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नेहरू और पटेल की जुगलबंदी

Sat, 11 Oct 2014 08:21 PM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Updated Sat, 11 Oct 2014 08:21 PM IST
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nehru and patel

वल्लभभाई पटेल की सबसे अच्छी जीवनी राजमोहन गांधी द्वारा लिखी गई है। यह पूरी तरह पटेल के निजी दस्तावेजों से मिली जानकारियों पर आधारित है, और ऐतिहासिक ताकतों के खिलाफ उनके जीवन और संघर्ष की दास्तान को कागज पर बेहतरीन ढंग से उकेरती है। राजमोहन गांधी की 'पटेलः ए लाइफ' पहली बार मार्च 1991 में प्रकाशित हुई थी। अप्रैल 1990 को लिखी गई इस किताब की प्रस्तावना की एक पंक्ति कहती है, 'व्यापक तौर पर देखें, तो स्वतंत्र भारत के तंत्र को जो वैधता और ताकत मिली, वह तीन व्यक्तियों की कोशिशों का नतीजा थी, गांधी, नेहरू और पटेल। मगर बदले में तीनों शख्सियतों को मिलने वाली प्रतिष्ठा में फर्क देखा जा सकता है। नेहरू को जहां अतिशय सम्मान मिला, गांधी के योगदान को नकारा जा नहीं सकता था, मगर पटेल के मामले में कंजूसी बरती गई।' जवाहरलाल नेहरू की सार्वजनिक छवि के असर को रेखांकित करने के लिए राजमोहन ने उनके जन्म शताब्दी वर्ष (1989 में) का उल्लेख किया, जब 'टेलीविजन धारावाहिकों, विज्ञापनों, सूचना पट्टिकाओं, त्योहारों और न जाने कितने दूसरे मंचों पर उत्सव सरीखा माहौल था।' इसके विपरीत, 'आपातकाल की घोषणा के चार महीने बाद 31 अक्तूबर, 1975 को पटेल के जन्म शताब्दी वर्ष को पूरे देश और आधिकारिक तंत्र की उपेक्षा का सामना करना पड़ा था, और तब से आधुनिक भारत की सबसे अविस्मरणीय संतानों में से एक पटेल के जीवन पर पड़े पर्दे को उठाने की नौबत यदा-कदा ही आ पाती है।'

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1991 और इसके पहले के तमाम दशकों तक नेहरू को मिला सम्मान और पटेल की उपेक्षा बिल्कुल जाहिर थी। इसकी एक वजह थी कि देश को स्वतंत्रता मिलने के महज ढाई वर्ष बाद उनका निधन हो गया, दूसरी ओर, नेहरू ने बतौर प्रधानमंत्री तीन कार्यकाल पूरे किए। इसके अलावा, 1970 और 80 के दशक का भारत वह था, जिसे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर नेहरू ने ही आकार दिया। लोगों के जेहन में नेहरू की ज्यादा असरदार छाप होने की दूसरी वजह यह थी कि उनकी पुत्री और फिर उनका नाती भी देश का प्रधानमंत्री बना। अपने लंबे कार्यकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने अपने पिता की स्मृति और विरासत को जिंदा रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। गौरतलब है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते ही नेहरू का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया, इसीलिए उन्होंने पूरी सरकारी मशीनरी को इस आयोजन में झोंक दिया था।
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1980 के दशक में राजमोहन जब अपनी किताब पर शोध कर रहे थे, तब इंदिरा और राजीव सत्ता में थे। 1989 के चुनाव में राजमोहन जनता दल के टिकट पर अमेठी संसदीय क्षेत्र से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने उतरे। मीडिया में इसे 'असली गांधी' और 'नकली गांधी' के बीच की लड़ाई के तौर पर प्रचारित किया गया, क्योंकि राजमोहन जहां सीधे तौर पर महात्मा गांधी के वंशज थे, वहीं राजीव को 'गांधी' नाम सिर्फ इसलिए मिला, क्योंकि उनके पारसी पिता के उपनाम की स्पेलिंग इस शब्द से मिलती-जुलती थी। राजमोहन चुनाव हार गए, मगर जल्दी ही उनकी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का टिकट दे दिया। गौरतलब है कि पटेल की जीवनी की प्रस्तावना उस समय लिखी गई थी, जब वह ऐसी पार्टी के सांसद थे, जो कांग्रेस, खासकर इंदिरा और राजीव गांधी की राजनीति, के एकदम खिलाफ थी।
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पटेल की जिंदगी और उनके योगदान को लोगों के सामने लाने में राजमोहन की किताब की खास भूमिका रही। मगर पटेल आज भी उपेक्षित बने हुए हैं, तो इसकी वजह महज यह नहीं है कि 2004 से 2014 के दौरान एक बार फिर से नेहरू-गांधी परिवार सत्ता में था। अपने चुनावी अभियान में नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया था कि उनके नायकों में पटेल भी शामिल हैं। इतना ही नहीं, सत्ताधारी दल पर जान-बूझकर पटेल की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने पटेल के सम्मान में एक विशाल प्रतिमा की स्थापना की शपथ भी ली थी। उन्होंने यह दावा भी किया कि नेहरू की तुलना में पटेल कहीं ज्यादा बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते।

ऐसी चर्चाओं से तमाम भारतीयों को यह भरोसा होने लगता है कि नेहरू और पटेल निजी तौर पर प्रतिद्वंद्वी, और राजनीतिक विरोधी थे। इसकी वजह यह है कि नेहरू पर अब कांग्रेस (खासकर सोनिया और राहुल गांधी), और पटेल पर भारतीय जनता पार्टी (खासकर नरेंद्र मोदी) अपना कब्जा मानने लगी हैं। मगर मोदी द्वारा पटेल के आह्वान में दो विरोधाभास दिखते हैं। पहली बात तो यह कि पटेल खुद जीवन भर कांग्रेसी बने रहे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद गृह मंत्री के तौर पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने का भी फैसला किया था। दूसरी बात यह कि नेहरू और पटेल एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि दोनों ही कॉमरेड और सहयोगी थे। 1920 के दशक से 1947 तक दोनों ने कंधे से कंधा मिलाते हुए कांग्रेस के लिए काम किया था, और इसके बाद भी स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के बतौर प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री दोनों का तालमेल अनुकरणीय था। अप्रैल, 1948 में न्यूयॉर्क टाइम्स के रॉबर्ट ट्रंबल ने नेहरू-पटेल की जुगलबंदी पर एक लंबा निबंध लिखा था। ट्रंबल लिखते हैं, 'दोनों की शख्सियत में फर्क जरूर था, मगर उनके मतभेदों को कुछ ज्यादा ही नाटकीय ढंग से पेश किया गया है।' दरअसल पटेल और नेहरू समझते थे कि महात्मा गांधी की मौत के बाद देश की अखंडता को बनाए रखने के लिए दोनों का साथ में काम करना बेहद जरूरी था। ट्रंबल लिखते हैं, 'दोनों हस्तियों ने जिस तरह एक-दूसरे का साथ दिया, उसमें ही सरकार की पूरी ताकत निहित थी।'


हाल ही में हरियाणा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने पहली दफे जिस तरह नेहरू की तारीफ की है, उससे उम्मीद की जानी चाहिए कि यह अंतिम बार नहीं होगी। नेहरू के बाद कांग्रेस ने पटेल की जैसी उपेक्षा की, उसका जवाब अगर संघ और भाजपा के प्रभावशाली लोग नेहरू की उपेक्षा से देंगे, तो यह अफसोसनाक होगा। वजह यह है कि नेहरू न सिर्फ सही मायनों में आधुनिक भारत के निर्माता थे, बल्कि स्वतंत्रता और विभाजन के बाद के उन महत्वपूर्ण वर्षों में भारत को एक अखंड और लोकतांत्रिक राष्ट्र के तौर पर स्थापित करने में नेहरू और पटेल ने कंधे से कंधा मिलाते हुए संघर्ष किया। राजमोहन गांधी ने अपनी किताब में बेहद सावधानी से उस समय का उल्लेख किया है, जब महात्मा गांधी की मौत के बाद नेहरू और पटेल ने अपने सारे मतभेद दरकिनार कर दिए थे। नेहरू ने जहां सांप्रदायिक सौहार्द, स्वतंत्र विदेश नीति और देश में एक तकनीक और औद्योगिक आधार स्थापित करने पर ध्यान दिया, वहीं पटेल ने भारतीय संघ में रियासतों के सम्मिलन, प्रशासनिक सेवाओं के आधुनिकीकरण और संविधान के आधारभूत तत्वों पर सभी राजनीतिक दलों में मतैक्य स्थापित करने पर फोकस किया। सभी को यह समझना चाहिए कि नेहरू का सोनिया गांधी की कांग्रेस से, और पटेल का मोदी की भाजपा से कोई वास्ता नहीं है। सभी भारतीयों में उन दो हस्तियों के प्रति आदर की वह भावना और समझ होनी चाहिए, जिन्होंने पृथक और संयुक्त तौर पर उस राष्ट्र को खड़ा करने में योगदान दिया, जिसे आज हम अपना भारत कहते हैं।

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