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पड़ोस: करवट ले रही सियासत, क्या नए समीकरणों में भारत के लिए छिपा है अवसर

Fri, 02 Jan 2026 07:54 AM IST
पवन पांडेय महेंद्र वेद, वरिष्ठ पत्रकार
महेंद्र वेद, वरिष्ठ पत्रकार Published by: पवन पांडेय Updated Fri, 02 Jan 2026 07:54 AM IST
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सार
यूनुस के आशीर्वाद से पैदा हुई तथाकथित छात्रों की पार्टी और जमात-ए-इस्लामी में नजदीकी स्पष्ट है। कभी जमात के साथ मिलकर सरकार बनाने वाली दिवंगत खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान, जिन्हें संभावित प्रधानमंत्री माना जा रहा है, ने जमात से दूरी बनाई है। क्या इन समीकरणों के बीच भारत के लिए अवसर छिपा है?
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Neighborhood: Politics is changing, do new equations hold opportunities for India?
डॉ. एस. जयशंकर और तारीक रहमान - फोटो : ANI

विस्तार

उम्मीद है कि नया साल बांग्लादेश पर छाए काले बादलों को हटा देगा, जिससे राजनीतिक स्थिरता आएगी और सामाजिक अशांति खत्म होगी, क्योंकि 12 फरवरी को चुनाव होने वाले हैं, जिसमें अब सिर्फ 42 दिन बचे हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार ने उथल-पुथल के बीच अपने संकल्प को दोहराया है और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान की 17 साल बाद वापसी को आसान बनाया है। तारिक ने अपनी अम्मा, बेगम खालिदा जिया, जो दो बार मुल्क की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं, को हाल ही में खोया है। बांग्लादेशी लोग भावुक होते हैं। अब यह देखना बाकी है कि क्या इससे चुनाव में उनकी पार्टी को ‘सहानुभूति वोट’ मिलेगा।


अभी बीएनपी का मुकाबला जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले इस्लामी पार्टियों के एक ढीले-ढाले गठबंधन से है, जो कभी उसका सहयोगी था और बेगम जिया (2001-2006) के साथ सत्ता में भागीदार था। 1971 के आजादी आंदोलन के दौरान पाकिस्तान के साथ सहयोग के लिए वर्षों तक प्रतिबंधित रहने के बाद, जमात तेजी से आगे बढ़ रही है, और उसने अभी तक उस सहयोग के लिए कोई पछतावा नहीं दिखाया है। वह एक विचारधारा के अग्रदूत के रूप में मुस्लिम बहुल देश बांग्लादेश की राजनीति में अपनी जगह बनाना चाह रही है। रूढ़िवादी होने के बावजूद लोगों ने गहरी सांस्कृतिक मूल्यों को भी पाला है, जो संयम सिखाते हैं।


जमात को बांग्लादेश सिटीजन्स पार्टी के साथ गठबंधन से मजबूती मिली है, जिसे यूनुस के आशीर्वाद से शुरू किया गया था। यह गठबंधन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन छात्र नेताओं के राजनीतिक चरित्र को उजागर करता है, जिन्होंने शेख हसीना सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया था। हैरानी नहीं है कि कई महिला नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है, जबकि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ सकती हैं।

हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग, जो अब भी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है, को यूनुस सरकार ने चुनाव लड़ने से रोक दिया है, और उन संस्थानों और अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक सोच को खत्म करने में साथ दिया है, जिसका प्रतिनिधित्व अवामी लीग करती है। इसी वजह से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले हुए हैं।

क्या चुनाव विश्वसनीय होंगे, इस पर कई देशों की नजर है। हालांकि, पश्चिमी मीडिया पहले से ही हसीना शासन के खिलाफ था, इसलिए यह नतीजा बड़े पैमाने पर स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन इससे भी जरूरी बात यह है कि इसे बांग्लादेश के बड़ी वैश्विक भू-राजनीति में शामिल होने के रूप में देखा जाना चाहिए। निश्चित रूप से, इस कम चर्चित और गुप्त प्रक्रिया में भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिए कोई जगह नहीं है, खासकर उसके पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के पास इस्लामवादियों की वापसी को लेकर। हसीना ने इसे रोकने में मदद की थी, इसीलिए भारत ने उनका समर्थन किया था।

अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर के ढाका दौरे और दोनों तरफ से रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिशों के बावजूद, फरवरी के चुनावों में भारत की बड़ी भूमिका होने की उम्मीद है, क्योंकि एक बड़ा देश और छोटा पड़ोसी वाला समीकरण तो है ही। ऐसा हमेशा से होता आया है, लेकिन हसीना की मौजूदगी की वजह से यह और भी ज्यादा तीखा हो सकता है, जिन्हें कई अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है और अपने ही देश में मौत की सजा सुनाई गई है। उनके बयान ढाका की भावनाओं को भड़काते हैं, लेकिन लगता नहीं कि भारत उन्हें वापस भेजेगा।

भारत की दुविधा यह है कि वह बांग्लादेश को नजरअंदाज नहीं कर सकता, जिसने यूनुस के नेतृत्व में कई शत्रुतापूर्ण कदम उठाए हैं, पाकिस्तान से रिश्ते फिर से बनाए हैं, हथियार खरीदे हैं, विदेशी ताकतों की मौजूदगी को बढ़ावा दिया है और तीखी कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं दी हैं। मौजूदा माहौल में, बांग्लादेश या दुनिया के किसी भी देश ने यह ध्यान नहीं दिया है कि सरकार को लोगों का समर्थन नहीं है।

तारिक रहमान, जिन्हें भविष्य का संभावित प्रधानमंत्री माना जा रहा है, ने अब तक कोई विवादित बात नहीं की है। उन्होंने कूटनीति और भू-राजनीति पर बोलने से परहेज किया है, लेकिन अगर चुनाव के बाद वह सत्ता में आते हैं, तो उन्हें इस पर बोलना ही पड़ेगा। उन्हें शासन का कोई अनुभव नहीं है। वह वैसे बांग्लादेशी राजनेता नहीं हैं, जो ऊंची आवाज में भाषण देते हैं, बल्कि वह शांत स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। ढाका में सरकार के राजनीतिक रंग के हिसाब से तारिक के बारे में राय बदल गई है। अपनी मां के सलाहकार के तौर पर उन पर ‘सत्ता के पीछे की असली ताकत’ होने का आरोप लगा था। इस बारे में मालूम नहीं है कि क्या उन्होंने 2001-2006 के दौरान इस्लामी ताकतों के बढ़ने में कोई भूमिका निभाई थी, जिनका उस समय काफी दबदबा था। कुछ खबरों के मुताबिक, जिया सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि इसे बढ़ावा दिया-जब तक कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी नहीं दी। अवामी लीग के साथ दुश्मनी के कारण, जिया के समय में राजनीतिक हिंसा भी बहुत ज्यादा थी।

इसे ठीक से समझने के लिए, भले ही यह भारतीय नजरिये से हो, जिया परिवार और बीएनपी के राजनीतिक चरित्र को समझना जरूरी है। इसके संस्थापक, पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान हैं, जिन्होंने 1977 से 1981 तक शासन किया। फिर एक सैन्य तख्तापलट में उनकी हत्या हो गई। वह भारत पर भरोसा नहीं करते थे और दूरी बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे। यह परस्पर था। दिल्ली को शक था कि हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या में उनका हाथ था। बेगम जिया ने भी भारत के प्रति वही रवैया जारी रखा, जैसे संयुक्त राष्ट्र में गंगा जल विवाद का मुद्दा उठाना। नई दिल्ली के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। इसलिए यह भविष्य ही बताएगा कि एक अलग दौर में, बदले भूराजनीतिक माहौल में, और एक पीढ़ीगत बदलाव के समय, तारिक का रवैया अलग होगा या नहीं।

भावनाओं को अलग रखकर देखें, तो बांग्लादेश के पास परस्पर फायदे वाले संबंध बनाने के लिए आर्थिक और लॉजिस्टिक संबंधी मजबूरियां हो सकती हैं। अपनी मौजूदा समस्याओं के बावजूद, भारत और बांग्लादेश ऊर्जा के क्षेत्र में एक गहरी रणनीतिक साझेदारी बनाए हुए हैं, जिसमें सीमा पार बिजली ट्रांसमिशन, संयुक्त ऊर्जा संयंत्र और तेल/गैस बुनियादी संरचनाएं शामिल हैं। यह बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि यह उसकी कुल बिजली जरूरत का लगभग 15-17 फीसदी पूरा करता है।
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