फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Need for big dicision in kashmir

कश्मीर में बड़े फैसलों की जरूरत

Tue, 12 Jul 2016 07:54 PM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Tue, 12 Jul 2016 07:54 PM IST
विज्ञापन
Need for big dicision in kashmir
मारूफ रजा

कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद हालात बिगड़े हैं। घाटी में असंतोष फैला है और हम एक बार फिर लाचार नजर आ रहे हैं। बार-बार कवायद की जाती है, जिसे हम दशकों से देखने के आदी हैं। हमारे राजनेता और राजनयिक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण दोहराते नजर आते हैं। पर कश्मीर के मसलों को समझने की कोशिश नहीं की गई। वहां के अंदरूनी हालात को ठीक करने के लिए गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। इसे कश्मीरी अवाम के साथ धोखा भी कह सकते हैं। इसी का नतीजा है कि यहां की युवा पीढ़ी में हताशा दिखती है। बुरहान वानी के मामले में रणनीतिक कमजोरियां साफ नजर आती हैं। हमें एहसास होना चाहिए था कि उसकी मौत के बाद असंतोष भड़क सकता है। हमें इन हालात से निपटने की तैयारी पहले से करनी चाहिए थी।


loader

बुरहान की मौत के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। पाकिस्तान बुरहान को लेकर जो भी कहे, लेकिन वह एक आतंकवादी ही था। कुछ समय पहले उसने पुलिस वालों की हत्या भी की थी। ऐसा भी बताया जा रहा है कि वह राज्य के विधानसभा चुनाव के समय अलग-अलग इलाकों में घूम रहा था। लेकिन चुनाव के समय हालात एकदम न बिगड़ जाएं, इसलिए सुरक्षा बल के जवानों ने तब उसे निशाना बनाने से परहेज किया। लेकिन बुरहान की आवाजाही से साफ था कि सीआरपीएफ की तरफ से ढिलाई बरती गई। हमारा खुफिया तंत्र भी नाकाम रहा। और कहीं न कहीं बात गृह मंत्रालय पर भी आती है।

कश्मीर में कुछ चीजें बार-बार देखने को मिलती हैं। आखिर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के उन लोगों को काबू में करने या पकड़ने में हमें दिक्कत क्यों आनी चाहिए, जो खुलेआम नारा लगाते हैं कि भले उनके पास भारतीय पासपोर्ट हैं, लेकिन वे भारतीय नहीं हैं? हम उन्हें अलगाववाद की राजनीति करने का पूरा मौका देते हैं। वे भारत के बारे में जो चाहे बोलते हैं, लेकिन हम ठिठके हुए रहते हैं। आखिर क्या नीति है हमारे पास? बुरहान की मौत के बाद मुजाहिदीन चीफ सलाहुद्दीन और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद ने मुजफ्फराबाद में भड़काऊ भाषण दिए। भारत की जमीन पर या सीमा के उस पार, जहां भी ऐसी गतिविधियां होती हैं, क्या उनके खिलाफ भारत केवल कड़ी प्रतिक्रिया देने तक ही सीमित रह जाएगा? हुर्रियत या ऐसे तत्वों से निपटने के लिए हम सख्त क्यों नहीं हो पाते?

पाकिस्तान के आतंकी सरगनाओं के अलावा बुरहान की मौत पर इस्लामाबाद ने भी भारत को घेरने की कोशिश की है। उसकी मंशा यही है कि वह सुरक्षा बल की इस कार्रवाई को दमनपूर्ण बताकर अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि खराब करे। भारत को बदनाम करने के लिए पाकिस्तान अपनी तरफ से कोई मौका नहीं छोड़ना चहता। जब कहीं बात बिगड़ती है या भारत से कहीं चूक हो जाती है, तो पाकिस्तान तुरंत सक्रिय हो जाता है। बुरहान की मौत के बाद पाकिस्तान में मातम मनाया गया। उस आतंकी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा गया कि कश्मीर के हालात पर पाकिस्तान को फायदा उठाना चाहिए। पाकिस्तान के लिए भारत की नीति इसके उलट होनी चाहिए। हमें विश्व समुदाय को अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह बताना चाहिए कि जिस बुरहान को मारा गया, वह एक आतंकी है, और उसके आतंकी होने से संबंधित तमाम सबूत भारत के पास हैं। भारत को उल्टे पाकिस्तान से यह पूछना चाहिए कि एक आतंकवादी के मारे जाने पर वह इतना दुखी क्यों है। पाकिस्तान आतंक की नर्सरी है, इसलिए भारत की आतंकवाद-विरोधी कदम पर वहां प्रतिक्रिया होती है। यहां तक कि पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक आतंकवादी के पक्ष में बोल रहे हैं।

यह भारत की अपनी रणनीतिक कमी है कि हम प्रहार नहीं करते। देखा जाए, तो केंद्र की एनडीए सरकार भी उसी ढर्रे पर चल रही है, जिस पर यूपीए चला करती थी। दोनों की प्रवृत्ति में फिलहाल अंतर नहीं दिखता। ठीक है कि जम्मू-कश्मीर सरकार में भाजपा का साझा है। लेकिन ऐसे हालात में केंद्र सरकार से कुछ बड़ी अपेक्षा रहती है। उसे कई महत्वपूर्ण फैसले अपने स्तर पर लेने पड़ते हैं। उन चीजों को दरकिनार भी किया जा सकता है, जो राज्य में साझा सरकार चलाने के लिए अहमियत रखती हो। कितना अजीब है कि एक तरफ पाकिस्तान भारत को घेर रहा है, दूसरी तरफ आतंकी संगठनों से निपटने के मसले पर केंद्र और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के बीच एक राय नहीं है!

कश्मीर के हालात से निपटने के लिए अब यही रास्ता रह गया है कि इस लड़ाई के लिए पांच साल का एक प्रारूप तैयार हो। जरूरत पड़े, तो राष्ट्रपति शासन लगाने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। पंद्रह साल पहले भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को भी यही सुझाव दिया गया था कि सबसे पहले कश्मीर के अंदरूनी हालात ठीक करने होंगे। बातचीत के रास्ते से इसके हल होने की बात सुनने में अच्छी लगती है, पर इसके आसार दूर-दूर तक नहीं दिखते। हम बार-बार अपनाया गया तरीका ही अपनाते हैं, इसलिए बार-बार पाकिस्तान को हममें कमियां दिख जाती हैं।

हकीकत यह है कि कश्मीर पर हम उलझते ही चले गए। जबकि इसे सुरक्षा, विकास और आतंकवाद के खिलाफ एक परियोजना के रूप में लेना चाहिए। कश्मीर पर युद्ध स्तरीय सक्रियता दिखाने के लिए सबसे पहले तो इस मसले को प्रधानमंत्री कार्यालय से जोड़ना चाहिए। दुनिया की फिक्र करने से पहले कश्मीर को बचाना जरूरी है। अब बात इतनी भर नहीं कि एक राज्य में सत्ता पाने के लिए कैसा संतुलन बिठाया जाए या वहां की सियासी पार्टियों के साथ केवल उनकी शर्तों पर चला जाए। आतंकवाद की लड़ाई केवल हथियारों की नहीं है, यह एक धारणा की भी लड़ाई है, लिहाजा इसका खात्मा करने के लिए बड़े अभियान के तौर पर इससे निपटना चाहिए। पुरानी लीक पर चलने से कुछ नहीं होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed