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पैसा गायब, मुश्किलें कायम

Thu, 04 Oct 2018 06:07 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Thu, 04 Oct 2018 06:07 PM IST
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Money disappears, difficulties persist
कर

अक्सर कहा जाता है आपके पास जो कुछ भी है, वह कर विभाग का है। कभी यह यूएस इंटरनल रेवन्यू सर्विस का सिद्धांत हुआ करता था, लेकिन सरकारों के बारे में भी इसे लागू किया जा सकता है। पिछले हफ्ते विद्वान लोगों ने जीएसटी परिषद की तीसवीं बैठक आयोजित की थी। चर्चा थी कि दरों में कटौती की जा सकती है और पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाकर कुछ राहत दी जा सकती है। लेकिन इन लोगों ने उपभोक्ताओं पर एक और कर लाद दिया, राष्ट्रीय आपदा राहत उपकर (सेस)। जीएसटी परिषद ने राजस्व संग्रह को बढ़ाने के तरीके जानने के लिए बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी की अगुआई में एक सात सदस्यीय कमेटी का गठन किया है।


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सोशल मीडिया में मजाक भी तेजी से फैलता है, सो इस नए उपकर का भी खूब मजाक बनाया गया। शनिवार को ट्वीटर पर लोगों ने मानव निर्मित आपदाओं की फेहरिस्त जारी करते हुए पूछा कि सड़कों के गड्ढों, बिजली क्षेत्र के नुकसान, पानी के संकट और घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रम के साथ ही आईएल ऐंड एफएस (इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड ) को उबारने के लिए भी उपकर लगाना कैसा रहेगा? कुछ ने तो एयर इंडिया सेस, बैड लोन सेस और मैन्युअल ड्रेनेज क्लीनर्स सेस या ट्रैफिक जाम से निजात दिलाने के लिए भी सेस लगाने का सुझाव दे दिया।
 
बहस इस पर नहीं हो रही है कि प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों तक राहत कैसे पहुंचाई जाए। सवाल है कि आखिर किसी वस्तु और सेवा पर कितने तरह से कर वसूला जा सकता है और करों के इस पिरामिड की ऊंचाई कब थमेगी! उदाहरण के लिए, तंबाकू और कच्चे तेल पर राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक कर पिछले पंद्रह वर्ष से लागू है और जुलाई 2017 में इसे जीएसटी में शामिल कर दिया गया। 
करदाताओं पर उपकरों और अधिशुल्क (सरचार्ज) की पूरी शृंखला लाद दी गई है। जरा केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले ऐसे करों की सूची पर गौर कीजिए। इस वर्ष करदाताओं पर निगम कर और आयकर पर लगाए जाने वाले शिक्षा उपकर और अधिशुल्क का भार 1.5 लाख करोड़ रुपये का होगा, जिसमें से 49,461 करोड़ रुपये उपकर के रूप में और 1,00,605 करोड़ रुपये अधिशुल्क के रूप में होंगे। इसे अब सोशल वेलफेयर सरचार्ज कहा जाता है और करदाताओं को कुल कर का दस फीसदी देना होगा।

पेट्रोल के दाम मुंबई सहित अनेक जगह 91 रुपये प्रति लीटर को पार कर गए हैं और सौ रुपये की ओर बढ़ रहे हैं। ईंधन के एवज में एकत्र किए जाने वाले अतिरिक्त धन पर ध्यान दें, तो शायद ही इस पर हैरत हो। कच्चे तेल पर अनुमान है कि 14,850 करोड़ रुपये उपकर के रूप में मिलेंगे और कच्चे तेल के दाम 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल होने पर इसमें और वृद्धि ही होनी है। इसमें पेट्रोल और डीजल पर रोड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस से मिलने वाले करीब 1,13,000 करोड़ रुपये को और जोड़ दीजिए। वास्तव में 2014 से 2018 के दौरान केंद्र सरकार ने 11.71 लाख करोड़ रुपये वसूले थे और राज्य सरकारों ने 7.19 लाख करोड़ रुपये। पिछले वर्ष केंद्र ने रोजाना 900 करोड़ रुपये और राज्यों ने 570 करोड़ रुपये एकत्र किए।
 
स्वच्छ भारत सेस, कृषि कल्याण सेस, बीड़ी सेस, शुगर सेस, ऑटोमोबाइल सेस और क्लीन एनर्जी सेस के साथ ही पान मसाला सरचार्ज को जीएसटी में शामिल कर लिया गया है। कोई यह सोच सकता है कि इन सारे सेस को जीएसटी में शामिल करने से मामला खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है। राज्यों ने केंद्र को उच्च और बहु स्तरीय दरें रखने के साथ ही कम वसूली की स्थिति में भरपाई के लिए भी राजी किया। केंद्र राज्यों को जो भरपाई करेगा, उसे एक नाम दिया गया है। इसे जीएसटी भरपाई सेस कहा जाएगा और अनुमान है कि इस वर्ष यह 90,000 करोड़ रुपये होगी।

इस वर्ष केंद्र सरकार द्वारा वसूला जाने वाला कुल सेस और सरचार्ज तीन लाख करोड़ रुपये होगा, यानी रोजाना 850 करोड़ रुपये। इससे भी अहम है कि एकत्र किए जाने वाले इस सेस या सरचार्ज को राज्य सरकारों के साथ साझा नहीं किया जाएगा। वास्तव में रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिति पर 2017-18 की रिपोर्ट के मुताबिक, सेस और सरचार्ज के रूप में केंद्र का राजस्व संग्रह 2014-15 में कुल राजस्व के 9.3 फीसदी से बढ़कर इस वर्ष 14.2 फीसदी हो गया और केंद्र के संग्रह में राज्यों की हिस्सेदारी 2016-17 में 35.4 फीसदी से गिरकर 34.6 फीसदी रह गई। इस बीच, केंद्रीय योजनाओं में राज्यों को अतिरिक्त भार वहन करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों पर किसानों की कर्जमाफी का भुगतान राज्यों को करना होगा। यह जानकर शायद ही हैरत हो कि राज्यों का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है। विडंबना यह है कि अधिकांश सेस जिस मद में लिए जाते हैं, वे तकनीकी रूप से राज्य का विषय हैं, मसलन शिक्षा। केंद्र द्वारा निगम कर और आयकर में सिर्फ शिक्षा के मद में लगाए गए सेस से प्राप्त संग्रह 2016-17 के 25,353 करोड़ रुपये से बढ़कर इस वर्ष दोगुना करीब पचास हजार करोड़ रुपये हो गया। दुख कर के बोझ का या राजस्व संग्रह को लेकर नहीं, बल्कि शिक्षा की खराब स्थिति को लेकर है, जैसा कि ‘प्रथम’ तथा मानव संसाधन मंत्रालय सहित कई संस्थाओं के अध्ययनों में खुलासा हुआ है। स्वास्थ्य सुरक्षा या शहरीकरण के मामले में भी स्थिति कोई अलग नहीं है।
 
बड़ा सवाल सरकारों के खर्च और फिजूलखर्ची से जुड़ा है। 2009-10 से 2018-19 के दौरान केंद्र का सकल कर संग्रह 6.24 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 22.71 लाख करोड़ रुपये हो गया और राज्यों का संग्रह पांच लाख करोड़ से बढ़कर 20 लाख करोड़ रुपये हो गया। उच्च संग्रह और उच्च आवंटन से स्वाभाविक रूप से बेहतर नतीजे मिलने चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। हर आम चुनाव से पहले खर्चों को नियंत्रित करने और कर कम करने की बात होती है और फिर पांच साल की सुस्ती शुरू हो जाती है। खर्चों को नियंत्रित करने के बारे में 2015 की बिमल जालान कमेटी की रिपोर्ट के सुझावों पर अमल की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है।

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