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काठ की हांडी फिर चढ़ाने की कोशिश
उमेश चतुर्वेदी
Updated Fri, 11 Oct 2013 08:13 PM IST
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समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों के ठीक पहले उन्होंने तीसरे मोर्चे का राग छेड़ दिया है। कभी पहलवान रहे मुलायम सिंह को यह पता है कि कब और कैसा सियासी दांव खेलना है। लिहाजा उनके बयान के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जाने शुरू हो गए हैं, लेकिन यहां सबसे अहम सवाल यही है कि क्या सचमुच तीसरा मोर्चा बनने की अब भी गुंजाइश है।
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वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े रणनीतिकार और पैरोकार माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत थे। उस समय उनके लिए देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देना और सांप्रदायिकता की प्रतीक भाजपा को रोकना बड़ा राजनीतिक मकसद था। इसके साथ ही उनका लक्ष्य कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकना भी था। हालांकि तब उनके एक बड़े सिपाही रहे लोकसभा सांसद सैफुद्दीन चौधरी कांग्रेस के साथ सहयोग की हिमायत कर रहे थे। चौधरी का मकसद भी सांप्रदायिकता को रोकना ही था। लेकिन सुरजीत को उन दिनों 1990 में अयोध्या में गोली चलवा चुके मुलायम सिंह यादव से धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की सबसे ज्यादा उम्मीद थी, लिहाजा उन्होंने सैफुद्दीन चौधरी के सुझाव को गुस्ताखी माना और 1996 में लोकसभा चुनाव का टिकट उन्हें नहीं दिया। लेकिन सुरजीत मुलायम को भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाने में नाकाम रहे। क्योंकि तब तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े दल जनता दल को मुलायम की पांच साल पुरानी दगाबाजी याद थी। जनता दल से 1991 में अलग होकर मुलायम सिंह ने पहले समाजवादी जनता पार्टी का दामन थामा था और बाद में अपनी समाजवादी पार्टी बना ली थी। लिहाजा मुलायम प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए।
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यह बात और है कि माकपा समेत तमाम वामपंथी दलों की नजरों में वह धर्मनिरपेक्षता की भावी धुरी और तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े नेता के तौर पर बने रहे। इसी दम पर भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते के खिलाफ 2008 में वाम मोर्चे ने कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया था। वाम मोर्चे को उम्मीद थी कि धर्मनिरपेक्षता के जिस प्रतीक को उन्होंने हर मौके पर स्थापित किया है, वह उनका साथ देगा। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस का साथ दिया और न सिर्फ सरकार बच गई, बल्कि परमाणु समझौते को मान्यता भी मिल गई। इसी तरह, खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के मसले पर संसद में समूचा विपक्ष एक हो गया था। मुलायम ने भी इसका विरोध किया। तब वाम मोर्चे को उम्मीद जगी कि शायद वोटिंग में मुलायम उसका साथ दें। लेकिन ऐन वोटिंग से पहले मुलायम ने संसद की कार्रवाई से बहिर्गमन किया। कुल मिलाकर कहें, तो ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुलायम ने उन्हीं दलों को ठेंगा दिखाया, जिन दलों ने उनमें तीसरा मोर्चा के हीरो की तस्वीर देखी थी। ऐसे में अब यह मान लेना कि मुलायम के तीसरे मोर्चे को लेकर तीसरे मोर्चे के संभावित दल सहयोगी रूख अख्तियार करेंगे, अतिशयोक्ति ही लगती है।
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तीसरे मोर्चे के बड़े दल के रूप में तेलुगू देशम पार्टी की भी पहचान रही है। पर 2004 से आंध्र की सत्ता से दूर चंद्रबाबू नायडू को लगता है कि भाजपा का साथ ही उनकी वापसी करा सकता है। लिहाजा वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं। तीसरे मोर्चे के संभावित दल के रूप में जनता दल (यू) को भी माना जाता है, लेकिन नीतीश कुमार की कांग्रेस से नजदीकियां अब छिपी नहीं रही हैं। वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के प्रमुख दल के तौर पर द्रमुक और अकाली दल की भी भूमिका थी, लेकिन द्रमुक अभी कांग्रेस के खोल से बाहर निकलता नजर नहीं आ रहा और अकाली दल को भाजपा से कोई परहेज नहीं है। वाम मोर्चा वैसे ही निस्तेज पड़ा है। लिहाजा तीसरा मोर्चा कैसे बनेगा, इस सवाल का जवाब शायद मुलायम को भी नहीं सूझ रहा होगा। इसीलिए वह चुनाव बाद मोर्चा बनने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। बेशक राजनीति में वक्त और हालात के मुताबिक गठबंधन बनते हैं और राजनीतिक मकसद को साधा जाता है, लेकिन मुलायम सिंह को यह नहीं भूलना चाहिए कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।