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लॉकडाउन और किराये का कानून

Mon, 01 Jun 2020 07:54 AM IST
Mranal Kanwar मृणाल कंवर, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
मृणाल कंवर, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट Published by: Mranal Kanwar Updated Mon, 01 Jun 2020 07:54 AM IST
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mrinal kanwar editorial, Lockdown and rental law
rental law - फोटो : social media

कोरोना महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से अपंग बना दिया है। इस परेशानी के दौर में वाणिज्यिक संस्थाओं और आम आदमी के लिए किराये का भुगतान एक बड़ी चुनौती बन चुका है। एक आम किरायेदार कह सकता है कि कोरोना जैसी अप्रत्याशित परिस्थिति में, जहां पहले से ही वह अत्यधिक मौद्रिक तनाव से गुजर रहा है, उससे किराये का भुगतान करने की अपेक्षा करना अनुचित है। दिल्ली उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इस पर प्रकाश डालता है। यह निर्णय एक आवेदन के संदर्भ में लिया गया है, जिसमें लॉकडाउन का हवाला देते हुए किराये को निलंबित करने या उस पर रोक लगाने की मांग की गई थी।


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इस मामले में आवेदक ने 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए एक दिशा-निर्देश के निलंबन की मांग की थी, जिसके तहत आवेदक को खान मार्केट, नई दिल्ली में एक संपत्ति के लिए 3.5 लाख रुपये प्रति माह की दर से किराये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था, जो कि रेंट कंट्रोलर कोर्ट द्वारा पारित बेदखली आदेश को रोकने के लिए एक शर्त थी।

उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, किरायेदार प्राकृतिक आपदा या ‘फोर्स मेजर’ घटना (ऐसी अप्रत्याशित घटना, जिसका कोई अनुमान नहीं हो और न ही जिस पर कोई नियंत्रण हो) का आह्वान करते हुए लॉकडाउन के कारण किराये के भुगतान पर रोक लगाने की मांग नहीं कर सकते हैं, विशेष तौर पर जब किराये के परिसर पर उनका निरंतर कब्जा हो। अदालत के अनुसार, यदि पट्टा समझौता 'लॉकडाउन' परिदृश्य पर मौन है, तो इस दौरान किराये का निलंबन केवल लॉकडाउन, या परिसर के गैर-उपयोग के कारण नहीं मांगा जा सकता है।

लेकिन ऐसे करार, जिनमें मासिक भुगतान की व्यवस्था बिक्री कारोबार या लाभ साझाकरण के आधार पर तय हुई हो, और महामारी कि वजह से बिक्री न होने से कोई लाभ नहीं हुआ हो, वैसे में किरायेदार/पट्टेदार, छूट या निलंबन प्राप्त करने के हकदार हो सकते हैं। ऐसे मामले विशुद्ध रूप से करार की शर्तों द्वारा शासित होंगे। अगर करार में 'फोर्स मेजर' प्रावधान है, तो यह स्थिति, भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 32 के प्रावधानों द्वारा शासित होगी।

धारा 32 उन करारों के प्रवर्तन के लिए कानून प्रदान करती है, जो किसी घटना होने पर समाश्रित हों। यदि करार में 'फोर्स मेजर' की शर्त नहीं है या घटना 'फोर्स मेजर' खंड से परे है, तो आम तौर पर अधिनियम की धारा 56 के सहारे अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। धारा 56 के अनुसार, जब करार के तहत कार्य तत्पश्चात असंभव हो जाए, तो वह करार शून्य हो जाता है।

परंतु मौजूदा कानून के अनुसार, धारा 56 का सहारा पट्टा समझौता मामलों के लिए नहीं लिया जा सकता है। वर्तमान आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजा ध्रुव देव चंद बनाम राजा हरमोहिंदर सिंह (1968) मामले में निर्धारित कानून पर निर्भर करते हुए व्याख्या की कि, धारा 56 का आवेदन, पट्टा समझौता मामले के लिए नहीं किया जा सकता है, क्योंकि धारा 56 उन मामलों पर लागू नहीं होती है, जिनमें स्थानांतरण पूरा हो चुका है।

हाई कोर्ट के अनुसार, किरायेदार के पास एक विकल्प और भी है, जो संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 108 के तहत है। हालांकि, इसका लाभ केवल तभी उठाया जा सकता है, जब संपत्ति के पूरी तरह से नष्ट हो जाने के कारण परिसर स्थायी तौर पर उपयोग के लिए अयोग्य हो जाए।

इस मामले में भले ही कोर्ट ने किरायेदार को किराये की देयता से बचने की अनुमति नहीं दी, पर कोरोना के प्रकोप और वर्तमान परिस्थिति के मद्देनजर कहा है कि किराये के भुगतान की अनुसूची में कुछ स्थगन या छूट लॉकडाउन के कारण दी जा सकती है। हो सकता है कि ऐसे मामले के निपटारे में अन्य राज्यों के उच्च न्यायालय भी ऐसा ही फैसला दें।

अतः किरायेदार को समय रहते मकान मालिक से किराये के भुगतान में देरी पर चर्चा करनी चाहिए। अगर चर्चा से बात नहीं बनती, तो किरायेदार को न्यायालय की न्यायसंगतता क्षेत्राधिकार के सिद्धांतों के तहत न्यायालय से स्थगन या विलंबित भुगतान या छूट या आंशिक भुगतान की गुहार लगानी चाहिए, न कि अधिकार के रूप में।

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