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नीतीश ने बदल दिए समीकरण

Thu, 03 Aug 2017 09:45 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Thu, 03 Aug 2017 09:45 PM IST
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Nitish changed the equation
नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने वही किया, जो उन्हें करना था-बिहार में पाला बदलते हुए महागठबंधन को तोड़कर उन्होंने भाजपा के साथ सरकार बनाई। और अब, उन्होंने कहा है कि 2019 में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। उन्होंने अपने पुराने सहयोगियों-राजद और कांग्रेस को छोड़ दिया है। जाहिर है, इसका प्रभाव सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा और आने वाले समय में यह दिखेगा। नीतीश ने जो किया, उसके पीछे उनके अपने कारण थे और उनमें से कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं दे सकते। पर वह पहले भी मुख्यमंत्री थे और अब भी मुख्यमंत्री हैं, तो फिर एक नाव से कूदकर दूसरे नाव पर सवार होने से उन्हें क्या हासिल हुआ?

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वर्ष 2020 में, जब बिहार में अगला विधानसभा चुनाव होना है, उन्हें लालू यादव द्वारा मुख्य भूमिका में स्वीकार नहीं किया जा सकता था, भले ही महागठबंधन जीतकर सत्ता में लौटता तब भी। 2015 में कांग्रेस ने ही चुनाव से पहले नीतीश कुमार को महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए लालू यादव को मनाया था। 2015 की तरह 2020 में भी जदयू और कांग्रेस से बड़े दल के रूप में लालू यादव के राजद के उभरने की पूरी संभावना थी। इसका सीधा कारण है कि लालू को एक बड़ी जाति यादव का समर्थन हासिल है, जिसकी संख्या 14 फीसदी है, जबकि नीतीश कुमार उस छोटे से समुदाय से आते हैं, जिनकी आबादी बहुत कम (ढाई फीसदी) है। लालू का मुस्लिम-यादव गठजोड़ एक ऐसा समीकरण है, जिसका सीटों के लिहाज से बड़ा फायदा है।
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भाजपा ने भी 2020 में नीतीश को मुख्यमंत्री पद का आश्वासन नहीं दिया होगा। यदि जदयू-भाजपा गठबंधन 2019 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करता है, तो भाजपा नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों बनाएगी और वह क्यों नहीं अपने किसी नेता को उस पद पर स्थापित करेगी? कई राज्यों में सत्ता पर कब्जा करने की भाजपा की प्रवृत्ति स्पष्ट है। इसलिए मुख्यमंत्री पद तो स्पष्ट रूप से इसका कारण नहीं था, जब तक कि 2020 से पहले लालू प्रसाद यादव द्वारा उनकी सरकार को गिराने का डर नहीं था। राजद प्रमुख जदयू के मुस्लिम और यादव विधायकों से दोस्ती गांठ रहे थे, जिनकी संख्या 18 है, और वह उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार के पक्ष में वोट देने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे। जाहिर तौर पर लालू ने कांग्रेस के नेताओं के सामने दावा किया कि वह जदयू को तोड़कर कांग्रेस के साथ एक वैकल्पिक सरकार बना सकते हैं, हालांकि ऐसा करना आसान नहीं था।
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नीतीश के कदम के पीछे उनकी अपनी दो खास विशेषताओं को बचाने की चाहत हो सकती है-स्वच्छ छवि और सुशासन का ट्रैक रिकॉर्ड-जिसका खासा नुकसान हो रहा था। यही वे दो कारक हैं, जिन्होंने कई लोगों को नीतीश को नेता मानने के लिए प्रेरित किया। लालू यादव के मतदाताओं के लिए भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। नीतीश कुमार के मतदाताओं के लिए (क्योंकि नीतीश का जनाधार वही वर्ग है, जो भाजपा का है) भ्रष्टाचार, काला धन और विकास आज सबसे बड़ा मुद्दा है। हालांकि यादवों में भी कई महत्वाकांक्षी युवा हैं, जो लालू यादव द्वारा दी गई आवाज (मुखरता) से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं, उनमें से कुछ ने 2014 में मोदी को वोट दिया था। अपने मतदाताओं की भावनाओं को देखते हुए ही नीतीश ने नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक और रामनाथ कोविंद का समर्थन किया था।

नीतीश कुमार की मजबूरी समझी जा सकती है। वह लालू यादव के मुकाबले सुशील मोदी के साथ काम करने में ज्यादा राहत महसूस कर सकते हैं। और उन्होंने शायद अच्छी तरह से यह गणना कर ली कि अगर उन्हें अपने करियर के अस्ताचल की ओर ही बढ़ना है, तो अगले तीन वर्षों में कुछ अच्छा काम करके अपनी दो विशेषताओं (स्वच्छ छवि और सुशासन) को बरकरार रखना बेहतर है। लेकिन उनकी विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसे हासिल करना कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है। यह नीतीश जैसे नेता के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो सिद्धांतों की राजनीति करने का दावा करते हैं। मोदी, भाजपा और आरएसएस के खिलाफ दिए गए उनके बयानों को भुलाना आसान नहीं है।

विडंबना यह है कि नीतीश के इस कदम से एक तरह से लालू यादव को मजबूती मिल सकती है, जो कई मामलों में फंसे हैं। अभी मुस्लिम-यादव वोटबैंक में उनके प्रति सहानुभूति दिखती है। लालू की नजर फिर से दलित/ एमबीडब्ल्यू समुदायों पर कब्जा करने की है, जो कभी उनके साथ थे। जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा (जिनके नेताओं को नीतीश ने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया) की नाराजगी को देखते हुए आने वाले वक्त में जदयू और भाजपा के बीच विवाद की स्थिति में वह फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। लालू यादव तेजस्वी को प्रोजेक्ट कर बिहार में संघर्ष को नीतीश बनाम तेजस्वी बनाने में लगे हुए हैं। उन्होंने हिसाब लगा लिया है कि ऐसा करने से उनके छोटे बेटे को उच्च हैसियत हासिल होगी, जो स्पष्टतः उनका उत्तराधिकारी है। वैसे भी लालू और उनके परिजनों के खिलाफ काफी बेनामी संपत्ति हासिल करने के मामले में आरोपों के कारण उन्हें सत्ता-राजनीति से बाहर होना ही था, पर नीतीश के कदम से उन्हें संजीवनी मिली है, जो अपनी कानूनी लड़ाई राजनीतिक ढंग से लड़कर विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं। अब यह रणनीति कितनी कामयाब होती है, यह देखने वाली बात होगी।


देखने वाली बात यह भी होगी कि क्या शरद यादव जदयू में विभाजन करने में सक्षम होंगे या नीतीश की तीखी आलोचना करते हुए जदयू में बने रहेंगे? बिहार के राजनीतिक भाइयों (लालू-नीतीश) से अलग समग्र रूप से इस प्रकरण में लाभ में भाजपा रही है। बिहार की सत्ता में भाजपा के शामिल होते ही उत्तर भारत का नक्शा भगवा रंग में रंग गया है। और इस घटनाक्रम ने 2019 में विपक्षी एकता के लिए दस्तक दे दी है।

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