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गांधी के पलड़े पर मोदी
गिरिराज किशोर
Updated Thu, 24 Jan 2013 09:04 PM IST
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आज बाजारवाद का दबदबा है। बेचो और खरीदो। नफा देखो। चाहे पैसा खर्च करके हो या चरण-वंदना करके हो या किसी की टोपी किसी को पहनाकर हो। इस बात का प्रमाण अभी गुजरात में भारत के पूंजीपतियों और गुजरात के मुख्यमंत्री के समागम के समय मिला। वे कितने दूर-अंदेश हैं। प्रधानमंत्री की संभावना बनने की चर्चा मीडिया ने उछाली नहीं कि श्रेष्ठी समुदाय ने गेंद की तरह गुपकर क्षितिज में उछाल दी।
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मुख्यमंत्री जी को चने के झाड़ पर चढ़ा दिया। पदों पर दांव लगाने वाले एक सत्ता-उन्मुख सामान्य राजनेता, जिन्हें उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म का पालन करने की सीख दी थी, चढ़ भी गए। प्रधानमंत्री बनने की राह में पार्टी का समर्थन पहली शर्त है। दूसरी शर्त जनता में व्यक्ति और पार्टी की साख। तीसरी बात जनसेवा का बल। पार्टी में कई लोग दूध भरी बाल्टी टंगी देखकर बिल्ली की तरह ताक लगाए बैठे हैं। पार्टी का दम भी सीमित और तुम्हारा दम भी, लेकिन मीडिया के कयास के दम पर बाजारवाद के देवताओं ने एक सामान्य पदाकांक्षी राजनेता नरेंद्र मोदी का नाम गांधी के साथ जोड़ दिया।
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गांधी अब इतना कमजर्फ हो गया कि उसकी बराबरी किसी भी सत्ता अनुगामी से की जा रही है। अब तक खुशामदी लोग पटेल से बराबरी करते थे। चलिए, राजनीति के व्यक्ति थे। भले ही पटेल से कोई बराबरी न हो, पर गुजरात और राजनीति से संबंध होने की समानता भ्रम का कारण बन गई हो। माफी की गुंजाइश है।
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गांधी से बराबरी करना भले ही भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं को फलीभूत करने में मदद कर दे, पर इससे देश की अस्मिता पर प्रश्न चिह्न लगता है। गांधी त्याग, अहिंसा, समता, अस्तेय, अभय और सर्वोच्च मानव संवेदना के प्रतीक हैं। उनके सामने मानव मात्र की मुक्ति का ध्येय था।
गांधी अहंकार को मनुष्य के पतन का कारण मानते थे। आज तो हर रसूखदार अहंकार में डूबा है। गांधी मानते थे, अपनी अल्पता का दर्शन करना महान बनने का आरंभ है। अलग पड़ा हुआ समुद्र-बिंदु अपने को समुद्र समझने पर भी सूख जाएगा। परंतु वह अपने बिंदु होने को माने तो समुद्र में लीन होकर समुद्र हो जाएगा।
यहां मैं दो महान क्रांतिकारियों का जिक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने संसार के स्वतंत्रता संघर्ष के अनंत सागर में खुद को बूंद माना, हालांकि वे अपने देश को गुलामी के सागर से निकालने वाले सबसे बड़े खेवनहार थे। हो ची मिन्ह ने लिखा है, मैं और दूसरे क्रांतिकारी, सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, गांधी के शिष्य हैं, इससे न कम, न ज्यादा।
नेल्सन मंडेला ने लिखा है कि मैं गांधी से सिद्धांततः सहमत नहीं था, पर अपने देश को आजाद कराने के लिए उनके रास्ते पर चलने के अलावा मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था। मार्टिन लूथर किंग की एक उक्ति साबरमती आश्रम में लिखी थी, बौद्धिक और नैतिक संतुष्टि जो मुझे बेंथम और मिल के उपयोगितावाद में, मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी सिद्धांतों में, हॉब्स के सामाजिक समझौतों के सिद्धांतों, रूसो के प्रकृति की और लौटो वाले आशावाद में और नीत्शे के अतिमानवीय दर्शन में नहीं मिल सकी, उसे मैंने गांधी के अहिंसावादी दर्शन में पा लिया।
भारत के महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने समय के पांव में लिखा, वह एक ही बोली बोलता थाः उठो, जागो, और स्वतंत्र हो! अपने राम के आगे हाथ पसार कर वह कार्य क्षेत्र में भी यही मांगता था, कारागृह में भी उसने यही मांगा। वधगृह में भी यही मांगा। गांधी अंतिम आदमी के साथ खड़े थे। दोस्ती सब से थी, पर प्यार अंतिम आदमी से था। अपने आश्रम उन्होंने शहरों से दूर ग्रामों में बनाए।
दक्षिण अफ्रीका में भी और भारत में भी। बड़ी मशीनें, जो मानव श्रम की विरोधी थीं, समाज विरोधी भी हैं। वे गुलाम बनाती हैं। वह सबके लिए स्वराज चाहते थे। अपना हाथ, अपना काम इसी का नाम आत्मनिर्भरता है। खादी के पीछे भी यही विचार था। वह पाश्चात्य सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहते थे। आज देश का संपूर्ण प्रशासन और समृद्ध समाज उसका अनुयायी है। वैश्वीकरण के सब गुलाम हैं। जो स्वयं गुलाम बन गए, वे देश के लोगों को क्या स्वराज देंगे।
बिना दूसरों को गुलाम बनाए उनका ‘वैश्वीकरण’ कैसे होगा? दूसरों के सहारे न अस्मिता बचती है और न आत्मसम्मान। हमारे देश के उद्योगपतियों के सामने केवल धनार्जन उद्देश्य है। कम खर्च में उत्पादन और अधिकतम दामों में माल का निष्कासन। जो उद्योगों को कम पैसों में उत्पादन की सुविधा दे, वही महान? गुजरात दे रहा है।
टाटा से लेकर गोदरेज तक सभी मोदी की डोली कंधे पर उठा रहे हैं। केंद्र सरकार भी पीछे नहीं। उसने आम आदमी की जरूरत में काम आने वाले पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को दे दिए, जबकि खनिज आदि वस्तुओं की मालिक सरकार है। अंतिम आदमी तो अंतिम आदमी, सामान्य आदमी भी हर तरह से हलकान।
मीडिया ने गुजरात में मोदी की तीसरी बार जीत का जश्न मनाया और दिल्ली भेजने का पुलाव पका दिया। लेकिन हैट्रिक वाले तो पहले भी कई हुए, मीडिया ने कभी दिल्ली भेजने की तान नहीं छेड़ी। पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु लगातार पांच बार जीते (यह बात अलग की उनकी अपनी पार्टी के लंगी लगाने के कारण वह पीएम-बनते बनते रह गए), ओडिशा के नवीन पटनायक मोदी से अधिक वोटों से तीन बार जीत चुके, लालू प्रसाद तीन बार जीते, शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली जैसी गहमागहमी वाले राज्य में जीत चुकीं।
उनसे पहले भी कई राज्यों के मुख्यमंत्री तीन और तीन से ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहे। मगर उद्योगपति भारत चला रहे हैं। अगर वे गांधी मनोनीत करने के अधिकार का अधिग्रहण करने की स्थिति में हैं, तो उनका बनाया गांधी रहे न रहे, जनता का गांधी सदा रहेगा।