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मौद्रिक नीति: दो बीघा जमीन को याद कीजिए... किसान-व्यवसायी देश के विकास में अहम, संरचनात्मक सुधार बेहद जरूरी

Tue, 15 Oct 2024 02:35 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 15 Oct 2024 02:35 AM IST
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सार
किसी जमाने में बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा जमीन में कर्ज से जूझते किसानों की जो स्थिति दर्शाई गई थी, आज किसानों और छोटे व्यवसायियों को उससे बचाने की जरूरत है, क्योंकि ये दोनों क्षेत्र सबसे बड़े नियोक्ता हैं और दोनों मिलकर जीडीपी में 40 फीसदी से अधिक का योगदान करते हैं।
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Monetary Policy of RBI need to revisit Do Bigha Jameen Farmers along with business vital for development
प्रतीकात्मक - फोटो : एएनआई

विस्तार

पिछले हफ्ते रिजर्व बैंक की पुनर्गठित मौद्रिक नीति समिति ने मुद्रा की लागत और अर्थव्यवस्था की स्थिति की समीक्षा की। हालांकि, पहली नजर में स्थितियां ब्याज दरों में कटौती का संकेत दे रही थीं।मुद्रास्फीति कम हो गई है, वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक दरों में कटौती कर रहे हैं और जीडीपी वृद्धि दर रिजर्व बैंक के 7.1 प्रतिशत के पूर्वानुमान के मुकाबले 6.7 प्रतिशत पर धीमी रही। रिजर्व बैंक ने दरों में कटौती तो नहीं की, लेकिन अपने रुख को बदलकर तटस्थ कर दिया, जिससे निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती का संकेत मिलता है।



बहस पैसे की लागत और विकास की गति पर केंद्रित है। पैसे की कीमत महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास की गति को बनाए रखने के लिए जरूरी है ऋण तक व्यापक पहुंच। जैसा कि एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक एन इंक्वायरी इनटू द नेचर एंड कॉज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस में लिखा है, 'पैसे से ही पैसा बनता है। जब आपके पास थोड़ा होता है, तो अक्सर और अधिक पाना आसान होता है। लेकिन, उस थोड़े से पैसे को पाना मुश्किल होता है।' भारत की अर्थव्यवस्था ऋण असमानता की लागत और छोटे व गरीब उधारकर्ताओं को कम ऋण देने की समस्या से त्रस्त है। मौजूदा परिदृश्य समस्याओं से भरा पड़ा है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई का ही उदाहरण ले लीजिए, भारत छह करोड़ एमएसएमई का घर है, उनमें से 2.97 करोड़ उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत हैं। एमएसएमई जीडीपी का 30 फीसदी, विनिर्माण उत्पादन का 45 फीसदी और निर्यात का 48 फीसदी हिस्सा है, और वे करीब 11 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं। ढेरों योजनाओं के बावजूद (जैसे कि आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना, जिसने कई एमएसएमई को बचाया और मुद्रा योजना) एमएसएमई के लिए ऋण तक पहुंच कठिन बनी हुई है।


फरवरी, 2024 की क्रिसिल रिपोर्ट से पता चला है कि इस क्षेत्र में औपचारिक ऋण की पहुंच मात्र 20 प्रतिशत है। 2022 में वित्त से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने पाया कि औपचारिक ऋण केवल 39 प्रतिशत एमएसएमई को ही छू पाया है। समिति ने यूके सिन्हा विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया, 'कुल मांग 37 लाख करोड़ रुपये के ऋण का अनुमान है, जबकि कुल आपूर्ति 14.5 लाख करोड़ रुपये है,' जिससे 20-25 लाख करोड़ रुपये का ऋण अंतर रह जाता है। फंडिंग की कमी एमएसएमई को प्रभावित करती है और प्रौद्योगिकी उन्नयन में बाधा डालती है।

दो बीघा जमीन समेत कई फिल्मों में ऋण के लिए किसानों के संघर्ष को दर्शाया गया है। उदारीकरण के 30 साल बाद भी कृषि लाइसेंस राज के अधीन है। खेती की व्यवहार्यता कानून, विनियमन और वितरण के चक्रव्यूह में फंसी हुई है। किसान क्रेडिट कार्ड के कारण स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है। कृषि के लिए बैंक ऋण 2014-15 के 6.04 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 24.8 लाख करोड़ रुपये हो गया है। फिर भी समस्याएं बनी हुई हैं और किसानों को ऋण लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 2023 में हुए नाबार्ड के एक अध्ययन से पता चलता है कि 58 फीसदी किसान ऋण योजनाओं के बारे में जानते थे, क्योंकि किसान क्रेडिट कार्ड लोकप्रिय है, लेकिन मात्र 28 फीसदी किसान ही ऋण ले पाते हैं। ऋण प्राप्त करने में जो बाधाएं आती हैं, उनमें जटिल प्रक्रिया, बैंक से दूरी और दस्तावेजीकरण शामिल हैं। इसलिए छोटे और सीमांत किसानों की ऋण से दूरी बनी हुई है। अध्ययन में बताया गया है कि बटाईदार किसानों को 'संस्थागत ऋण प्रणाली में शायद ही कभी शामिल किया जाता है।'

कृषि का जीडीपी में योगदान करीब 16 फीसदी है, जबकि इसमें 46 फीसदी कार्यबल लगे हुए हैं। वर्ष 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में 68 फीसदी भूस्वामियों के पास एक हेक्टेयर तक जमीन है। 2019 के नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों की औसत मासिक आय 10,218 रुपये थी और औसत घरेलू ऋण 74,121 रुपये। हालांकि पीएम किसान सम्मान निधि ने मदद की है, लेकिन इस क्षेत्र का संकट ग्रामीण खपत के आंकड़ों में दिखाई देता है और यह नौकरी में कोटे की मांग और हाल के चुनाव परिणामों में भी परिलक्षित होता है। किसानों की आय में सुधार और कृषि में कार्यबल के अनुपात को कम करने के दोहरे उद्देश्य के लिए ऋण का विस्तार करने की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि वित्तीय समावेशन की कमी की वजह से ऋण वितरण में बाधा आ रही है। आधार ने जन-धन योजना के माध्यम से वित्तीय समावेशन को बढ़ाया है। एक दशक में भारत ने 53.1 करोड़ लोगों को बैंक खातों से जोड़ा है, जिनमें से दो-तिहाई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं। डिजिटल भुगतान में प्रौद्योगिकी की क्षमता स्पष्ट है-सितंबर में यूपीआई के जरिये 15 अरब लेनदेन हुए। हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस (यूएलआई) लॉन्च किया। यूपीआई की तरह इससे ऋण दिया जा सकता है। हालांकि, नीति में खामियों के कारण ऋण तक पहुंच नहीं हो पाती है और बड़े उधारकर्ताओं को आसानी से ऋण देने को लेकर पूर्वाग्रह के कारण स्थिति और भी खराब हो जाती है। प्रौद्योगिकी तभी मदद कर सकती है, जब सिस्टम क्षेत्रों की क्षमता को पहचाने। ऋण मूल्यांकन खेती और छोटे व्यवसायों की व्यवहार्यता पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, खेती की व्यवहार्यता इनपुट और बाजारों तक पहुंच पर निर्भर करती है, जो सामूहिक रूप से पैमाने और मूल्य प्राप्ति में सक्षम बनाती है। छोटे उद्यमी को तकनीक और पैमाने को उन्नत करने के लिए प्रणालीगत समर्थन और बड़े खरीदार द्वारा चूक से सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

सफलता के लिए संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता होती है। छोटे व्यवसाय और किसान भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। कृषि और एमएसएमई सबसे बड़े नियोक्ता हैं और दोनों मिलकर जीडीपी में 40 फीसदी से अधिक का योगदान करते हैं। विकास और समृद्धि को बनाए रखने के लिए ऋण अंतर को पाटना महत्वपूर्ण है। ऑटोमोटिव इंजीनियर बता सकते हैं कि सभी सिलेंडरों में ईंधन पहुंचाना रफ्तार और गति के लिए आवश्यक है।

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