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नगा गुटों और माओवादियों का गठजोड़

ravindar dubeyरवींद्र दुबे Updated Tue, 26 Mar 2019 06:17 PM IST
माओवादी
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पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले और फिर उसके बाद बालाकोट में आतंकी शिविर पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के कारण चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में है। वहीं, नगालैंड के उग्रवादी संगठनों और माओवादियों के बीच कथित गठजोड़ की खबरों से केंद्रीय गृह मंत्रालय की नींदें उड़ी हुई हैं। आगामी चुनाव में यह मुद्दा भले न बने, लेकिन पूर्वोत्तर क्षेत्र में माओवादियों की गतिविधियों का विस्तार आगामी समय में भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है। फिलहाल स्थिति यह है कि मंत्रालय के आदेशानुसार राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) पूर्वोत्तर खासकर नगालैंड के उग्रवादी संगठनों और माओवादियों के बीच किसी भी तरह के तालमेल का पता लगाने के लिए जमीन आसमान एक किए हुए है।
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गत माह सात फरवरी को बिहार पुलिस ने पूर्णिया में अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर (यूबीजीएल) और एके 47 रायफलों की एक बड़ी खेप बरामद की। गृह मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार अभी तक की गई इस जांच से पता चला कि ये हथियार म्यांमार सीमा के उस पार से नगालैंड के भूमिगत उग्रवादी समूहों की मदद से बजरिये तस्करी कर लाए गए थे और ये देश भर के माओवादियों के पास भेजे जाने वाले थे। गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार पूर्वोत्तर में सुरक्षित स्थान खोज रहे माओवादियों ने सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई के मद्देनजर पहले भी वहां के उग्रवादी समूहों से मदद मांगी थी।

पिछले महीने बिहार पुलिस ने मणिपुर से दो और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। कहोर्नागाम और क्लियर्सन कावो मणिपुर के उखरुल से और सूरजप्रसाद गोरखपुर से पकड़े गए थे। एनआईए ने इनसे हथियारों के मुख्य सौदागर के बारे में पूछताछ की थी। उखरूल भारत-म्यांमार सीमा पर पड़ता है। सूत्रों का कहना है कि पटना का मुकेश सिंह हथियारों के सौदागरों और माओवादियों के बीच की मुख्य कड़ी है। फिलहाल वह फरार है।

गौरतलब है कि प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) देश में फिलहाल सक्रिय वामपंथी उग्रवादी समूहों में सर्वाधिक हिंसक और घातक है। इसका गठन पीपुल्स वार (पीडब्ल्यूजी) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय से 21 सितंबर 2004 को हुआ था। माओवादी एक लंबे समय से पूर्वोत्तर में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। असम में उनकी मौजूदगी पर 2006 में गृह मंत्रालय का पहली बार ध्यान गया था। जबकि सूत्रों का कहना है कि इस इलाके में वे 1996 से हैं। तभी से माओवादी पूर्वोत्तर के मुख्य विद्रोही समूहों से रणनीतिक गठजोड़ करने के सैकड़ों प्रयास कर चुके हैं। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कान्गलाईपाक (प्रीपाक), ऑल आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी और युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा), नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड इत्यादि इन समूहों में शामिल हैं। 2004 में ही उन्होंने असम और त्रिपुरा में दो समितियां स्थापित कर लीं और इस प्रकिया में उन्होंने मणिपुर की पीएलए से हाथ मिला लिया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार, जून, 2006 में माओवादी और पीएलए के सदस्यों की अनेक बैठकें हुईं।

नतीजतन कोलकाता में पीएलए का एक आधार स्थापित हो गया। यह आधार हथियार, विस्फोटक और संचार के उपकरण जुटाने में इन संगठनों की गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करता है। उक्त तथ्य इस बात से रेखांकित होता है कि ठीक दो साल बाद यानी 2008 के अक्तूबर में भाकपा (माओवादी) और पीएलए ने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य जारी कर 'अपने दुश्मन भारत देश और उसके खिलाफ युद्ध' करने पर अपनी एकता का इजहार किया।

जैसा कि भारतीय खुफिया एजेंसियों का कहना है कि भारत के पूर्वोत्तर इलाके में चीन की खासी दिलचस्पी है। इन एजेंसियों का मानना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर चीन इस इलाके के विप्लवियों को सक्रिय रखे हुए है। 2014 के संसदीय चुनावों के दौरान भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चीन की विस्तारवादी मानसिकता की ओर संकेत करते हुए इस पर जोर दिया था कि अरुणाचल जैसे राज्य हमेशा भारत का अभिन्न अंग रहेंगे। दो महीने बाद चुनाव से ठीक पहले चीनी सरकारी प्रचार माध्यमों का फोकस भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर आ गया। कहा गया कि मणिपुर, मिजोरम, मेघालय और नगालैंड देश के सर्वाधिक उपेक्षित राज्य हैं। यह बात चीन की समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने अपनी एक रिपोर्ट में कही। ये चीन का भारत को याद दिलाने का तरीका था कि पूर्वोत्तर भारत के कवच में एक दरार है।

बीते वर्षों में भारतीय और म्यांमारी मीडिया में सरकारी सूत्रों के हवाले से छपी कुछ खबरों ने पूर्वोत्तर में विद्रोह बहाली के चीनी प्रयासों के प्रति ध्यान आकर्षित किया है। इन खबरों में चीन के अल्प और दीर्घकालिक उद्देश्यों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें सुरक्षा बलों पर हमले करने में सक्रिय गुटों को मदद मुहैया करवाने, पूर्वोत्तर विद्रोहियों के एक संयुक्त मोर्चे की स्थापना, और एक गतिशील राजधानी के साथ निर्वासित सरकार के गठन में सहायता करना सम्मिलित है। यह सरकार धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार की तरह होगी। इन खबरों का दावा है कि युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया का गठन चीनी मदद के बिना संभव नहीं हो सकता था। इस संगठन ने जिस तरह से सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ की है, उसमें भी चीनी हाथ होने की बू आती है।

बहरहाल, स्थिति जो भी हो, भारत सरकार के लिए इससे मुस्तैदी से निपटना अत्यावश्यक है। हैरत इस बात की है कि हमारे यहां स्थिति को इस हद तक बिगड़ने दिया जाता है कि बाद में खतरा बहुत बड़ा हो जाता है। माओवाद इसका जीता-जागता उदाहरण है। सत्तर के दशक में जो आंदोलन पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक कुचल दिया गया था, अस्सी के दशक के अंत में आंध्र प्रदेश में फिर से उभरा और उसने मध्य भारत में अपनी जड़ें जमा लीं। नतीजा सबके सामने है।
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