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प्रकृति: मानसून का यों आना... हिमालयी बर्फ पिघलने के साथ ही भूस्खलन और बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ा

Fri, 06 Jun 2025 06:26 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 06 Jun 2025 06:26 AM IST
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सार
नियम है कि हिमालय में ऊंचाई बढ़ने पर बारिश कम होती जाती है, पर समय पूर्व मानसून की वजह से बर्फ पिघलने के साथ ही भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
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Nature climate crisis and monsoon Himalayan Glaciers melting risk of landslides and floods increases manifold
हिमालयी ग्लेशियर पिघलने से बढ़ीं चुनौतियां (सांकेतिक) - फोटो : Adobe stock

विस्तार

हिमालयी राज्यों में 2025 का मानसून समय से पहले आगमन के साथ गंभीर चुनौतियां भी साथ ला रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने सामान्य समय से पहले, यानी 10 से 15 जून तक पश्चिमी हिमालय के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में पहुंच सकता है। सामान्यतः इन राज्यों में मानसून जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह (20 जून से 5 जुलाई) में आता रहा है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, और मेघालय में यह जून के पहले सप्ताह (1 से 10 जून) में सक्रिय हो जाता है। इस बार, ला नीना की स्थिति और अनुकूल वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण मानसून ने केरल में 24 मई को दस्तक दे दी थी, जो 2009 के बाद सबसे जल्दी आगमन है और सामान्य तिथि 1 जून से आठ दिन पहले है। मानसून की यह तेज गति मुंबई तक 26 मई को पहुंच गई, जो करीब 16 दिन पहले है। इस असामान्य गति ने हिमालयी क्षेत्रों में समय से पहले भारी बारिश और इसके परिणामस्वरूप होने वाले खतरों की आशंका को बढ़ा दिया है।



प्रकृति का नियम है कि हिमालय में ऊंचाई बढ़ने के साथ बारिश कम होती जाती है। लगभग 5,000 मीटर की ऊंचाई के बाद, वर्षा बर्फ के रूप में गिरती है, जिससे स्थायी हिमाच्छादित क्षेत्र बनते हैं। ये क्षेत्र गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के लिए जल स्रोत हैं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी समय से पहले मानसून के खतरों का एक भयावह उदाहरण है।


इस बार, 10 जून तक मानसून के आगमन से उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है, जिससे छोटे नदी-नाले विकराल रूप धारण करते हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, मंडी और शिमला में भी यही जोखिम है। प्री-मानसून बारिश ने पहले ही कहर बरपाना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, हिमाचल के रामपुर में 25 मई को बादल फटने से अचानक आई बाढ़ ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। मौसम विभाग के अनुसार, मेघालय में 30 मई को 30 सेंटीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई, जिसने ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ का खतरा बढ़ाया। असम, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में जलभराव और भूस्खलन की स्थिति बनी हुई है। मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमान के अनुसार, मानसून की तेज गति के पीछे मेडन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) की अनुकूल स्थिति और अरब सागर व बंगाल की खाड़ी में नमी की अधिकता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय और यूरेशिया में बर्फ की मात्रा कम होने से सतह का तापमान बढ़ा, जिसने मानसून की तीव्रता को बढ़ाया। मौसम विभाग के अनुसार, इस बार 106 प्रतिशत दीर्घकालिक औसत वर्षा होगी। 

पिंडारी बेसिन अध्ययन के अनुसार, 1972–2018 के बीच स्नो लाइन के पीछे हटने में 1.36-1.67 मीटर प्रति वर्ष की वृद्धि हुई, जो जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। समय पूर्व बारिश की वजह से कृषि पर प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि खरीफ फसलों (धान, गन्ना, दाल) को अत्यधिक बारिश से नुकसान हो सकता है। पर्यटन, विशेष रूप से चारधाम और अमरनाथ यात्रा, जोखिम में है, क्योंकि भूस्खलन से सड़कें बंद हो सकती हैं। इसलिए अब तत्काल तैयारी जरूरी है। स्थिति को समझते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को सक्रिय किया है। सरकार को बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के साथ आपदा प्रबंधन योजनाएं लागू करनी होंगी। नागरिकों को मौसम विभाग की अपडेट्स की जानकारी नियमित रूप से लेनी चाहिए। 2013 की त्रासदी से सबक लेते हुए, सतर्कता और समन्वय ही इस संकट से निपटने का रास्ता है।

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