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मोदी प्रधानमंत्री रहें यह उन्हें मंजूर नहीं
तवलीन सिंह
Updated Mon, 07 Dec 2015 10:43 AM IST
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राहुल गांधी पिछले सप्ताह जब लोकसभा में बोल रहे थे, तब प्रधानमंत्री राज्यसभा में बोल रहे थे, सो राहुल गांधी का भाषण मुझे बाद में सुनना पड़ा। मैंने ध्यान से उनका भाषण सुना। जब से गुजरात का यह चायवाला दिल्ली की गद्दी पर विराजमान हुआ है, तब से न सोनिया गांधी को उनका वहां होना स्वीकार है, न ही राहुल गांधी को। पिछला लोकसभा चुनाव हारने पर जब ये दोनों पार्टी मुख्यालय में आए थे, तो अपने संक्षिप्त वक्तव्य में सोनिया गांधी ने नई सरकार को बधाई दी थी नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना।
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उस समय मैं इंडिया टीवी के स्टुडियो में थी और मैंने रजत शर्मा का ध्यान इस ओर आकर्षित भी किया था। उसके बाद से मैंने सोनिया और राहुल गांधी का हर भाषण ध्यान से सुना है और ऐसा लगा कि उन्हें अब भी यह चायवाला स्वीकार नहीं है। पिछले सप्ताह राहुल गांधी ने फिर भाजपा सांसदों को संबोधित करते हुए कहा कि आपका आदमी जो आज भारत का प्रधानमंत्री है। क्या नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के प्रधानमंत्री नहीं हैं?
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ऐसा लगता है कि नहीं हैं। उन्हें यह भी लगता है कि मोदी ज्यादा दिन प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे, सो रोज उनके खिलाफ आंदोलन चलाया जाएगा।
इसकी शुरुआत तब हुई थी, जब भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सोनिया गांधी ने अपने सांसदों के साथ राष्ट्रपति भवन तक पदयात्रा की थी। उस समय राहुल गांधी बाहर थे। राजनीतिक अफवाहों के मुताबिक, तब उनमें गहरी निराशा थी, जिसे दूर करने वह म्यांमार गए थे विपश्यना करने। दो महीने बाद नई ऊर्जा लेकर वापस आए वतन और अगले दिन से आंदालन शुरू हुआ प्रधानमंत्री के खिलाफ। पहले उन्होंने किसानों का मुद्दा उठाया। राहुल गांधी ने कहा कि मोदी विदेशों में घूमने के लिए समय ढूंढते हैं, पर किसानों से मिलने के लिए उनके पास समय नहीं है।
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फिर उनका सूट-बूट वाला ताना आया। यह मुद्दा लंबा चलता, यदि जयराम रमेश ने वसुंधरा राजे पर झूठा आरोप न लगाया होता। जब यह आरोप झूठ साबित हुआ कि वसुंधरा राजे ने धौलपुर का महल हड़प लिया है, तब यह मुद्दा अपने आप कूड़ेदान में पहुंच गया। फिर व्यापम का मुद्दा उछाला गया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को दोषी ठहराने के लक्ष्य से।
जब साबित किया शिवराज सिंह चौहान ने कि व्यापम का घोटाला कांग्रेस के समय से चला आ रहा है, उनकी सरकार बन जाने के बाद इसकी जांच शुरू हुई है, तो इसे भी भुला दिया गया। वैसे भी भुला दिया जाता, क्योंकि तब तक मोहम्मद इकलाख को बेरहमी से मार दिया गया था दादरी में। मारने वाले हिंदू नौजवान थे, सो अंततः मिल ही गया सांप्रदायिकता का बड़ा मुद्दा, जिसे लेकर पुरस्कार वापसी का आंदोलन शुरू हुआ। बिहार चुनाव के समाप्त होते ही असहिष्णुता वाला मामला भी ठंडा होने लगा था कि आमिर खान ने इसे दोबारा जीवित कर दिया।
इन तमाम मुद्दों का विश्लेषण करें, तो साफ दिखेगा कि इनके पीछे असली मकसद मोदी को बदनाम करना था। सच यह है कि इससे देश बदनाम हुआ है, पर इसकी परवाह किसे है? लोकसभा चुनाव के बाद सोनिया और राहुल गांधी के जितने भी वक्तव्य आए हैं, उनमें उन्होंने साफ कहा है कि मोदी ने झूठ बोलकर जनता का दिल जीता है। इसे सच में तभी बदला जाएगा, जब जनता मोदी के बदले वापस लाएगी उस राजघराने को, जिसका दिल्ली की गद्दी पर आसीन होने का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिए सोनिया और राहुल गांधी उनके खिलाफ कोई न कोई मुद्दा लेकर सामने आते हैं।