है, क्योंकि वर्तमान कांग्रेस नेता अलग हुए समूहों को राजनीतिक रूप से व्यावहारिक नहीं पाते हैं? या फिर ऐसी भावना है कि कांग्रेस की विचारधारा को कोई अपनाने वाला नहीं है, इसलिए विपरीत खेमे यानी भाजपा में शामिल होना ही समझदारी है?
पार्टी छोड़ने वाले नेताओं को दोष देने के बजाय कांग्रेस को अपने वैचारिक ढांचे को मजबूत करना होगा और ‘क्या करें’ तथा ‘क्या नहीं करें’ की एक सूची बनानी होगी। लेखक जहीर मसानी ने एक बार पूर्व प्रधानमंत्री को उद्धृत करते हुए कहा था कि कोई 'व्यक्ति जो राष्ट्र प्रमुख हो, वह व्यावहारिक न होने का जोखिम भला कैसे उठा सकता है। आपको हर दिन व्यावहारिक बनना पड़ता है। लेकिन आपको अपनी व्यावहारिकता को किसी प्रकार के आदर्शवाद से जोड़ना होगा, अन्यथा आप जो करना चाहते हैं, उसके लिए लोगों को उत्साहित नहीं कर पाएंगे।' राहुल की कांग्रेस में पार्टी की विचारधारा लोगों को उत्साहित करने में विफल रही है।
'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी', 'जाति आधारित जनगणना', 'खून की दलाली', 'चौकीदार चोर है' जैसी राहुल की टिप्पणियों और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जाने से इन्कार ने पार्टी विचारधारा को मजबूत बनाया है। दिवंगत वीएन गाडगिल ने कहा था कि भावनात्मक मुद्दों पर कांग्रेस दो पाटों के बीच फंस गई है। इसके अलावा, राहुल गांधी गैर-परंपरागत और लापरवाह नेता के रूप में दिखते हैं। पूर्व कांग्रेस प्रमुख के रूप में राहुल लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं, समर्थकों और मतदाताओं की भावनाओं और संवेदनाओं को उचित महत्व दिए बिना अपने अधिकार की भावना से ग्रस्त दिखे।
ऐतिहासिक रूप से अपने राजनीतिक अभियानों में धर्म को मिलाने की कांग्रेस की कोशिश समस्याग्रस्त रही है। धर्म एवं राजनीति को लेकर जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी के विचारों में भारी विरोधाभास थे। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक 24, अकबर रोड में उल्लेख किया है, नेहरू धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा को लेकर दृढ़ थे, जिसका मतलब था जीवन के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू से धर्म को अलग रखना। नेहरू के विचार से, धर्म एक व्यक्तिगत मामला है, जिससे राज्य को हर कीमत पर अलग होना चाहिए।
लेकिन महात्मा गांधी के लिए धर्म धर्मनिरपेक्षता का अभिन्न हिस्सा था। गांधी कहते थे कि 'धर्म रहित राजनीति पूरी तरह गंदगी है।' राहुल गांधी का 'मुस्लिम बुद्धिजीवियों' को शामिल करने का कदम, शशि थरूर की भारत के 'हिंदू पाकिस्तान' में बदलने की आशंका और 2019 में कांग्रेस के घोषणापत्र में जम्मू-कश्मीर से सुरक्षा बलों को आंशिक रूप से वापस बुलाने की पेशकश का नकारात्मक असर हुआ।
वर्ष 1969, 1977, 1989 या 1996 से कहीं ज्यादा वर्ष 2024 में कांग्रेस को विश्वसनीय नेतृत्व, चुनावी सफलता और आत्मविश्वास की जरूरत है। लेकिन कांग्रेस उम्मीदवारों की पहली सूची सांगठनिक उद्देश्यों के बजाय व्यक्तिगत हितों से प्रेरित लगती है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल हाल ही में विधायक चुने जाने के बावजूद राजनंदगांव से चुनाव लड़ रहे हैं। बघेल की योजना के अनुसार, राजनंदगांव से जीत जाने पर वह कांग्रेस के एक विश्वसनीय पिछड़े नेता के रूप में सामने आएंगे। दूसरी तरफ, राजस्थान में अशोक गहलोत स्वयं तो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन जालौर से अपने बेटे वैभव की उम्मीदवारी पर जोर दे रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि गहलोत राजस्थान की आधा दर्जन सीटों पर भी कांग्रेस प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं। वर्ष 2014 और 2019 में कांग्रेस 25 सीटों में से एक भी सीट जीत नहीं पाई।
अलपुझ्झा सीट से एआईसीसी संगठन प्रभारी महासचिव केसी वेणुगोपाल की उम्मीदवारी देखकर कई कांग्रेसी भी हैरान रह गए। केसीवी फिलहाल राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं और उनका कार्यकाल 2028 तक है। यदि लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वह राज्यसभा सीट छोड़ते हैं, तो वह सीट भाजपा के पास चली जाएगी। कथित तौर पर यदि कांग्रेस 2024 के चुनाव में 55 या उससे अधिक सीटें जीतने में कामयाब होती है, तो केसीवी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने की उम्मीद में चुनाव लड़ रहे हैं। केसीवी इस धारणा पर अपनी संभावनाओं की कल्पना कर रहे हैं कि राहुल गांधी वायनाड से जीतने के बाद नेता प्रतिपक्ष की भूमिका नहीं निभाएंगे और शशि थरूर, भूपेश बघेल या मनीष तिवारी अगर जीतते भी हैं, तो पार्टी अधीर रंजन चौधरी जैसे चेहरों की तलाश करेगी। यदि 18वीं लोकसभा में वास्तव में ऐसा होता है, तो कांग्रेस को कुछ और नेताओं के पार्टी छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।