कथनी को करनी में बदलें मोदी
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ब्रिसबेन में जी-20 की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया भाषण जितना अंतरराष्ट्रीय समुदाय या निवेशकों को संबोधित था, उतना ही वह घरेलू दर्शकों से भी जुड़ा था। मोदी का कहना था कि आर्थिक सुधारों को जन-केंद्रित होना चाहिए। मोदी की यह भावना जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत के शेरपा सुरेश प्रभु की बातों से ज्यादा सटीक तरीके से सामने आई है। प्रभु का कहना था कि जो विकास लोगों के जीवन में बदलाव नहीं ला पाता, उस विकास का कोई अर्थ नहीं है। लोगों का जीवन-स्तर बहस के केंद्र में होना चाहिए, न कि खुद का विकास। प्रभु ने यह भी कहा कि पिछले एक दशक से पूरी दुनिया बढ़ रही बेरोजगारी का गवाह रही है, और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक संस्थान भी अब 'विकास की गुणवत्ता' के बारे में बात करने लगे हैं।
नरेंद्र मोदी ने इस पर भी बल दिया कि सुधार चुपके या गोपनीय तरीके से नहीं किए जा सकते। इसका मतलब यह है कि बड़े आर्थिक सुधारों के फैसले में लोगों की पारदर्शी और लोकतांत्रिक भागीदारी अवश्य होनी चाहिए। यह घरेलू निवेशकों के साथ ही वैश्विक निवेशकों के लिए भी संदेश था, जिन्होंने ये उम्मीदें पाल रखी हैं कि नई सरकार के पास कोई जादुई छड़ी है, जिसकी सहायता से वह श्रम कानून, भूमि कानून, किसानों के लिए बिजली और जल सब्सिडी जैसे विवादास्पद राजनीतिक सुधारों को लागू करेगी।
यह वाकई दिलचस्प है कि मोदी ने छोटे किसानों का उदाहरण दिया, जिनका जीवन आर्थिक रूप से सरकारी सब्सिडी पर निर्भर है। उनका कहना था कि किसानों को बिजली में सब्सिडी दी जाती है, ताकि वे पंप के जरिये खेती के लिए पानी निकाल सकें। यह सब्सिडी तभी धीरे-धीरे वापस ली जा सकती है, जब किसानों के लिए सिंचाई के अन्य स्रोत विकसित किए जाएं। हालांकि सच यह भी है कि भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 'हर खेतों तक पानी' पहुंचाने का उल्लेख प्रमुख रूप से किया था। मगर यह रातोंरात पूरा नहीं किया जा सकता। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों से बिजली सब्सिडी भी रातोंरात वापस नहीं ली जा सकती। सच्चाई यही है कि भारत में आज भी लाखों किसान डीजल चालित पंप की सहायता से जमीन से पानी निकालते हैं। पिछले एक दशक में यह इसलिए बढ़ा है, क्योंकि रोजाना आठ से दस घंटे तक बिजली कटौती होती है। उत्तर प्रदेश में किराये पर डीजल पंप लेने के लिए छोटे किसान 70-80 रुपये प्रति घंटे खर्च करते हैं, जिससे स्वाभाविक रूप से उनकी फसल की लागत बढ़ जाती है।
लिहाजा किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी में सुधार संबंधी कोई भी फैसला खेती के इस कटु अर्थशास्त्र को समझे बिना नहीं होना चाहिए। जी-20 देशों ने अमेरिकी प्रस्ताव को स्वीकार कर खाद्य सब्सिडी में सुधार को लेकर भारत को असीमित समय देना कुबूल कर लिया है। यानी अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की मजबूती के लिए सरकारी खाद्य खरीद को लेकर वे भारत सरकार पर सवाल नहीं उठाएंगे। भारत के पास अब विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत कृषि क्षेत्र में सुधार करने का पर्याप्त समय है। लिहाजा मोदी सरकार को 50 करोड़ किसानों के अर्थशास्त्र पर गंभीरता से ध्यान देना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों के तहत उनका रहन-सहन किस तरह सुधारा जा सकता है। सरकार चाहे, तो विश्व व्यापार संगठन के मानदंडों के अनुसार किसानों को अप्रत्यक्ष नकद सब्सिडी दे सकती है। पर इसके लिए भी मौजूदा सब्सिडी ढांचे को नए सिरे से बदलने की जरूरत होगी। यह किसानों के साथ व्यापक बातचीत के बाद ही किया जा सकता है। जैसा कि मोदी ने जी-20 की बैठक में कहा कि ऐसे सुधार सहभागिता से होने चाहिए। लिहाजा उस एनडीए सरकार को जल्दी ही किसान वर्ग के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, जो दूसरी हरित क्रांति का मुद्दा लगातार उठा रही है। मगर दुर्भाग्यवश कृषि सुधारों को लेकर पिछले छह महीने से वर्तमान सरकार उदासीन ही दिखी है।
अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए मोदी का यह संदेश स्वागतयोग्य है कि भारत चुपके से सुधारों को लागू नहीं करेगा। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि आर्थिक सुधारों का मतलब सिर्फ शेयर बाजार को 'फील गुड' कराने संबंधी बड़े फैसलों की घोषणा नहीं है। शेयर बाजार उस भारतीय समाज में आर्थिक नीति निर्माण का दिशा-निर्देशक कतई नहीं हो सकता, जहां इतने गरीब रहते हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले दिनों उचित ही कहा था कि सुधार 'क्रमवत' प्रक्रिया है, और यह चंद 'सनसनीखेज विचारों' पर आधारित नहीं है। उन्हें यह बताना होगा कि उनकी बातें किस तरह जमीनी सच्चाई बनेंगी। आर्थिक सुधार के जन-केंद्रित होने संबंधी मोदी का बयान सही है, मगर पर्यावरण मंजूरी के कुछ उदाहरण, खासकर वन क्षेत्रों में खनन संबंधी फैसला बताता है कि प्रभावित लोगों के साथ सरकार ने पर्याप्त संवाद नहीं किए और न ही पारदर्शी तरीका अपनाया। ऐसे में यह आशंका बेबुनियाद नहीं कि बड़े व्यापार की व्यग्रता निर्णय लेने की प्रक्रिया को और केंद्रीकृत बना सकती है। इसी तरह, भूमि और श्रम कानून में बदलाव पारदर्शिता और लोगों की व्यापक सहभागिता की मांग करते हैं।
जी-20 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री का एक और स्वागतयोग्य कदम सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा करना था कि भारत की मंशा कर सूचनाओं के स्वतः आदान-प्रदान के वैश्विक मानदंडों का समर्थन करना है, ताकि विदेशों से काला धन वापस आ सके। इससे बड़े काले कारोबारियों पर शिकंजा कसेगा; जिनमें कुछ ऐसे उद्योगपति भी हैं, जिन्होंने चुनाव में चंदा दिया है। नरेंद्र मोदी के पास मौका है कि वह जन-केंद्रित और व्यापक बहस चलाकर राजनीतिक अर्थशास्त्र में पारदर्शिता ला सकते हैं। वित्त और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में राजनीतिक- आर्थिक सुधार तकनीकी विशेषज्ञों के भरोसे छोड़ने का कोई मतलब भी तो नहीं है।