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किस ओर जा रहा नेपाल: शीघ्र ही प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को दूर करना जरूरी, अंतरराष्ट्रीय शक्तियां अपने हित..

Wed, 10 Sep 2025 06:29 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Wed, 10 Sep 2025 06:29 AM IST
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सार
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर से प्रतिबंध हटाने के बावजूद हिंसा के बीच अंतत: ओली को इस्तीफा देना पड़ा। काठमांडो के लिए जरूरी है कि वह शीघ्र ही प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को दूर करे, क्योंकि किसी देश में जब आंतरिक विद्रोह की स्थितियां इस स्तर पर पहुंच जाती हैं, तब अंतरराष्ट्रीय शक्तियां भी इसमें अपने हित देखने लगती हैं।  
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Nepal Crisis grievances redressal of protesters vital international powers have own interests know details
नेपाल हिंसा - फोटो : ANI

विस्तार

लगता है कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भी बांग्लादेश की शेख हसीना के रास्ते पर चल पड़े हैं, और उनकी राजनीतिक दिशा उथल-पुथल के साथ समाप्त हो रही है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, कोविड के बाद की स्थिति से निपटने में ढिलाई और 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अचानक लगे प्रतिबंध से उपजी जेनरेशन जी की नाराजगी सड़कों पर फूट पड़ी। 



इस हिंसा में करीब दो दर्जन लोगों की जान जा चुकी है। भीड़ ने मंत्रियों, सांसदों और यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों को आग लगा दी, जिससे कई लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागने को मजबूर हो गए। वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं बख्शा गया-नेपाली कांग्रेस के एक पूर्व प्रधानमंत्री हमले में घायल हो गए, जबकि सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा।


पुलिस की भारी तैनाती के बीच, सेना ने हस्तक्षेप किया और प्रदर्शनकारियों से आगजनी और तोड़फोड़ बंद कर बातचीत का आह्वान किया है। नेपाल की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ हिंसा को दबाने में ही नहीं, बल्कि उसके नेतृत्वविहीन चरित्र में भी है। प्रदर्शनकारियों के पास बातचीत के लिए कोई पहचान योग्य नेतृत्व नहीं है। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध का मूल विवाद पहले ही पृष्ठभूमि में चला गया है। अब नौकरियां, जवाबदेही और राजनीतिक सड़ांध से मुक्ति की बड़ी मांग की जा रही है। 

फिलहाल, विशेषज्ञ सेना द्वारा सत्ता हथियाए जाने की आशंकाओं को खारिज करते हुए जोर देकर कहते हैं कि लोकतंत्र को तत्काल कोई खतरा नहीं है। लेकिन जब तक नई सरकार इस बेचैन पीढ़ी की शिकायतों को दूर करने का कोई रास्ता नहीं खोज लेती, काठमांडो की सड़कों पर आग की लपटें पहले से भी ज्यादा तेज होकर लौट सकती हैं। नेपाल हमेशा से एक ऐसा देश रहा है, जहां राजनीतिक लड़ाइयां सड़कों पर लड़ी जाती हैं। एक बार फिर वही अशांति लौट आई, लेकिन इस बार, शाही निरंकुशता या सांविधानिक गतिरोध के कारण नहीं, बल्कि युवाओं की डिजिटल जीवनरेखा-सोशल मीडिया को बंद करने के सरकार के अचानक लिए गए फैसले के कारण अशांति फैली। 

ओली प्रशासन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध को ‘डिजिटल विनियमन’ कहकर उचित ठहराया, लेकिन लाखों लोगों ने उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संपर्क पर हमला समझा। एक ऐसे देश में, जहां 90 फीसदी से ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता समाचार, धन-प्रेषण, पर्यटन प्रचार और यहां तक कि दैनिक व्यापार के लिए इन प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर हैं, यह प्रतिबंध असुविधा से कहीं अधिक सामूहिक घुटन जैसा महसूस हुआ। 

पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने विरोध प्रदर्शनों को अपहृत करने और हिंसा भड़काने के लिए ‘चरमपंथी तत्वों’ को दोषी ठहराया। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि सरकार के भीतर सबसे बड़ा डर अपनी पोल खुलने का था। अनियंत्रित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पहले से ही सत्तारूढ़ नेताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से भरे हुए थे, और उन पर प्रतिबंध लगाना नकारात्मक बयानों को दबाने का एक आसान तरीका लग रहा था, लेकिन नागरिकों ने इस कदम को कानूनी जरूरत नहीं, बल्कि सेंसरशिप समझा। दरअसल, एक नियामक आदेश राजनीतिक वज्रपात बन गया।

शुक्र है कि इस बार कोई भारत विरोधी आरोप नहीं लगाया गया है। काठमांडो में अपनी पोस्टिंग के दौरान, मैंने कम्युनिस्टों द्वारा भारत-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिए जाते देखा। लेकिन इस बार ओली ने भारत पर उंगली उठाने से परहेज किया। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जो भारत-नेपाल संबंधों के लिए शुभ संकेत है। भारत ने अशांति की आशंका के चलते अपनी सीमा चौकियों की सुरक्षा बढ़ा दी है। 

ये विरोध प्रदर्शन गंभीर समस्याओं को दर्शाते हैं। पहला, नेपाल के युवाओं के लिए सोशल मीडिया ही एकमात्र वास्तविक सार्वजनिक मंच है। इसे बंद करने का मतलब था, उनकी आवाज को दबाना। दूसरा, सोलह वर्षों में चौदह सरकारें, शासन में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार, कोविड के बाद अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटाने के अधूरे वादे और बढ़ती कीमतों ने पहले ही लोगों का भरोसा खत्म कर दिया था। उस पर से इस प्रतिबंध ने आग में घी डालने का काम किया। तीसरा, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से पहले ही #NepoKid और #NepoBabies जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे थे, जो स्थापित राजनीतिक वंशों और व्यापारिक अभिजात वर्ग के खिलाफ गुस्से का प्रतीक थे। 

चौथा, यह विद्रोह बिना किसी नेतृत्व के स्वाभाविक रूप से तेजी से फैल गया, जिससे सुरक्षा बलों के लिए इसे नियंत्रित करना कठिन हो गया। पांचवां, इससे पहले इंटरनेट कानूनों को सख्त करने के प्रयासों से संदेह पैदा हुआ कि राज्य अधिनायकवादी रणनीति की ओर बढ़ रहा है। छठा, राजशाही समर्थक ताकतें, जो हाशिये पर थीं, मुख्यधारा में  लौट रही हैं। कुछ महीने पहले, एक विशाल राजशाही समर्थक रैली हुई थी, जिसे राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार से तंग आ चुके नागरिकों का भारी समर्थन मिला। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे तत्वों ने विरोध प्रदर्शनों में घुसपैठ की, तथा डिजिटल विद्रोह को संगठनात्मक ताकत दी है।

वर्षों से वहां की सरकारों ने जनता का विश्वास खत्म कर दिया है, और भ्रष्टाचार तथा अभिजात्य वर्ग के पक्षपात की पृष्ठभूमि में सुधार के नारे खोखले लगते हैं। जब तक उनका प्रशासन पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं दिखाता, सड़कों पर गुस्सा कम नहीं होगा।

यह आक्रोश केवल प्रतिबंध के विरोध में नहीं, बल्कि बिना किसी संवाद के व्यापक नियम लागू करने वाली सरकार के विरोध में है। 

इस्तीफा देने से पहले ओली प्रशासन ने सोशल मीडिया से प्रतिबंध हटा लिया था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब, जब तक नई सरकार शासन में संरचनात्मक विफलताओं का समाधान नहीं करती, तब तक नेपाल में विरोध, दमन और अस्थिरता का चक्र चलता रहेगा। इस बार यह चक्र सड़कों और साइबरस्पेस, दोनों पर चल रहा है।

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