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गले की हड्डी बना अध्यादेश
नीरजा चौधरी
Updated Wed, 25 Feb 2015 06:06 PM IST
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पिछली सर्दियों में मोदी सरकार जो भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाई थी, वह अब उसी के गले की हड्डी बनता जा रहा है। वजह यह है कि अगर सरकार अपने संशोधन वापस लेकर इसे 2013 के कानून जैसा बनाने की सोचती है, तो इससे प्रधानमंत्री की नाक नीची होगी, साथ ही, उनकी सशक्त नेता की छवि को भी नुकसान पहुंचेगा। इसके अलावा इससे भारत को विनिर्माण का केंद्र बनाने की उनकी 'मेक इन इंडिया' योजना को भी धक्का पहुंचना तय है।
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दूसरी ओर अध्यादेश के कानून बनने की सूरत में भी भाजपा की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं। किसानों ने पहले ही विरोध में मोर्चा खोला हुआ है। यह तथ्य भी भाजपा के तनाव को बढ़ाने के लिए काफी है कि 2015 के दिल्ली चुनाव में देहात की सभी सीटों पर उसे मुंह की खानी पड़ी है, जबकि 2013 में राजधानी के ग्रामीण इलाकों में उसे दर्जन भर सीटों पर जीत मिली थी। यह भी जगजाहिर है कि अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के खिलाफ जनमत बनाने में इसी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का सहारा लिया था, जिसे लेकर किसान समुदाय पहले से बेचैन था।
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गौरतलब है कि अन्ना के अलावा दूसरे किसान समूहों ने भी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आवाज उठाई है। खास बात यह है कि अध्यादेश के खिलाफ स्वर संघ के भीतर से भी सुनाई दे रहे हैं। दरअसल, भारतीय किसान संघ ने अध्यादेश का मुखर विरोध किया है। संसद के भीतर भी हालात ठीक नहीं दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री विपक्षी दलों को शांत रखने के सभी पैंतरे आजमा रहे हैं। संसद के पहले दिन उन्होंने खुद जाकर सोनिया गांधी समेत दूसरे विपक्षी नेताओं का अभिवादन किया।
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इससे एक दिन पहले उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री वेंकैय्या नायडू को 10 जनपथ भेजा, ताकि सोनिया गांधी के साथ संबंधों में कुछ नरमी लाई जा सके। मगर कांग्रेस पर इसका कोई असर नहीं दिखा। निजी स्तर पर कूटनीति का दांव खेलते हुए मोदी ने सैफई में मुलायम सिंह यादव के गांव जाकर उनके पोते के तिलक समारोह में हिस्सा लिया, जबकि विवाह इसी हफ्ते दिल्ली में होना है, जिसमें बड़ी आसानी से वह शिरकत कर सकते थे। वहीं, एनसीपी के समर्थन की चाह में उन्होंने बारामती में शरद पवार के साथ भी वक्त गुजारा।
वर्तमान हालात को देखते हुए मुमकिन है कि सरकार 2013 के कानून और 2014 के अध्यादेश के बीच कोई रास्ता निकाले। मगर यह इतना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जबकि यह किसानों के हितों से जुड़ा एक भावुक मामला है। इस मामले में संसद का संयुक्त अधिवेशन आयोजित करने की भी बात हो रही है, मगर यह भी आसान नहीं होगा। पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने वाली भाजपा सरकार कानून बनाने के लिए अध्यादेशों का सहारा ले रही है। इससे पूरी दुनिया के सामने भारत के संसदीय लोकतंत्र की क्या तस्वीर जाएगी?
राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं है, और इसीलिए विपक्षी दलों को साथ लेकर चलना उसकी मजबूरी है। दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव में अपनी जमीन खो चुके विपक्षी दल भूमि अधिग्रहण के इस मुद्दे में अपने लिए अवसर ढूंढ रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भाजपा के लिए वैसा ही होगा, जैसा यूपीए के लिए भ्रष्टाचार का मुद्दा हुआ था?