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मानवाधिकार आयोग की दंतहीनता
सुभाष गाताडे
Updated Wed, 20 Jul 2016 07:03 PM IST
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सुभाष गाताडे
मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यू यू ललित की द्विसदस्यीय पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में न केवल फर्जी मुठभेड़ों की नए सिरे से जांच का आदेश दिया, बल्कि दशकों से इलाके में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून और उसी के तहत सुरक्षाबलों को मिले असीमित अधिकारों को प्रश्नांकित किया। यही नहीं, अपने फैसले में पीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) जैसी संस्था के ‘दंतहीन बाघ’ बनते जाने की स्थिति पर भी चिंता प्रकट की और इसे देश में जनतंत्र के विकास के लिए अशुभ संकेत बताया।
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कुछ वक्त पहले एनएचआरसी के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने भी कहा था कि चूंकि एनएचआरसी को सशक्त नहीं बनाया गया है, इसलिए उसकी हालत दंतहीन बाघ की तरह है। उनके मुताबिक आयोग के सदस्य मेहनत से मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करते हैं, साक्ष्यों को एकत्रित करते हैं और जब मामले में नतीजे पर पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि आयोग महज सुधारात्मक उपायों की सिफारिश कर सकता है या पीड़ित पक्ष को मुआवजा देने का निर्देश दे सकता है। और यह भी उन संबंधित अधिकारियों पर निर्भर है कि वे सिफारिशों को मानें या न मानें।
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राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की भूमिका, संरचना, कार्य को लेकर कई जिम्मेदारियों को पेरिस सिद्धांतों में प्रस्तुत किया गया है। अब अगर हम उन सिद्धांतों पर गौर करें, तो उसमें स्पष्ट कहा गया है कि उन्हें कार्य के स्तर पर एवं वित्तीय मामलों में मानवाधिकार आयोग को स्वतंत्र होना चाहिए।
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कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त ने अपने पांच पृष्ठ के पत्र में स्पष्ट किया था कि 1993 के कानून द्वारा गठित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कई स्तरों पर पेरिस सिद्धांतों का उल्लंघन करता दिखता है। प्रस्तुत पत्र में मुख्यतः पांच बिंदुओं पर आयोग की आलोचना की गई थी। पहला सवाल आयोग की संरचना में विविधता के अभाव से जुड़ा था। आयोग की संरचना में न्यायपालिका के वर्चस्व को लेकर सवाल उठाए गए थे। दूसरा सवाल एनएचआरसी के दो अहम पदों - सेक्रेटरी जनरल और डायरेक्टर जनरल आफ इन्वेस्टिगेशंस - से जुड़ा था। आयोग के संविधान के हिसाब से इन दो पदों पर नियुक्त व्यक्ति सरकार की तरफ से भेजे जाएंगे। इसके चलते आयोग की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है। आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर तीसरी आपत्ति मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ सीमित अंतक्रिया से जुड़ी थी। संयुक्त राष्ट्र की तरफ से भेजे गए स्पेशल रेपोर्टियर यह देखकर दंग रह गए कि मानवाधिकार उल्लंघन की जो शिकायतें आयोग के पास पहुंचती हैं, उनकी जांच का जिम्मा पुलिस को सौंपा जाता है, जो अधिकतर मामलों में खुद उल्लंघन के लिए जिम्मेदार होती है। नतीजतन शिकायतों का या तो निपटारा नहीं होता या लंबे अंतराल के बाद कह दिया जाता है कि कोई उल्लंघन नहीं हुआ। इसके अलावा आयोग की वार्षिक रिपोर्टों को देर से सार्वजनिक करने को लेकर भी आपत्ति दर्ज की थी गई।
एनएचआरसी के अध्यक्ष एचएल दत्तू ने एक अहम बात कही थी कि ‘अब यह सांसदों पर निर्भर करता है कि वे फैसला करें कि आयोग की सिफारिश को मानने के लिए संबंधित अधिकारी बाध्य हो।’ क्या देश की संसद आयोग के अध्यक्ष के इन सरोकारों पर गौर कर सकेंगी, यह मसला देखने लायक है।