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नेहरू विरासत है, जागीर नहीं

Thu, 13 Nov 2014 07:38 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Thu, 13 Nov 2014 07:38 PM IST
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Nehru is legacy, not manor

आधुनिक भारत के शिल्पकार की 125वीं जयंती के अवसर को क्षुद्र राजनीतिक लड़ाई के दलदल में जिस तरह घसीट लाया गया है, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। क्या अमेरिका के लोग अब्राहम लिंकन या फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट जैसी शख्सियतों को रिपब्लिकन या डेमोक्रेटिक के तौर पर देखते हैं? क्या इंग्लैंड के लोग विंस्टन चर्चिल को किसी खास पार्टी से जोड़कर देखते हैं? भारत के राजनेताओं को समझना होगा कि राष्ट्र निर्माताओं को किसी पार्टी विशेष के रंग से नहीं रंगा जा सकता। जिस आधुनिकता और लोकतंत्र पर आज हम गर्व करते हैं, उसके हर कतरे के लिए भारत जवाहरलाल नेहरू का ऋणी है। सिर्फ अपने पड़ोसी देशों का हाल देखकर ही कोई इस विराट उपलब्धि का मतलब समझ सकता है। लोकतंत्र के विचार को रोपने के लिए भारत को अपने निर्माताओं का, और इसे पोषण देने के लिए नेहरू का शुक्रगुजार होना चाहिए।

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नेहरू की विरासत पर टिप्पणी करते हुए तत्कालीन परिस्थितियों पर गौर करना जरूरी है। जरा सोचिए 1947 के हालात के बारे में। कल्पना कीजिए उस देश की, जहां हर सौ में से बमुश्किल अट्ठारह लोग अपना नाम लिख या पढ़ सकते थे, और जहां दस में से आठ लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती थी। यह वह समय था, जब अनाज से लेकर वस्त्र तक भारत हर चीज का आयात करने पर मजबूर था। जरा सोचकर देखिए उस देश के बारे में, जो औपनिवेशिक ताकतों, अकाल और गरीबी के चलते बर्बादी की कगार पर था। कल्पना कीजिए उस भारत की, जिसे दुनिया भर के विद्वान रद्दी की टोकरी की तरह खारिज कर चुके थे। याद कीजिए विचारधाराओं के तनावपूर्ण टकराव के उस दौर की। मगर चाहे अमेरिकी पूंजीवाद हो या सोवियत साम्यवाद, नेहरू ने भारत को इन विचारधाराओं का गुलाम नहीं होने दिया। यही वजह थी कि भारत अपने अस्तित्व को बचाए रख सका। नेहरू उस भारत के निर्माता हैं, जिसमें हम रहते हैं, और जैसा भारत हम चाहते हैं।
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जिस तरह से नेहरू ने वर्ष 1948 में भाखड़ा नांगल जैसी बड़ी और जटिल परियोजना के विचार को मूर्त रूप दिया, वह उनके साहस का ही नमूना था। बगैर सिंचाई सुविधाओं के पंजाब में हरित क्रांति के बारे में वही सोच सकते थे। जिस दौर में भारत का इस्पात उत्पादन नगण्य था, उस दौर में उन्होंने विक्रम साराभाई के साथ मिलकर अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति के गठन की कल्पना की थी! उस समय परमाणु विज्ञान की अनिवार्यता के बारे में उन्होंने सिर्फ सोचा ही नहीं, 1948 में होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा आयोग और 1950 में राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला की नींव भी रखी। वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने के लिए 17 वर्ष के कार्यकाल में नेहरू ने वैज्ञानिकों और विचारकों का भरपूर उपयोग किया और इस दौरान सीएसआईआर और डीआरडीओ समेत 45 से भी ज्यादा प्रयोगशालाएं और संस्थान स्थापित किए।
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आज अगर पूरी दुनिया भारत को सॉफ्टवेयर क्षेत्र में एक महाशक्ति मानती है, तो इसके पीछे नेहरू की दूरदृष्टि और नए भारत के निर्माण में वैज्ञानिक मनोवृत्ति को प्रोत्साहन देने का उनका नजरिया ही था। उन्होंने सर आर्देशिर दलाल, नलिनी रंजन सरकार, जे सी घोष और हुमायूं कबीर के साथ मिलकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) की नींव रखी, जिनमें सबसे पहले आईआईटी, खड़गपुर की स्थापना हुई।

नेहरू ने गलतियां भी कीं, पर उनके उत्तराधिकारियों ने (1991 में नरसिंह राव तक) उन गलतियों को भारी भूल में बदलने में कसर नहीं छोड़ी। जो देश कभी वैश्विक व्यापार का केंद्र था, वह नेहरू के समय में ही बंद अर्थव्यवस्था और लाइसेंस राज का दंश झेलने को मजबूर हुआ। पर इसके लिए तत्कालीन परिस्थितियों पर ध्यान देना भी जरूरी है। स्वतंत्रता के बाद तकरीबन सभी का मानना था कि समस्त पूंजी का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। 1944 के बॉम्बे प्लान के जरिये नेहरू ने निजी पूंजी को मान्यता दी थी, जिस पर सभी सहमत थे। औद्योगिक नीति संबंधी प्रस्ताव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी लेकर आए, जिसे संविधान सभा में मौजूद सभी सदस्यों का समर्थन मिला था।

यह सच है कि गरीबी को उखाड़ फेंकने के लिए भारत को कृषि पर ध्यान देने और तकनीक में निवेश की जरूरत थी। ऐसा नहीं था कि नेहरू को इसका एहसास नहीं था। उन्होंने कहा था, 'सब कुछ इंतजार कर सकता है, मगर कृषि नहीं।' उनकी भूल राजनीति की देन थी। तब की सोच यह थी कि कृषि में निवेश का फायदा समृद्ध किसानों को ही मिलेगा। नेहरू का मानना था कि भारत को सहकारी और सामूहिक कृषि की जरूरत है। लेकिन हरित क्रांति के बीज उनके ही कार्यकाल में बोए गए, प्रारंभिक कृषि संस्थानों का गठन उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। पंजाब के नीलोखेड़ी और उत्तर प्रदेश के इटावा में सामुदायिक विकास कार्यक्रम उन्हीं के समय शुरू हुए।


नेहरू का हर विचार आज भी अपनी प्रासंगिकता रखता है। सामूहिकता की उनकी सोच आज भी साफ-सफाई और ग्रामीण विद्युतीकरण की समस्याओं के समाधान का माद्दा रखती है। अमूल जैसी सहकारी संस्थाओं के जिस विचार को उन्होंने बढ़ावा दिया, वह आज भी किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा का सबसे बेहतर साधन माना जाता है। तकनीकी जरूरत पर उन्होंने जो बल दिया, वह आज भी अर्थव्यवस्था को गति दे रही है। नेहरू ने हम लोगों को गर्व करने की सिर्फ वजह ही नहीं दी, दुनिया में भारत के मुकाम को लेकर एक खास नजरिया भी दिया। लेकिन अफसोस इसका है कि उनकी विरासत को संभाल के नहीं रखा जा सका। नेहरू ने हमें 'भारत का विचार' दिया। वह सभी भारतीयों के हैं। नेहरू एक विरासत है, किसी की जागीर नहीं।

(अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक)

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