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उजड़ते सेज को बचाने की जरूरत

Mon, 01 Aug 2016 06:30 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 01 Aug 2016 06:30 PM IST
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Need to save SEZ
जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) के कार्य कलापों से संबंधित जो नई रिपोर्ट्स प्रकाशित हुई हैं, उनका मानना है कि सेज अपने मकसद में कामयाब नहीं रहे हैं। एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में जितने सेज हैं, उनमें आधे से अधिक बेकार पड़े हैं। इस समय देश में 430 सेज हैं, जिनमें से 226 सेज बेकार पड़े हुए हैं। महज 204 सेजों में ही औद्योगिक इकाइयां काम कर रही हैं।

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वस्तुत: देश में वर्ष 2000 से शुरू हुई सेज की अवधारणा का मकसद निर्यात आधारित इकाइयों को विशेष प्रोत्साहन देना रहा है। निर्यात को बढ़ाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को गति देने और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी सेज का प्रमुख उद्देश्य है। सेज के तहत निर्यात आधारित उद्योगों को न्यूनतम कागजी कार्रवाई और नियमों के साथ अच्छे इन्फ्रास्ट्रक्चर और आकर्षक वित्तीय सुविधाएं देने की व्यवस्था की गई है। यदि हम सेज के अब तक के प्रस्तुतीकरण का अध्ययन करें, तो पाते हैं कि बड़ी संख्या में सेज की अधिसूचना रद्द किए जाने तथा अधिसूचित सेजों के खाली पड़े रहने का कारण इसके तहत दिए जाने वाले कर लाभ एवं छूट को लेकर नीतियों की अस्थिरता, प्रमुख कारण है। न्यूनतम वैकल्पिक कर लागू किए जाने के बाद सेज में उद्योग लगाने का आकर्षण कम होना तथा सरकार की ओर से उद्योग के हित में कदम नहीं उठाना भी सेज के प्रस्तुतीकरण को चिंताजनक बनाने के लिए जिम्मेदार दिखाई दे रहे हैं।
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वर्ष 2016-17 के बजट में सेज के लिए अनुकूल प्रावधान नहीं होने से सेज से निर्यात वृद्धि की संभावनाओं पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। चालू वित्तीय वर्ष के बजट में सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए आयकर छूट को खत्म करने का फैसला किया है। बजट में सरकार ने कहा है कि वह सेज में 1 अप्रैल, 2020 या उसके बाद से उत्पादन या विनिर्माण शुरू करने वाली किसी इकाई को कोई कर छूट नहीं देगी। चिंताजनक यह है कि सेज का दौर खत्म होते हुए दिखाई दे सकता है। अब ज्यादातर सेज, रियल एस्टेट के खेल में शामिल हो गए हैं, क्योंकि इनके प्रमोटर भूमि का इस्तेमाल पुनर्विकास के लिए करने की योजना बना रहे हैं।
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हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री निर्मला सीतारमण ने भी स्वीकारा कि मिनिमम अल्टरनेट टैक्स और डिविडेंट डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स में छूट वापस लेने, सेज से जुड़े वित्तीय प्रावधानों में लगातार हुए बदलाव से बढ़ी अनिश्चतता के कारण सेज से निर्यात में गिरावट आई है। हालांकि वैश्विक व्यापार और निर्यात मांग के क्षेत्र में कमी जरूर आई है। लेकिन भारत जैसे ही कई निर्यातक देश पिछले वर्ष 2015-16 में निर्यात डगर पर आगे बढ़े हैं। खासतौर से वियतनाम, बांग्लादेश और मलयेशिया ऐसे देश हैं, जहां औसतन निर्यात सात-आठ फीसदी बढ़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के कारण आयात बिल निर्यात के मुकाबले कम है, पर कुछ बड़े जोखिम अभी बरकरार हैं। यदि देश में औद्योगिक वृद्धि उम्मीद के मुताबिक गति पकड़ती है, तो आयात में इजाफा होगा। इसी तरह यदि तेल कीमतों में बढ़ोतरी हुई, तो भी आयात बिल एकदम बढ़ेगा। ऐसे में सेज की भूमिका कारगर बनाई जानी चाहिए।


अब जरूरी है कि सेज को देश के लिए फायदेमंद बनाने के लिए एकल खिड़की मंजूरी व्यवस्था लागू करने के साथ ही कारोबार आसान बनाया जाए और कंपनियों को सेज में उद्योग लगाने पर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर का लाभ दिया जाए।

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