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गांवों में नए सत्ता केंद्रों का उदय
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Thu, 03 Jan 2013 12:11 AM IST
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संविधान के 73 वें संशोधन में, जो 24 अप्रैल 1993 को प्रभावी हुआ और जिसके द्वारा त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की नींव पड़ी, पंचायतों के लिए निर्धारित 29 कार्यक्षेत्रों की दिशा में शायद ही कुछ किया गया हो। अगर हम सबसे निचले स्तर की ग्राम पंचायतों की बात करें, तो वे विकास के सोपान गढ़ने के बजाय असामाजिकता, लूट, फूट और झूठ की ओर बढ़ते ग्राम विनाश की कहानी लिख रही हैं।
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देश की सभी 28 लाख 10 हजार ग्राम पंचायतों की तस्वीर भले ऐसी न हो, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में तो, जहां सामंती शक्तियां मजबूत रही हैं, ऐसा ही दिखाई दे रहा है। लक्ष्मीमल्ल सिंघवी समिति की सिफारिशों पर ग्राम पंचायतों को वित्तीय संसाधन देकर जिस विकास की कल्पना की गई थी, वह लूट और लंपटई तक सीमित होकर रह गया।
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गांवों का विकास तो हुआ नहीं, हां, प्रधानों के दरवाजों पर बड़ी गाड़ियां, ट्रैक्टर, कंबाइन, थ्रेशर और हरवेस्टर जरूर आ गए। ग्राम प्रधानों के पदों पर समाज के निचले तबके को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक समानता लाने की जहां कल्पना की गई, वहीं धन-बल के नए उभार ने दुश्मनी की ऐसी नींव डाली कि प्रधानी का चुनाव रणभूमि बन गया।
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वर्ष 1989 में जवाहर रोजगार योजना का शुभारंभ कर पंचायतों को सीधे धन उपलब्ध कराने तथा विकास का ख्वाब बुनने का यथार्थ सामने है। कुछ अपवादों को छोड़कर सरकारी धन से लूट के रास्ते निकाल लेने वाले तंत्र ने लूट के तौर-तरीकों को और आसान बना दिया।
गांवों में सरकारी धन के नियंत्रण की सुदृढ़ व्यवस्था न होने के कारण बिना काम या दिखावे के कुछ गैरजरूरी कामों के सहारे धन की बंदरबांट आसान हो गई। इस प्रक्रिया में ग्राम प्रधानों ने अपने काम-धंधों के साथ-साथ मुफ्त में धन कमाने और अपनी हैसियत मजबूत करने का हथियार प्राप्त कर लिया। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना(नरेगा) का शुभारंभ 2005 से हुआ, तो कमाऊ योजनाओं का विस्फोट हो गया।
प्रधानी के चुनावों में पांच-पांच लाख खर्च किए जाने लगे। दावत, दारू और पैसा बांटकर गांवों को बिकाऊ बनाया गया, ताकि केंद्र और राज्य सरकारें आसानी से प्रधानों के सहारे गंवई वोट बैंक को खरीद सकें। यहीं से गांवों में सामाजिक संबंधों के क्षरण की शुरुआत हुई। आज गांवों में जो अकूत पैसा जा रहा है, उसका अधिकांश, बिना किसी बुनियादी विकास के प्रधानों और कुछ हद तक ब्लॉक के अधिकारियों/कर्मचारियों की जेब में जा रहा है।
सरकार ने मनरेगा के ऑडिट की जो व्यवस्था तैयार की है, वह भ्रष्टाचार बढ़ाने वाली है। संविदा पर तैनात किए गए लेखा परीक्षकों के जेहन में यह बात है कि उनकी नौकरी स्थायी नहीं है। वे पंचायती राज विभाग, मुख्यत: राजनेताओं के रहम-ओ-करम पर हैं, इसलिए लेने-देने के खेल के अलावा और कुछ होना नहीं है।
मनरेगा की सफलता का प्रचार तो किया जा रहा है, पर यह नहीं बताया गया कि इससे गांवों की तस्वीर में क्या सुधार हुआ। गांवों के ज्यादातर तालाब पट्टे पर हैं और वे प्रधानों के ही कब्जे में हैं, जिनमें वे मछलियां पालते हैं और मनरेगा धन से खुदाई दिखा कर अतिरिक्त लाभ कमाते हैं।
मनरेगा का जॉब कार्ड प्रधान की मर्जी से बनता है और बैंक खाते में गया पैसा मजदूरों द्वारा निकाल कर पहले प्रधान का हिस्सा सौंप दिया जाता है। मजदूरों को गांव में रहना है, तो बिना काम प्रधान की मर्जी से जो कुछ मिल जा रहा है, उसे स्वीकार करने में ही भलाई है। केवल कमजोर तबके के प्रधानों को ही सोशल ऑडिट का डर है और वही कुछ जरूरी काम करा रहे हैं।
विगत वर्ष मनरेगा के मद में 46,000 करोड़ का प्रावधान रहा, यानी 74 करोड़ ग्रामीण आबादी के लिए प्रति व्यक्ति 600 रुपये। इतना धन खर्च कर अगर गांवों का विकास हुआ होता, तो हजारों किसानों ने आत्महत्या नहीं की होती। ज्यादातर सरकारी योजनाएं गांवों के संरचनात्मक विकास के बजाय खैरात बांटकर गांवों को निकम्मा बना रही हैं।
इसका सीधा प्रभाव खेती पर पड़ रहा है। प्रधानों ने दबंगई के तमाम रास्ते अपनाकर गांव के वोट बैंक पर कब्जा जमा लिया है और सरकारें प्रधानों को पटाकर चुनाव जीतने की प्रक्रिया अपना रही है। इस तरह तो पंचायती राज का सपना पूरा नहीं होने वाला।