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नए खुलासे नहीं, नया विकल्प चाहिए
तवलीन सिंह
Updated Sat, 20 Oct 2012 07:43 PM IST
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इत्तफाक से पिछले सप्ताह जिस दिन अखबारों में खबर छपी कि दिल्ली दुनिया के सबसे गंदे शहरों में है, मैं महरौली गई हुई थी अपने एक दोस्त से मिलने। महरौली मेरे बचपन में दिल्ली शहर का इतना खूबसूरत इलाका हुआ करता था कि हम अकसर घूमने जाया करते थे। जमाली-कमाली के बागों में पिकनिक करते थे और कुतुब मीनार के आसपास की इमारतों की सुंदरता का मजा लेते थे। अब सुनिए आज की महरौली का हाल।
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मेरे दोस्त के घर तक जाने के लिए मुझे एक तंग गली से गुजरना पड़ा, जिसके दोनों तरफ पुराने मंदिर थे और कई खूबसूरत इमारतें गुजरे जमानों की, लेकिन इनकी सुंदरता के बीच फोड़ों की तरह उभर चुकी हैं अब ऊंची, नई रिहायशी इमारतें। दिल्ली में आवास की सख्त कमी है, तो इनको बर्दाश्त कर भी लेते हम, अगर नगर निगम की तरफ से बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई होतीं। कम से कम सफाई का प्रबंध अगर किया गया होता। कुछ नहीं किया है दिल्ली सरकार ने, सो खूबसूरत इमारतों के बीच जहां कभी हरे-भरे बाग होते थे, आज दिखती है कूड़े की फैली हुई एक गंदी चादर, जिसके ऊपर घूमते हैं मोटे-मोटे सूअर। यानी मेरे बचपन के वे सुंदर बाग बन गए हैं बीमारी पैदा करने के केंद्र। तो क्यों न संयुक्त राष्ट्र के नए सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली को ढाका और काठमांडू से भी गंदा माना जाए?
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भारत की राजधानी का अगर इतना गंदा हाल है, तो कल्पना कीजिए, छोटे शहरों का क्या हाल होता होगा। इन शहरों के नागरिकों को न साफ पानी की सुविधा मिलती है, न कूड़ा हटाने की, और न ही होता है बिजली के आने का भरोसा। मुंबई शहर के तो आधे से ज्यादा नागरिक रहते हैं झुग्गी बस्तियों में, जहां बच्चों को पाला जाता है ऐसी गंदगी में, जिसमें विकसित, पश्चिमी देश अपने जानवरों को भी नहीं रखते हैं।
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भारत में सुनियोजित शहरीकरण की गंभीर समस्या के बारे में मैं उस सप्ताह क्यों लिख रही हूं, जिस सप्ताह अरविंद केजरीवाल ने एक 'नया धमाकेदार खुलासा' पेश किया है देश के सामने? क्या मुझे परवाह नहीं है भ्रष्टाचार की? क्या मुझे चिंता नहीं हमारे राजनेताओं की बेवफाइयों की? है। बहुत है, शायद केजरीवाल से भी ज्यादा। लेकिन मैं थोड़ी-सी तंग आने लग गई हूं उनकी तंग दृष्टियों से। ऐसा लगने लगा है मुझे कि भ्रष्टाचार शब्द उनकी आंखों के सामने इतना बड़ा दिखता है कि इस देश की अन्य गंभीर समस्याएं उनको दिखती ही नहीं हैं।
माना कि उनका राजनीतिक दल अभी नया है, सो जरूरत है सुर्खियों में उसको रखना, ताकि लोग उसको भूल न जाएं। लेकिन राजनीतिक दलों का आधार नहीं बन सकता है सनसनीखेज खुलासे। कोई भी राजनीतिक दल अगर जिंदा रहना चाहता है, तो उसको जनता के सामने रखने पड़ते हैं नए विकल्प और नए विचार। केजरीवाल साहिब का दृष्टिपत्र ध्यान से पढ़ने के बाद मुझे न विकल्प दिखे और न ही नए विचारों की कोई झलक दिखी। ऐसा लगा मुझे कि जैसे इसको तैयार किया है किसी चतुर स्कूली बच्चे ने अपनी किसी परीक्षा में अच्छे नंबर पाने के मकसद से।
सुनियोजित शहरीकरण के अलावा सुनिए देश के सामने अन्य गंभीर राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की एक छोटी-सी सूची। सबसे बड़ी समस्या देश के राजनेताओं के सामने है पढ़े-लिखे नौजवानों में बढ़ती बेरोजगारी। हर वर्ष करोड़ों नई नौकरियों की जरूरत है। ये नई नौकरियां पैदा होती जा रही थी तेजी से, जब अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि दर नौ फीसदी तक पहुंचती दिख रही थी, जब दो दशकों तक अर्थव्यवस्था का हाल अच्छा रहा। इस वर्ष स्थिति यह है कि पांच प्रतिशत तक अगर पहुंचती है विकास दर, तो गनीमत माना जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर विकास दर एक प्रतिशत कम होती है, तो कम हो जाती है 30 लाख नौकरियों की संभावनाएं।
कहने का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था में फिर से तेजी लाने की सख्त जरूरत है। यह तभी होगा, जब निवेशक, देसी और विदेशी, दोनों फिर भारत में विश्वास करने लगें। और विश्वास कैसे पैदा होगा, जब रोज केजरीवाल अपने खुलासों की वजह से सरकार को चलाने में बाधा डालते फिर रहे हैं? उनके तरीके भी गलत हैं, तमाशाई हैं। इलजाम लगाते हैं किसी नए राजनेता को चुनकर और लगाते ही मांगना शुरू कर देते हैं उस मंत्री या राजनेता का इस्तीफा।
दोष साबित करने की भी आवश्यकता नहीं मानते हैं, क्योंकि उनका साथ देता है मीडिया। नतीजा यह कि सुर्खियों में खूब रहते हैं केजरीवाल और उनके साथी और खूब मजे लेते हैं हम। सारा देश भूल जाता है उस दिन के लिए कि भ्रष्टाचार के अलावा भी देश के सामने गंभीर समस्याओं की इमारत इतनी ऊंची होती जा रही है कि जब तक राजनेताओं को फुरसत मिलेगी, उनसे जूझने की बहुत दूर हो चुकी होगी। याद आते हैं अल्लामा इकबाल के ये शब्द, न संभलोगे गर तो मिट जाओगे हिंदुस्तान वालो, तुम्हारी दास्तां भी न होगी दास्तानों में।