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स्वाभाविक ही है जातीय पहचान की भावना : भारतवंशी का ब्रिटिश पीएम बनना, इतिहास के सहारे जुड़ता आत्मीयता का धागा

Sun, 30 Oct 2022 06:02 AM IST
Dushyant दुष्यंत
Updated Sun, 30 Oct 2022 06:02 AM IST
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सार
ऋषि सुनक के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनते ही भारत में उनकी जातीय पहचान की खोज शुरू हुई है। किसी से हम आत्मीयता का धागा जोड़ना चाहते हैं, तो कभी किसी से न जुड़ने की वजह भी ढूंढते हैं। दोनों में ही मनुष्य की मनोवैज्ञानिक सहजता दिखती है।
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natural to hv sense of ethnic identity: Rishi Sunak become British PM, thread intimacy connecting history
Rishi Sunak - फोटो : PTI

विस्तार

ब्रिटिशों से अफ्रीका में अपमानित होकर आए महात्मा गांधी ने दुनिया की एक तिहाई आबादी वाले उनके उपनिवेश आजाद करवाए थे, अब उसी अविभाजित भारत से अफ्रीका पहुंचे एक परिवार के वंशज ने अंग्रेजों का नेतृत्व हासिल किया है। यह बदला नहीं है, यह इतिहास चक्र है। ऋषि सुनक के नाम के साथ ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री की घोषणा ने भारत में एक शब्द मीमांसा खड़ी की है, गोत्र संवाद शुरू हुआ है। 



इतिहास के विद्यार्थी और खासकर सामाजिक इतिहास के शोधार्थी के रूप में मेरे लिए यह दिलचस्प घटनाक्रम है। यह और भी कमाल है कि हम सुनक को भारतवंशी कहते-मानते हुए खुशी और गर्व से भरे हुए हैं, जबकि अपनी वेबसाइट के 'अबाउट मी'  खंड में लंबा व्यक्तिगत, शैक्षणिक व्यवसायिक, राजनीतिक परिचय देते हुए वह भारत का एक बार भी नाम नहीं लेते।


पहले सुनक की ही बात की जाए। सुनक क्या शौनक शब्द का तद्भव रूप है, जो भारतीय परंपरा के ऋषि शौनक के नाम से जुड़ता है? संभवत: उत्तर वैदिक काल में ही उनका नाम ज्ञात होता है। तो पहली बात यह कि पंजाबी खत्रियों की गोत्र परंपरा में मुझे ऋषियों के नाम नहीं मिलते, (कोई मुझे दुरुस्त/ अपडेट करे, तो स्वागत/ आदर रहेगा) जैसे, वाड्रा, ओबेरॉय, भाटिया, सेठी, गेरा, गुजराल, कोहली, भसीन, साहनी, तलवार, भल्ला, महेंद्रू, मल्होत्रा, कौशल, खन्ना, खुराना, सूरी, त्रेहन, टक्कर, आनंद, जग्गी, मनचंदा, टंडन, धवन, चोपड़ा, सिब्बल, सोबती, कक्कड़, सोढ़ी, नरूला, नय्यर, कालरा, अबरोल, आहूजा, बत्रा, बजाज, धीर, दुग्गल, दुआ, कुंद्रा, खरबंदा...।

एक धारणा के अनुसार, खत्रियों के ऋषि गुरु कश्यप हैं। ऐसे में, शौनक से जुड़ाव होना मुश्किल हो जाता है। अगर यह मान भी लिया जाए, तो बताना जरूरी है कि भारतीय ऋषि परंपरा के ऋषि शौनक के पिता का नाम सुनक या शुनक था, तो शौनक से सुनक होना तद्भव या बिगड़ना हुआ या अधिक शुद्धीकरण/मूल की तरफ लौटना? यह भी दिलचस्प है कि खत्री समुदाय में सिख मतावलंबी भी मिलते हैं, और हिंदू भी। जैसे इस देश के तीन खत्री प्रधानमंत्रियों में से गुलजारी लाल नंदा और इंद्र कुमार गुजराल हिंदू रहे हैं, जबकि मनमोहन सिंह सिख।

कहने को जातीय पहचान ढूंढने की प्रक्रिया भी शुरू हुई है, जिसे अप्रगतिशील कहकर प्रथम दृष्टया खारिज किया जा सकता है। सरलीकृत प्रतिक्रिया यह भी हो सकती है कि भारतीय उनकी जाति खोजने लगें। पर इतनी सरलीकृत बात नहीं है।

पहली बात तो यह कि 'सेंस ऑफ बिलोंगिंग्स' खोजना मनुष्य का स्वभाव है। चाहे ऋषि सुनक से यह सेंस ऑफ बिलोंगिंगन्स उनके पुरखों के भारतीय होने से जुड़े, चाहे हिंदू होने से, खत्री होने से, या लहंदा पंजाब ( पश्चिमी पंजाब) का होने से। किसी से हम किसी न किसी रूप में आत्मीयता का धागा जोड़ना चाहते हैं, तो कभी अपने व्यक्तिगत/सामाजिक इतिहास के कारण न जुड़ने की वजह भी ढूंढते हैं। दोनों में ही मुझे मनुष्य की मनोवैज्ञानिक सहजता दिखाई देती है।

हमारे देश में जातीय व्यवस्था करीब पांच हजार साल से असमानता और शोषण का आधार रही है। केवल विशेषाधिकार प्राप्त लोग ही जातीय विमर्श को समतावादी विमर्श से अलग करके देखते हैं। इस जातीय विमर्श का एक हासिल यह है कि जातीय सरनेम हमारे नाम के साथ लगा रहता है पीढ़ी दर पीढ़ी। याद रहना चाहिए कि यह भारत के सामाजिक इतिहास का विमर्श है, जिसे विस्मृत करना संभव होता, तो हमारे या आपके या हर सामान्य भारतीय के नाम के पीछे जातीय उपनाम न लगा होता।

अगर मैं अपनी बात करूं, तो जब मैं बड़ा हो रहा था, यानी लगभग बीस साल पहले, तब यही सोचता था कि जातीय समानता जातीय पहचान से रहित होकर और जाति की बात न करके हो सकती है। इस कारण मैंने अपने नाम से जातीय पहचान की दूरी चुनी। यह मेरा बीस साल से ज्यादा पुराना ख्याल है। हालांकि आज मैं अपनी उसी सोच को खारिज करके आगे बढ़ा हूं कि जातीय समानता का मार्ग भारत में जातीय पहचानों के साथ ही हो सकता है। 

बिल्ली को देखकर कबूतर आंख मूंद ले, तो बिल्ली गायब नहीं हो जाती, उसके लिए आंख खोलकर बिल्ली को बिल्ली मानकर आंखों में आंखें डालने से आगे का साहसपूर्ण मार्ग निकलेगा। क्योंकि सामाजिक समतावाद बौद्धिक आदर्शवाद से नहीं, इतिहास की असमानताओं के गर्भ से निकलता है, जैसे रात के स्याह अंधेरे की कोख से सूरज।

भारत में जातीय या सामाजिक समानता के जो भी मरहले तय हुए हैं, उनमें सुधारकों के प्रयासों के साथ उत्तर मुगलकाल की शिक्षा, मैकाले के पीनल कोड और सांविधानिक समानता (आरक्षण) की सबसे ज्यादा भूमिका मुझे दिखाई देती है।

जातीय उपनाम हमेशा केवल सामाजिक अर्थ नहीं देते, राजनीतिक अर्थ भी देते हैं, आजाद भारत के चुनावी लोकतंत्र में ये अनिवार्य सच हो गए हैं। संदर्भ वश बताना चाहिए कि हाल ही में हिंदी सिनेमा के बड़े गीतकार अपने नाम मनोज मुंतशिर के रूप में अपनी 20 वर्ष की सुपर सफल यात्रा के बाद 'मनोज मुंतशिर शुक्ला' हो गए हैं। इस परिवर्तन में किसी प्रकार की कोई बुराई नहीं है, तथ्यात्मक दृष्टि से भी बुराई नहीं है। परंतु टाइमिंग इसे राजनीतिक बना देती है।

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