सेना के निशाने पर शरीफ
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पाकिस्तान में सेना और सरकार के बीच गंभीर विवाद पैदा हो गया है और संदेह है कि सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ के कार्यकाल के आखिरी महीनों के दौरान ही तनाव चरम पर था। यह विवाद पिछले वर्ष तब पैदा हुआ था, जब अंग्रेजी दैनिक डॉन में एक खबर छपी थी कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके कुछ मंत्रियों की राहील शरीफ, आईएसआई और कुछ अन्य एजेंसियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई, जिसमे सेना से कहा गया कि 'नॉन स्टेट ऐक्टर्स' (आतंकवादी, जिन्हें इस्लामाबाद अपने देश का नहीं मानता) को सैन्य मदद दिए जाने की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का अलगाव बढ़ता जा रहा है, इसलिए उन्हें समर्थन देना बंद करने की नीति के लिए व्यापक स्तर पर आम सहमति की जरूरत है।
यह सबको पता है कि पाकिस्तान की सरजमीन से आतंकी हमले करने वाले आतंकवादियों को पाक फौज द्वारा संरक्षण दिए जाने का भारत और अफगानिस्तान ने विरोध किया था। हालांकि पाक मीडिया ने बार-बार इस संबंध में खबरें प्रकाशित कीं और सेना से कहा कि वह आतंकवादियों को संरक्षण देना बंद करे। तथ्य यह है कि नवाज शरीफ और राहील शरीफ के बीच बातचीत का विवरण मीडिया में लीक कर दिया गया, जिससे सैन्य मुख्यालय खफा हो गया।
नवाज शरीफ ने सेना को शांत करने के लिए एक कमिटी का गठन किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि बैठक के ब्योरों को डॉन को किसने उपलब्ध कराया। आईएसआई एवं सैन्य खुफिया विभाग के सदस्य भी उस कमिटी के सदस्य थे और आखिरकार आम सहमति से एक रिपोर्ट प्रधानमंत्री को भेजी गई। राहील शरीफ की सेवानिवृत्ति के बाद जांच कमिटी द्वारा भेजी गई उस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
लेकिन हाल में ही जब बाजवा ने सेना की विभिन्न छावनियों का दौरा किया, तो कुछ सैन्य अधिकारियों ने उनसे डॉन में छपी रिपोर्ट के बारे में पूछा और जानना चाहा कि जिन लोगों ने अत्यधिक गोपनीय रिपोर्ट को मीडिया में लीक किया, उन्हें अब तक दंडित क्यों नहीं किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि बाजवा पर सेना की तरफ से काफी दबाव था, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से उस पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की। इससे साबित होता है कि यह मामला बाजवा और शरीफ से संबधित नहीं है, बल्कि सेना और सरकार से संबंधित है।
नवाज शरीफ से डॉन लीक की जांच के लिए गठित कमिटी की जांच से पहले ही अपने सूचना मंत्री परवेज राशिद को बर्खास्त कर दिया। हाल ही में उस आम सहमति वाली रिपोर्ट का एक हिस्सा प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री ने विदेशी मामलों के अपने विशेष सहायक तारिक फातिमी और मुख्य सूचना अधिकारी राव तहसीन को उनके पदों से हटा दिया है। तत्काल ही इंटर सर्विसेज प्रेस रिलेशन के डीजी ने एक अजीब और अप्रत्याशित ट्वीट किया, जिसमे कहा गया कि डॉन लीक पर अधिसूचना अधूरी है और यह जांच बोर्ड की सिफारिशों के अनुरूप नहीं है। लिहाजा इस अधिसूचना को खारिज कर दिया गया है।
पूरे मुल्क में सेना के एक जूनियर जनरल द्वारा की गई इस बेअदबी की चर्चा हो रही है, जिसने प्रधानमंत्री सचिवालय द्वारा जारी अधिसूचना को खारिज कर प्रधानमंत्री का अपमान किया। यदि बाजवा को कमिटी की रिपोर्ट से कोई समस्या थी, तो वह सैन्य मुख्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच गुप्त संवाद कर सकते थे। हाल के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब सेना ने लोकतंत्रिक ढंग से तीसरी बार चुने प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से इस तरह अपमानित किया हो।
राजनीतिक टिप्पणीकार जाहिद हुसैन कहते हैं कि 'नागरिक प्राधिकार के प्रति ऐसी जबर्दस्त अवज्ञा ने एक नई और खतरनाक मिसाल स्थापित की है। स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब प्रमुख विपक्षी पार्टियां सेना के पक्ष में खड़ी हो गईं।'
सेना ने ठीक तब प्रधानमंत्री पर हमला किया, जब वह पहले से ही संकटों से जूझ रहे थे। कुछ ही समय पहले नवाज शरीफ को सर्वोच्च अदालत से एक खतरनाक फैसला सुनने को मिला कि पनामा लीक मामले में वह बेकसूर नहीं हैं। प्रधानमंत्री और उनके परिजनों के भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए एक कमिटी का गठन किया गया है।
पिछले हफ्ते एक और विवाद सामने आया, जब एक भारतीय व्यवसायी सज्जन जिंदल (जो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाते हैं) पाकिस्तान आए और मरी हिल स्टेशन पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ एक गुप्त बैठक की। इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि उस बैठक में क्या बातें हुईं और कौन-कौन उपस्थित थे। नवाज शरीफ की पोती की शादी में सज्जन जिंदल भी पहुंचे थे, जब मोदी बिना पूर्व घोषणा के काबुल से वहां पहुंचे थे। मीडिया और विपक्ष इस गुप्त बैठक की आलोचना कर रहा है, खासकर इसलिए, क्योंकि सज्जन जिंदल ने पाक सेना और खुफिया एजेंसी की आलोचना की थी और उनके खिलाफ ट्वीट किया था।
बीते मंगलवार को तारिक फातिमी ने मीडिया में एक खत जारी किया है, जो उन्होंने पद छोड़ते वक्त विदेश विभाग के अपने साथियों को लिखा था। अपने खत में उन्होंने लिखा है,'मैं हाल में अपने ऊपर लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज करता हूं। ऐसेे आरोप उस शख्स के लिए अफसोसनाक है, जिसने लगभग पांच दशकों तक पूरे सम्मान और ईमानदारी के साथ पाकिस्तान की सेवा की है।'
हालांकि पूर्व मुख्य सूचना अधिकारी राव तहसीन ने अपनी बर्खास्तगी पर ऐसा कदम नहीं उठाया है, पर खबरें आ रही हैं कि वह शीघ्र ही अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ कोर्ट जाएंगे। राव ने सीधा सवाल किया है कि लीके के पीछे कौन था और जांच कमिटी ने उसका नाम उजागर क्यों नहीं किया है।