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पाकिस्तान की लापता बच्चियां
राफिया जकारिया
Updated Sun, 05 Jul 2015 04:31 PM IST
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पाकिस्तान में लगभग हर औरत या तो इसकी गवाह रही है या शिकार हुई है। एक औरत, एक चाची, एक बहन गर्भवती होती है, तो सब यही चाहते हैं कि बेटा हो। इसलिए कुछ परिवारों को छोड़कर ज्यादातर परिवारों में बच्चियों का पैदा होना नुकसान ही है।
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इस सामाजिक शर्म को कुछ लोग जबर्दस्ती हंसकर या औपचारिकता में छिपाते हैं, तो कुछ दिखावे के शोक और उदासी में। पाकिस्तान में 105.7 लड़कों पर 100 लड़कियां हैं। दुनिया के जिन देशों में यह सामाजिक भेदभाव नहीं है, वहां लड़के-लड़कियों का अनुपात बराबर का है। पाकिस्तान के इस अनुपात को अगर प्रति दस लाख में देखें, तो यह फर्क और बड़ा होकर सामने आता है।
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बदले हुए इस दौर में तकनीक भी पितृसत्तात्मक समाज की मददगार बनी है। इसके जरिये गर्भ में शिशु के लिंग की शिनाख्त और हत्या होती है। एक गैर मुनाफे वाले संगठन पॉपुलेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2000 से 2014 के बीच यहां हुई कन्या भ्रूणहत्या का आंकड़ा करीब 12 लाख है। पाकिस्तान में सालाना गर्भपात का आंकड़ा 1,16,384 है। पाकिस्तान इस मामले में तीसरे नंबर पर है। चीन और भारत इस मामले में पहले और दूसरे स्थान पर हैं, जहां सालाना क्रमशः 8,00,000 और 6,00,000 गर्भपात होते हैं।
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औरतों का स्वास्थ्य पाकिस्तान में एक बड़ी समस्या है, जहां बच्चे पैदा करने, और खासकर बेटा पैदा करने की क्षमता उनके जीवन की गुणवत्ता पर भारी असर डालती है। औरतों के स्वास्थ्य से जुड़े पेशेवर लोग निजी बातचीत में बताते हैं कि जब किसी महिला के बच्चा पैदा न कर पाने का मामला सामने आता है, तो खुद उनके सामने कितनी मुश्किल स्थिति आ जाती है। चूंकि ऐसी स्थितियों में शादी टूटने का खतरा रहता है, ऐसे में वे औरतें डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ाती हैं कि वे उनकी 'अक्षमता' के बारे में उनके सास-ससुर को न बताएं। यानी बच्चा पैदा करने की क्षमता एक बड़ा और गंभीर मुद्दा है। ऐसे में, यह आश्चर्य नहीं कि पढ़े-लिखे परिवारों में भी बच्चा पैदा करने के बारे में गलत जानकारियां दी जाती हैं या सच्चाई छिपाई जाती है। गर्भपात चाहे किसी भी वजह से क्यों न किया गया हो, उसके बारे में कुछ बोलना मना है। इसी तरह इस बारे में भी कोई आंकड़ा नहीं है कि गर्भपात किन स्थितियों में कराया जाता है, और गर्भपात के बाद औरतों की जरूरी देखभाल होती भी है या नहीं। पाकिस्तान में माताओं के बदतर स्वास्थ्य को देखते हुए (गरीब औरतों की बड़ी आबादी की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच ही नहीं है), और यह जानते हुए कि उन्हें जोर-जबर्दस्ती तथा गाली-गलौज भरा जीवन बिताना पड़ता है, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे गोपनीय ढंग से गर्भपात कराती हैं, तथा इस क्रम में कुछ औरतों की जान भी जाती है। पाकिस्तान में लोगों का जीवन बहुत सस्ता है, औरतों का जीवन तो और भी सस्ता है।
उन मामलों में गर्भपात की दर पाकिस्तान में वियतनाम, मलयेशिया, अजरबैजान तथा दूसरे कई देशों से ज्यादा है, जिनमें गर्भपात का फैसला अभिभावक मिलकर करते हैं। इस मोर्चे पर आगे कोई उम्मीद नहीं दिखती, क्योंकि लड़कियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है (पाकिस्तान में शादीशुदा महिलाओं में से आधे की उम्र 20 से 24 साल है, और उनकी शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो चुकी थी), उन्हें प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की थोड़ी भी जानकारी नहीं होती, तिस पर उन्हें जोर-जबर्दस्ती करने वाले सास-ससुर और पति मिलते हैं, जो हर हाल में लड़का ही चाहते हैं। ऐसे में, इस तरह के गर्भपात के आंकड़े भविष्य में और बढ़ेंगे ही।
बच्चों के पालन-पोषण के बढ़ते खर्च के कारण भी गर्भपात का चलन तेज हुआ है। बढ़ते शहरीकरण ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। लड़के तो निवेश होते हैं, जिसके बदले में कुछ मिलना ही है। जबकि लड़कियों के बारे में यह बताया गया है कि वे हमेशा बोझ होती हैं।
क्या हमें उन 12 लाख लड़कियों के लिए दुखी होना चाहिए, जो पैदा होने से पहले ही मार डाली जाती हैं? हमारा सहज बोध और समानुभूति कहती है-हां। लेकिन पाकिस्तानी समाज की वास्तविकता को देखते हुए इस इच्छा का कोई मतलब नहीं है। धरती पर आने से पहले ही पाकिस्तान की अजन्मी बच्चियां इस या उस अल्ट्रासाउंड मॉनिटर पर जिस तरह मार डाली जा रही हैं, गायब होती लड़कियों का सालाना आंकड़ा सौ और हजार पार करते हुए जिस तरह लाख पर पहुंचा है, उसमें यह तय है कि एक न एक दिन आदमी इस कमी को महसूस करेगा। अभी पाकिस्तान की पहचान एक ऐसे मुल्क के तौर पर है, जहां बच्चियां गायब हो जाती हैं, जल्दी ही इसकी पहचान एक ऐसे देश के रूप में होगी, जहां औरतें दिखेंगी ही नहीं। जो लोग यह मान बैठे हैं कि अजन्मी बच्चियों को मार डालने से कुछ नहीं होगा, वे सब एक दिन सामूहिक महाविपत्ति का सामना करेंगे।