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कमलेश तिवारी हत्याकांड: कट्टरता से उपजी हत्या और उठते सवाल
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कमलेश तिवारी हत्याकांड
- फोटो : अमर उजाला
अगर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कमलेश तिवारी की हत्या सामान्य अपराध होता, तो निश्चय ही मीडिया को उसका इस तरह विस्तार से विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि किसी तरह की हत्या और वह भी राजधानी में, कानून-व्यवस्था पर प्रश्न तो खड़ा करती ही है। पर यह हत्या अपने किस्म की अलग घटना है। पुलिस का दावा है कि सूरत में हत्या की साजिश रची गई थी। उसका यह भी कहना है कि हत्या की मुख्य वजह कमलेश तिवारी का 2015 में दिया गया बयान था, जिसमें उन्होंने पैगंबर साहब पर कुछ टिप्पणियां की थीं। जिन तीन लोगों को गुजरात से गिरफ्तार किया गया है, उनमें कोई अभ्यस्त अपराधी नहीं है।
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यह आम हत्या का अपराध नहीं है, बल्कि मजहब की कट्टरता से उपजी हत्या है। किसी ने इस्लाम पर कोई नकारात्मक टिप्पणी कर दी, उसके खिलाफ हत्या का फतवा जारी हो जाए और उसकी हत्या भी कर दी जाए, ऐसा उदाहरण इसके पूर्व का नहीं मिलता। वर्ष 2015 में तब उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री आजम खान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भद्दी टिप्पणी की थी, जिसकी प्रतिक्रिया में कमलेश तिवारी ने मोहम्मद साहब पर टिप्पणी कर दी। तिवारी के बयान से लोगों की भावनाओं को चोट पहुंची, तो उसके लिए हमारे यहां कानून है, जिसके तहत सजा हो सकती थी। हालांकि उन्हें रासुका में अखिलेश यादव सरकार ने बंद कर दिया था, जो अतिवादी कदम था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से उन्हें जमानत मिली थी। उनके खिलाफ मामला चल रहा था। अपने देश का शासन सेक्यूलर संविधान के तहत चलता है। इसमें जांच का कार्य पुलिस का और सजा देना न्यायालय का काम है।
उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रमुख का कहना है कि अभी तक किसी आतंकवादी संगठन से इसका संबंध पता नहीं चला है। ऐसी वारदात के लिए किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य होना जरूरी नहीं है। दुनिया में अनेक ऐसे लोगों ने आतंकी वारदात किए हैं, जिनका किसी संगठन से संबंध नहीं। हमारे देश में 125 से ज्यादा ऐसे लोग गिरफ्तार हुए हैं, जो आईएस के सदस्य नहीं थे, पर उसके लिए काम कर रहे थे। हालांकि इस कांड में अलहिंद ब्रिगेड ने हत्या की जिम्मेदारी ली है, पर उसके बारे में कुछ कहना कठिन है।
इसे आतंकवादी हमला भले न कहा जाए, पर इसका चरित्र वही है, मजहबी कट्टरता के विचार से निकली हिंसा। आतंकवाद निरोधी दस्ता एटीएस ने दो साल पहले अहमदाबाद में आईएस के कुछ संदिग्धों को पकड़ा था। उन्होंने पूछताछ में बताया था कि उनके निशाने पर कमलेश तिवारी भी है। उन आतंकियों ने तिवारी को नहीं मारा, तो दूसरे ने मार दिया। यह एक खतरनाक विचार है। किसी मजहब के बारे में ऐसा बयान नहीं दिया जाना चाहिए, जिससे किसी की भावना को चोट पहुंचे। पर किसी ने ऐसा किया भी, तो उसकी ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए भी कानून के राज में कोई जगह नहीं हो सकती। इसे यदि नहीं रोका गया, तो देश भयानक हिंसा की गिरफ्त में फंस जाएगा। जिन लोगों ने फतवा दिया, उत्तेजक नारे लगाए, लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित किया, वे सब उसी समय गिरफ्तार हो जाने चाहिए थे।
कमलेश तिवारी पर रासुका लगा सकते हैं, तो उन लोेगों गिरफ्तार क्यों नहीं कर सकते थे? वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार की इस मायने में आलोचना की जा सकती है कि इसने तिवारी को सुरक्षित करने के लिए कदम नहीं उठाए। यह अस्वीकार्य है। लेकिन जिस मजहबी कट्टरता के तहत हत्या की गई, वह तो सारे अस्वीकार्य पहलुओं को पीछे छोड़ जाता है।