फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Myanmar now in the trap of Chinese debt

चीनी कर्ज के फंदे में अब म्यांमार

Tue, 04 Feb 2020 06:26 PM IST
Raman Singh प्रशांत दीक्षित
प्रशांत दीक्षित Published by: Raman Singh Updated Tue, 04 Feb 2020 06:26 PM IST
विज्ञापन
Myanmar now in the trap of Chinese debt
शी जिनपिंग एवं सू की - फोटो : a

इन दिनों कोरोना वायरस के भयावह संक्रमण के कारण चीन पूरी दुनिया में चर्चा में है, लेकिन इसी कोरोना वायरस के हंगामे में यह खबर दब-सी गई कि बीती 18 जनवरी को चीन ने म्यांमार के साथ 33 सहमति पत्रों, समझौतों, मसौदों और विनिमय पत्रों पर हस्ताक्षर किया है, जिनमें रियायती समझौते तथा क्याकप्यू विशेष आर्थिक क्षेत्र महासागर बंदरगाह परियोजना शामिल है।


loader

दरअसल चीन ने कर्ज देने की अपनी प्रथा में कोई बदलाव नहीं किया है। वास्तव में ऋण कूटनीति उसकी विदेश नीति की आधारशिला के रूप में उभरी है और इस क्रम में वह दबाव बनाने से लेकर भ्रष्टाचार तक सभी औजारों का इस्तेमाल करता है। विकासशील दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसमें फंसा हुआ है। यह नापाक कार्यप्रणाली विकासशील दुनिया के देशों की कमजोरी को पहचानने, विकास का रोना रोने और चीनी शासन द्वारा रणनीतिक रूप से उन्हें फंसाने की रणनीति पर टिकी है। यह प्रक्रिया काफी सरल है। वित्तीय सहायता की आड़ में वह छह फीसदी की ब्याज दरों पर ऋण देता है और कर्ज न लौटाने की स्थिति में बदले में धीरे-धीरे कर्ज लेने वाले देशों के इलाकों व वाणिज्यिक गतिविधियों पर नियंत्रण करता है।

म्यांमार के साथ इन सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के म्यांमार दौरे के दौरान किया गया था। जिनपिंग ने म्यांमार के विकास में सहयोग के लिए अगले तीन वर्षों में चार अरब यूआन के वित्तीय पोषण का भी वादा किया है। रोहिंग्या समस्या को म्यांमार द्वारा ठीक से प्रबंधित नहीं करने के कारण दुनिया भर में उसकी निंदा हुई, लेकिन चीन ने उसका समर्थन किया और उसे वित्तीय सहायता देने की पेशकश की, अनिवार्य तौर पर उसी के बदले में दोनों देशों के बीच संबंधों में यह प्रगाढ़ता आई है। क्याकप्यू बंदरगाह परियोजना को पहले से ही म्यांमार के लिए कर्ज के फंदे के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि सू की के प्रमुख आर्थिक सलाहकार जानते हैं कि चीन द्वारा बनाए श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह का क्या हुआ। वह बंदरगाह कर्ज में राहत के लिए चीन को 99 वर्ष के पट्टे पर दे दिया गया है। और इस प्रकार चीन समुद्री ताकत हासिल करने के लिए अपने रणनीतिक उद्देश्य में सफल हो गया।

युन्नान और मांडले के बीच चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा, यांगून में शहरी विकास, अय्यरवाडी क्षेत्र में मी लांग गिंगिंग एकीकृत तरल प्राकृतिक गैस ऊर्जा परियोजना में तेजी और चीन से 28 पैसेंजर ट्रेन कोचों की खरीद के लिए म्यामांर को दिया कर्ज कसौटी पर हैं। ऐसे में आसियान के समूह को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह पुरी की चेतावनी पर ध्यान देना उचित होगा। उनके विचार में आसियान देश विशेष रूप से बुनियादी ढांचे के विकास के लिए चीन की आक्रामक निवेश नीति का लाभ उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें यह भी ध्यान में रखना होगा कि उनकी सरकार के पास कर्ज चुकाने के लिए साधन हैं या नहीं और परियोजना कितनी व्यावहारिक है। वे जितने पर सौदेबाजी करते हैं, उन्हें उससे ज्यादा भुगतान करना पड़ सकता है। अगर यह कर्ज और इक्विटी की ओर ले जाता है, तो इसे छोड़ देना चाहिए। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस पहले से ही चीनी खतरे से जूझ रहा है, इसी को लक्ष्य करके पुरी ने यह टिप्पणी की थी। उन्होंने चीन के साथ श्रीलंका के हम्बनटोटा व मटाला में निवेश सौदों का भी हवाला दिया।

इस हवाई अड्डे के उत्थान और पतन की कहानी राष्ट्रीय राजनीति, भूराजनीतिक पैंतरेबाजी, भ्रष्टाचार और बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में निवेश करने की चीन की भूख के साथ फंसी है, जिसे बाद में इक्सीसवीं सदी का समुद्री सिल्क रोड कहा गया। मटाला को 20.9 करोड़ डॉलर की लागत पर देश के दूसरे सबसे बड़े वायु परिवहन केंद्र के स्थल के रूप में चुना गया, जिसमें से 19 करोड़ डॉलर ऋण चीन से मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के अलावा वहां 1.4 अरब से ज्यादा लागत का एक विशालकाय बहुमंजिला महासागरीय बंदरगाह, एक विशाल औद्योगिक क्षेत्र, एक बड़ा कांफ्रेंस केंद्र, एक विश्व स्तरीय क्रिकेट स्टेडियम, आवास विकास और एक होटल व पर्यटन क्षेत्र भी होगा।

हम्बनटोटा राजपक्षे शासन की चमकदार उपलब्धि बन गया था। लेकिन इस परियोजना के निर्माण से संबंधित एक ऐसी भी खबर सामने आई कि राजपक्षे के कुनबे के एक नौसैनिक अधिकारी ने इस परियोजना के समर्थन के लिए भारी रिश्वत ली थी।

बड़े पैमाने पर इन परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए चीन हर तरकीब अपनाने को तैयार था। राजपक्षे के पिछले शासन काल में कम से कम 4.8 अरब डॉलर कर्ज चीन ने आवंटित किए थे, जिनमें से अधिकतर अनुकूल शर्तों पर दिए गए थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की सरकार को 1.1 अरब डॉलर के लिए बंदरगाह के संचालन की 80 फीसदी हिस्सेदारी चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग कंपनी लि. को बेचनी पड़ी, क्योंकि उसने भी कोलंबो बंदरगाह के लिए अनुबंध किया था। श्रीलंका ने यह कदम चीन के एक्जिम बैंक से बंदरगाह बनाने के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए उठाया। श्रीलंका को सालाना छह करोड़ डॉलर कर्ज चुकाना पड़ता है। सौभाग्य से भारत सरकार ने श्रीलंकाई सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है, जिसमें विदेशी नौसेनाओं द्वारा रणनीतिक सैन्य उद्देश्यों के लिए बंदरगाह के उपयोग को मना किया गया है। लेकिन मेरी समझ से अब इसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि चीनी पहले से ही कोलंबो बंदरगाह पर डटे हुए हैं।

हाल ही में पाकिस्तान का आर्थिक संकट सामने आया, जब विगत 31 दिसंबर को दो आंकड़े जारी किए गए। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में पाकिस्तान का कुल कर्ज 40 फीसदी बढ़ गया। इस तरह से हम चीन और पाकिस्तान के कर्ज संबंधी रिश्ते का हश्र देख सकते हैं, उसके ऊपर चीन का ऐसा शिकंजा कसा है कि उसे एफएटीएफ पर चीन का समर्थन लेना पड़ेगा और उसके पास कोई वैकल्पिक भुगतान पद्धति नहीं है। इसी तरह की कहानी इंडोनेशिया, हार्न ऑफ अफ्रीका और वेनेजुएला की है। वेनेजुएला की आपदा की सड़क चीनी नकदी से अटी पड़ी है।

-लेखक सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed