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कुदरती खेती में ही सबकी भलाई

Sun, 26 Mar 2017 08:36 AM IST
गोविन्द सिंह
गोविन्द सिंह Updated Sun, 26 Mar 2017 08:36 AM IST
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Natural agriculture is beneficial to all
गोविन्द सिंह

पिछले दिनों पंजाब के जैतो कसबे में खेती विरासत मिशन की एक गोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला, जिसमें धान और गेहूं की पराली को जलाने से उत्पन्न खतरों पर चर्चा आयोजित थी। पिछले दिनों उत्तर भारत में छाई धुंध की एक वजह पराली का जलाया जाना भी बताया गया था। मालवा अंचल के सौ से अधिक किसान गोष्ठी में शामिल थे। कार्यक्रम एक गांव में था। मुख्य मार्ग से गांव तक ले जाने के लिए एक साथी अपनी गाड़ी जब हरे-भरे खेतों के बीच से ले जा रहा था, तब मेरे मुंह से निकल पड़ा कि कितने लहलहाते खेत हैं। साथी बोला, आपको जो लहलहाते खेत नजर आ रहे हैं, वे जहर उगल रहे हैं।

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बीती सदी के साठ के दशक में जब देश में हरित क्रांति आई, तो पंजाब के किसानों ने उसे हाथोंहाथ लिया। उसमें भी मालवा अंचल सबसे आगे रहा।  तीन-तीन फसलें उगाई जाने लगीं। पर यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई। अत्यधिक रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज प्रदूषित होने लगा तथा धरती और हवा-पानी भी दूषित होने लगा। भू-जल में नाइट्रेट के घुलने से शिशुओं में ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारियां होने लगीं।
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मालवा अंचल में कैंसर अपने पंजे फैलाने लगा। स्त्रियां बांझ होने लगीं, तो पुरुषों में नपुंसकता घर करने लगी। लोगों का कद भी घटने लगा। मालवा में कैंसर का अच्छा अस्पताल न होने से लोग इलाज के लिए पड़ोस के राज्य राजस्थान के बीकानेर जाने लगे, क्योंकि वहां कुछ चैरिटेबल अस्पताल सस्ते में कैंसर का इलाज करते हैं। भटिंडा से बीकानेर जाने वाली अबोहर-जोधपुर एक्सप्रेस का नाम ही कैंसर एक्सप्रेस पड़ गया। इस ट्रेन से रोज कैंसर के लगभग सौ रोगी इलाज कराने बीकानेर जाते हैं। कभी देश का पेट भरने वाला मालवा आज खुद रोगग्रस्त है, पर हमारे हुक्मरान के पास कोई उपाय नहीं है।
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पराली की समस्या भी हरित क्रांति की ही देन है। पराली पहले भी थी, पर तब उसे जलाना नहीं पड़ता था। या तो वह मवेशियों के चारे के रूप में इस्तेमाल होती या उससे  गद्दे, चटाइयां आदि तैयार की जातीं। कम्पोस्ट खाद भी उससे बनता था। बाद में कागज, गत्ते की फैक्टरियों में कच्चा माल भी इसी से निकलता। मशरूम उत्पादन, बायोमास एनर्जी, बायो एथनोल आदि के उत्पादन में भी यह काम आती थी। पर अब  घरों में मवेशी नहीं रहे, और जो थोड़े-बहुत बचे हुए हैं, उन्हें पराली बेस्वाद लगती है, क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक घुले होते हैं। सरकार यदि हर ऐसे इलाके में कागज-गत्ते की फैक्टरियां खोल दे, तो  पराली का बेहतर इस्तेमाल होने लगे। पर सरकारें भी ये सब कहां सोचती हैं! चूंकि किसानों को जल्दी-जल्दी खेत खाली करने होते हैं, इसलिए पराली जलाना ही उनके लिए एकमात्र विकल्प रह जाता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में हर सीजन में दस करोड़ टन पराली जलाई जाती है, जिनसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम सल्फर सहित अनेक दूषित गैसें निकलती हैं, जिससे अनेक बीमारियां हो रही हैं। बड़े पैमाने पर आग लगने से धरती की उर्वरा शक्ति भी कमजोर पड़ती है।


जैतो के सम्मलेन में ऐसे किसान आए थे, जो पराली को जलाने की बजाय रीसाइकिल कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर लोग अब पुरानी खेती के बारे में सोचने लगे हैं, जिसमें हर तरह की फसलें भी होती थीं, मवेशी भी थे और लोग भी थे। अच्छा है कि पंजाब के किसान जाग रहे हैं। बाकी इलाकों के किसान कब जागेंगे?

- लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

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