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कश्मीर में नया धर्मसंकट
दयाशंकर शुक्ल सागर
Updated Mon, 10 Sep 2018 06:14 PM IST
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दयाशंकर शुक्ल सागर
जम्मू-कश्मीर की सियासत ने मोदी सरकार को फिर मुश्किल में डाल दिया है। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों के बहिष्कार का एलान कर दिया है। ये चुनाव अगले तीन महीनों में होने हैं। दोनों ने कहा है कि पहले केंद्र सरकार अनुच्छेद 35-ए पर अपना रुख साफ करे, फिर चुनाव की बात करे। इन्होंने पहले बड़ी चालाकी से केंद्र पर दबाव डालकर निकाय व पंचायत चुनाव के बहाने सुप्रीम कोर्ट में 35-ए पर सुनवाई टलवाई और अब इसी चुनाव के बहिष्कार का दांव खेला है।
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जम्मू-कश्मीर में सात वर्ष से अधिक समय से निकाय और दो साल से पंचायत चुनाव लंबित हैं। इस दौरान नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी, दोनों की सरकार रही। चुनाव न कराए जाने की वजह आतंकवाद और कानून-व्यवस्था बताई गई। पर असल वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी। अब केंद्र को लगता है कि निकाय/पंचायत चुनाव कराने से उसे लोकसभा चुनाव में फायदा होगा। इसलिए खुद प्रधानमंत्री ने चुनाव कराने की बात की थी। अलगाववादी और आतंकवादी पंचायत चुनाव नहीं चाहते। उन्होंने धमकी दी है कि चुनाव में हिस्सा लेने वालों को वे अपाहिज कर देंगे, ताकि उन्हें पूरा सरकारी मुआवजा भी न मिले।
इसी डर से अनंतनाग लोकसभा सीट पर चुनाव नहीं हो पाया। ऐसे में, निकाय/पंचायत चुनाव करा पाना टेढ़ी खीर है। पर केंद्र को लगता है कि वह संगीनों के साये में चुनाव करवा लेगा। असल समस्या दक्षिण कश्मीर के आतंक प्रभावित चार जिले हैं। फिलहाल कश्मीर में सुरक्षा बलों की भी कमी नहीं। अमरनाथ यात्रा में लगी फौज को अभी वापस नहीं भेजा गया है।
पर अब अनुच्छेद 35-ए के मसले पर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने केंद्र से अपना पक्ष स्पष्ट करने की नई शर्त रख दी है। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर विधानसभा को स्थायी नागरिक की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर के अलावा दूसरे राज्य का नागरिक यहां संपत्ति नहीं खरीद सकता, न यहां का नागरिक बन सकता है। इसके तहत जम्मू-कश्मीर की लड़की अगर किसी दूसरे राज्य के लड़के से शादी करती है, तो उसके और उसके बच्चों के कश्मीरी होने के अधिकार खत्म हो जाते हैं। चूंकि इस अनुच्छेद को संसद के जरिये लागू नहीं किया गया है, इसलिए कश्मीरी डरे हुए हैं। वे इस पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई भी नहीं चाहते।
फारूक अब्दुल्ला ने एक हफ्ता पहले ही जनता से निकाय/पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने की अपील की थी। अचानक ही उन्होंने चुनाव के बहिष्कार का एलान कर दिया। उन्हें लगा कि अगर उनकी पार्टी ने यह फैसला नहीं किया, तो पीडीपी बहिष्कार का एलान कर देगी। अब फारूक की देखा-देखी महबूबा को भी बहिष्कार का एलान करना पड़ा।
इतने साल से चुनाव न होने से जम्मू-कश्मीर में निचले स्तर पर विकास के पहिये रुक गए हैं। करीब 4,000 करोड़ रुपये का केंद्रीय अनुदान रुका है, जो पंचायत व निकायों को दिया जाना है। चार महीने बाद 35-ए का जिन्न फिर खड़ा होगा, जब सर्वोच्च न्यायालय इस पर सुनवाई करेगा। इसलिए नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी चाहती हैं कि केंद्र शीर्ष अदालत में 35-ए को बचाने का बाकायदा हलफनामा दे। पर ऐसा करना भाजपा के राजनीतिक दर्शन के खिलाफ है, क्योंकि उसने अनुच्छेद 370 को खत्म करने की बात कही है। सूबे के ये दो दल भी पीछे हटने को तैयार नहीं, क्योंकि यह कश्मीरियों के साथ धोखा होगा। इन दो पार्टियों की सहभागिता के बिना चुनाव का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। जाहिर है कि कश्मीर में भाजपा धर्मसंकट में फंस गई है।