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निर्मला सिंह की कविताएं
निर्मला सिंह
Updated Sun, 16 Jun 2013 01:31 AM IST
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बीते हुए कल की जगह 'आज' को तरजीह देती हुई निर्मला सिंह के यहां शब्दों की जो सहजता दिखती है, उसे पाने में अक्सर उम्र खर्च हो जाती हैं। बरेली में रहती हैं।
भीड़
मैं सड़क की भीड़ में
एक समूचा
आदमी
न खोज पाई
एक-एक टुकड़ा बीनती रही
फिर भी न जोड़ पाई
पता ही नहीं चला
भीड़ में से आदमी
कब खो गया?
बिखर गया, खिसक गया
मुट्ठी में बंद रेत की तरह
और मुझे बरसों हो गए हैं
मैं उसे खोज रही हूं
कभी नितांत अकेले में
कभी भीड़ में
और हो जाती हूं
पराजित
क्योंकि आदमी
आदमी की भीड़ में है ही नहीं
वृत्त
मैंने एक वृत्त बनाया
छोटा लगा
दूसरा बनाया
छोटा लगा
लक्ष्य बिंदु के चारों ओर बनाये
सभी वृत्त/ छोटे लगे
अब मैंने वृत्त बनाने छोड़ दिये हैं
लक्ष्य बिंदु तक पहुंचने के लिए
चारों ओर से अनगिनत रेखाएं खींचनी शुरू कर दी हैं।
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भीड़
मैं सड़क की भीड़ में
एक समूचा
आदमी
न खोज पाई
एक-एक टुकड़ा बीनती रही
फिर भी न जोड़ पाई
पता ही नहीं चला
भीड़ में से आदमी
कब खो गया?
बिखर गया, खिसक गया
मुट्ठी में बंद रेत की तरह
और मुझे बरसों हो गए हैं
मैं उसे खोज रही हूं
कभी नितांत अकेले में
कभी भीड़ में
और हो जाती हूं
पराजित
क्योंकि आदमी
आदमी की भीड़ में है ही नहीं
वृत्त
मैंने एक वृत्त बनाया
छोटा लगा
दूसरा बनाया
छोटा लगा
लक्ष्य बिंदु के चारों ओर बनाये
सभी वृत्त/ छोटे लगे
अब मैंने वृत्त बनाने छोड़ दिये हैं
लक्ष्य बिंदु तक पहुंचने के लिए
चारों ओर से अनगिनत रेखाएं खींचनी शुरू कर दी हैं।