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जेनरिक दवाओं में नवाचार की जरूरत
संदीप मिश्रा
Updated Tue, 20 Nov 2018 05:35 PM IST
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संदीप मिश्रा
वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाते हुए, भारत विश्वभर में सबसे ज्यादा जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने वाला देश है। आज भारतीय फार्मास्यूटिकल सेक्टर उद्योग, विभिन्न वैक्सीन्स के लिए 50 प्रतिशत वैश्विक मांग और अमेरिका में 40 प्रतिशत से अधिक जेनरिक मांगों को पूरा करता है। भारत का जेनरिक दवा निर्माता उद्योग विश्व भर के उद्योग का दस प्रतिशत है, मगर मूल्य के रूप में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 1.4 फीसदी है। इसका मतलब है कि फार्मास्यूटिकल सेक्टर को नवोन्मेष के रूप में अधिक काम करने की जरूरत है, सिर्फ प्रतिलिपियां बनाने से काम नहीं चलेगा।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं में काफी लंबे समय से ब्रांडेड जेनरिक दवाएं विश्सनीय मानी जाती हैं और सस्ती हैं। इंक्रीमेंटल इनोवेशन यानी सतत नवाचार ऐसा क्षेत्र है, जहां दवा कंपनियां ब्रांडेड जेनरिक के माध्यम से मुनाफा कमा रही हैं। सतत नवाचार गुणवत्तापूर्ण उपचार के स्तर को ऊपर उठा सकता है। इससे उपचार में तेजी आती है और डिजिटल समाधानों से उपचार सुगम होता है।
छोटे-छोटे सुधार के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करने से मरीज को बेहतर जीवन जीने में मदद मिलेगी। मुझे पक्का भरोसा है कि मौजूदा दवाओं में नवाचार से विश्वभर की संपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में योगदान मिला है।
बेन ऐंड कंपनी की 2020 के विकास अनुमान पर केंद्रित रिपोर्ट के मुताबिक 'सॉफ्ट इनोवेशन' सतत वृद्धि में सहायक होगा। ये ऐसे नवाचार हैं, जो कि लोगों को बेहतर या अधिक उम्दा उत्पाद उपलब्ध कराते हैं और उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, साथ ही समय के साथ उनकी आदतों में बदलाव लाते हैं। आखिरकार, एक मरीज क्या चाहता है? दवाएं ऐसी हों, जो लेने में और याद रखने में आसान हों।
वर्तमान में ब्रांडेड जेनरिक्स इस तरह का नवाचार कर रहे हैं। हमारी पेटेंट व्यवस्था अभी सतत नवाचार को न तो प्रोत्साहित करती है औ न ही मदद करती है। इसलिए सूक्ष्म नवाचार में रुझान कम दिखाई देता है। नवाचारों पर बहुत ही कम मात्रा में निवेश किया जाता है और पिछले दो दशकों में अनुसंधान पर जीडीपी का केवल 0.6-0.7 प्रतिशत ही खर्च किया गया। भारत में दवा कंपनियों को निश्चित रूप से सतत नवाचार की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए, ताकि खास जरूरत वाले मरीजों की जरूरतों को विश्वसनीय ब्रांडेड जेनरिक्स के द्वारा पूरा किया जा सके।
ऐसे लोगों की जरूरतों को, जो हमारे देश में बीमारी और दवाओं के खर्च की समस्या से जूझ रहे हैं, साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे मरीज की हर जरूरत को पूरा किया जाएगा। इसलिए, भविष्य में सरकार और उद्योग को इस अत्यधिक जटिल स्थिति में एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े स्तर पर निवेश और तकनीक की जरूरत है।
बीमारियों का जिस तरह से इलाज किया जाता है, सतत नवाचार उसके तरीके को बदलने की क्षमता रखता है। इसकी वजह से दवाओं और इलाज के खर्च का बोझ कम हो सकता है।
सतत नवाचार के जरिये भारत की आवश्यकता के अनुरूप दवाओं का निर्माण हो सकेगा। नवाचार के जरिये भारत के उच्च आर्द्रता वाले तापमान के अनुकूल दवाओं का निर्माण किया जा सकता है। दुनिया की तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था को नवाचार से जुड़े समाधान पर विचार करना चाहिए। मरीजों के हित में हम सतत नवाचार के जरिये तैयार होने वाली ब्रांडेड जेनरिक्स को नजरंदाज नहीं कर सकते।
-प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ कार्डियोलॉजी, एम्स, दिल्ली
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उभरती अर्थव्यवस्थाओं में काफी लंबे समय से ब्रांडेड जेनरिक दवाएं विश्सनीय मानी जाती हैं और सस्ती हैं। इंक्रीमेंटल इनोवेशन यानी सतत नवाचार ऐसा क्षेत्र है, जहां दवा कंपनियां ब्रांडेड जेनरिक के माध्यम से मुनाफा कमा रही हैं। सतत नवाचार गुणवत्तापूर्ण उपचार के स्तर को ऊपर उठा सकता है। इससे उपचार में तेजी आती है और डिजिटल समाधानों से उपचार सुगम होता है।
छोटे-छोटे सुधार के लिए विज्ञान का इस्तेमाल करने से मरीज को बेहतर जीवन जीने में मदद मिलेगी। मुझे पक्का भरोसा है कि मौजूदा दवाओं में नवाचार से विश्वभर की संपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में योगदान मिला है।
बेन ऐंड कंपनी की 2020 के विकास अनुमान पर केंद्रित रिपोर्ट के मुताबिक 'सॉफ्ट इनोवेशन' सतत वृद्धि में सहायक होगा। ये ऐसे नवाचार हैं, जो कि लोगों को बेहतर या अधिक उम्दा उत्पाद उपलब्ध कराते हैं और उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, साथ ही समय के साथ उनकी आदतों में बदलाव लाते हैं। आखिरकार, एक मरीज क्या चाहता है? दवाएं ऐसी हों, जो लेने में और याद रखने में आसान हों।
वर्तमान में ब्रांडेड जेनरिक्स इस तरह का नवाचार कर रहे हैं। हमारी पेटेंट व्यवस्था अभी सतत नवाचार को न तो प्रोत्साहित करती है औ न ही मदद करती है। इसलिए सूक्ष्म नवाचार में रुझान कम दिखाई देता है। नवाचारों पर बहुत ही कम मात्रा में निवेश किया जाता है और पिछले दो दशकों में अनुसंधान पर जीडीपी का केवल 0.6-0.7 प्रतिशत ही खर्च किया गया। भारत में दवा कंपनियों को निश्चित रूप से सतत नवाचार की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए, ताकि खास जरूरत वाले मरीजों की जरूरतों को विश्वसनीय ब्रांडेड जेनरिक्स के द्वारा पूरा किया जा सके।
ऐसे लोगों की जरूरतों को, जो हमारे देश में बीमारी और दवाओं के खर्च की समस्या से जूझ रहे हैं, साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे मरीज की हर जरूरत को पूरा किया जाएगा। इसलिए, भविष्य में सरकार और उद्योग को इस अत्यधिक जटिल स्थिति में एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े स्तर पर निवेश और तकनीक की जरूरत है।
बीमारियों का जिस तरह से इलाज किया जाता है, सतत नवाचार उसके तरीके को बदलने की क्षमता रखता है। इसकी वजह से दवाओं और इलाज के खर्च का बोझ कम हो सकता है।
सतत नवाचार के जरिये भारत की आवश्यकता के अनुरूप दवाओं का निर्माण हो सकेगा। नवाचार के जरिये भारत के उच्च आर्द्रता वाले तापमान के अनुकूल दवाओं का निर्माण किया जा सकता है। दुनिया की तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था को नवाचार से जुड़े समाधान पर विचार करना चाहिए। मरीजों के हित में हम सतत नवाचार के जरिये तैयार होने वाली ब्रांडेड जेनरिक्स को नजरंदाज नहीं कर सकते।
-प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ कार्डियोलॉजी, एम्स, दिल्ली