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मिसाइल राजनय का प्रदर्शन

r vikram singhआर विक्रम सिंह Updated Wed, 15 Jan 2020 04:07 AM IST
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ईरान में विरोध प्रदर्शन
ईरान में विरोध प्रदर्शन - फोटो : a
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पश्चिम एशिया में घटनाचक्र अचानक बहुत तेजी से घूम गया है। आईएसआईएस के उदय ने शक्ति-संतुलन की स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित किया था। बगदादी की इस्लामिक स्टेट से हुए गृहयुद्ध में इराक को अपने पुराने शत्रु ईरान से भी जबरदस्त सहयोग मिला। फिर युद्ध की तबाही ने इराक को ईरान के साथ संबंधों को बेहतर बनाने का अवसर दिया और ईरान की भूमिका शिया इराक में बढ़ती गई। अपनी आणविक महत्वाकांक्षा से बंधे हुए, अमेरिकी प्रतिबंधों से परेशान ईरान ने अपनी प्रतिक्रिया के विकल्पों के चयन में बड़ी गलती कर दी। अमेरिका के धैर्य की प्रशंसा की जानी चाहिए। पानी सिर से इतना ऊपर जाने के बाद यह मिसाइल हमला किया गया है। यह अब नए तरह की जंग है।
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जहां तक पश्चिम एशिया की राजनीति का सवाल है, वर्चस्व की इस जंग में मुख्यतः तीन या चार खिलाड़ी दिखाई देते हैं। सऊदी अरब के वर्चस्व को चुनौती ईरान से मिल रही है। सऊदी अरब के तेल कूपों पर प्रछन्न ड्रोन हमला सऊदी अरब ही नहीं, अमेरिका को भी एक चुनौती था। इससे पहले तेल टैंकर विवाद में दुनिया ईरान की दादागिरी की गवाह रही है। वर्चस्व की ईरानी महत्वाकांक्षा और विभिन्न देशों के आतंकवादी धार्मिक संगठनों-हमास, हिजबुल्लाह आदि को ईरान की शह एक बड़ा सरदर्द बन चुकी थी। आर्थिक प्रतिबंध ईरान को नियंत्रित कर सकने में नाकाफी सिद्ध हो रहे थे। अमेरिका-ईरान आणविक समझौता निष्प्रभावी होकर विवाद के दायरे में जा चुका था। अमेरिकी अड्डों पर ईरान समर्थित शिया मिलिशिया हमलों ने अमेरिका को इस सैन्य निर्णय के लिए बाध्य किया, जिसकी परिणति जनरल सुलेमानी की शहादत में हुई। ईरान ने अपनी जनता की संतुष्टि के लिए दो अड्डों पर मिसाइल हमले की प्रतिक्रिया की खानापूरी की। पहला बदला पूरा हो गया।

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह कह कर कि ईरान को आणविक हथियार नहीं बनाने देंगे, ईरान के आणविक रिएक्टरों, सुविधाओं पर हमले का अधिकार सुरक्षित रखा है। यह स्पष्ट है कि आशंका होते ही अमेरिकी उसके आणविक ठिकानों पर हमला करने से गुरेज नहीं करेंगे। ईरान के क्षेत्रीय वर्चस्व का नशा उतरा हुआ है। अब ईरान के सामने अपनी आणविक नीति को पुनः परिभाषित करने का समय आ गया है। ईरान के सामने भारत एवं यूरोपीय देशों के माध्यम से नए परमाणु समझौते की दिशा में आगे बढ़ना ही एकमात्र विकल्प है।

ईरानी इस्लामिक क्रांति के समय से ही हमने देखा है कि ईरान अपने धार्मिक लक्ष्यों को अपने राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखता आया है। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण आर्थिक विकास के प्रत्येक स्तर पर ईरानी पिछड़ते जा रहे हैं। अब उन्हें इसका एहसास होगा कि इन प्रतिबंधों से मुक्ति कितनी आवश्यक है।

अमेरिका ने इस हमले से पश्चिम एशिया में सऊदी अरब की स्थिति को सुरक्षित किया है। वार्ताएं ही पर्याप्त नहीं होतीं। शक्ति का समुचित प्रदर्शन राजनय को सार्थक बना देता है। शक्ति के इस ट्रंप सिद्धांत का प्रभाव हम आगे भी पश्चिम एशिया में देखेंगे। तीसरी महत्वाकांक्षी शक्ति तुर्की है, जिसने अपनी आणविक महत्वाकांक्षाओं को अभी गहरे दबा रखा है। पाकिस्तान के साथ प्रगाढ़ हो रहे संबंधों की भूमिका मूलतः तुर्की की परमाणु तकनीक प्राप्त करने की आकांक्षा से बन रही है। वह नाटो संधि का देश है, लेकिन इन दिनों उसका आचरण गैर नाटो देशों जैसा होता जा रहा था। आईएस का गुप्त सहयोगी रहा तुर्की अपने आटोमन साम्राज्य के इस्लामी वर्चस्व के ख्वाब  से मुक्त नहीं है। कमाल अतातुर्क का धर्मनिरपेक्ष तुर्की इस्लामीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सऊदी प्रिंस सलमान के प्रयासों से सऊदी अरब में परिवर्तन की हवाएं चलनी शुरू हुई हैं। खुलापन आ रहा है। महिलाओं को अधिकार दिए जा रहे हैं। उसके बरक्स ये दो क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी- ईरान और तुर्की मध्यकालीन इस्लाम की तरफ बढ़ रहे हैं। शायद मुस्लिम उम्मा के नेतृत्व का यही एक रास्ता है। अगर अफ्रीका-एशिया के इस्लामिक आर्क को देखें, तो इस्लामी राज्यों की यह शृंखला धुर पूर्व में पाकिस्तान पर आकर रुक जाती है। अपने परमाणु हथियारों के जखीरे के बावजूद पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन में पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं है। वह अपनी भूमिका की तलाश में अपने पूरब लोहे की भारतीय दीवार से टकराता रहता है। चूंकि पाकिस्तान ने एक राज्य के रूप में अपने लिए भारत विरोध का असंभव-सा लक्ष्य तय कर रखा है, इसलिए उसकी कोई उपयोगी भूमिका किसी के लिए भी नहीं बन पाई है। आतंकवाद की शरणस्थली बन जाने के कारण अपने क्षेत्र और दुनिया में पाकिस्तान की कहीं कोई भूमिका नहीं बन सकी है। हां, सोवियत संघ के दिनों में अमेरिका इसे मात्र भारत पर दबाव बनाने के लिए एक नकारात्मक भूमिका में इस्तेमाल करता रहा है। आज जब भारत से अमेरिकी संबंध बेहतर होते जा रहे हैं, तो पाकिस्तान की भूमिका सीमित होकर अफगानिस्तान में अमेरिकी चौकीदारी भर की रह गई है। चीन के साथ पाकिस्तान के संबंधों को परिभाषित किया जाना शेष है। वैसे इसका कोई प्रभाव पश्चिम एशिया की राजनीति पर नहीं है। पश्चिम एशियाई राजनीति की महत्वपूर्ण धुरी इस्राइल रहा है। लगभग समस्त अरब देशों का नीतिगत लक्ष्य इस्राइल का समापन रहा है। लेकिन कैम्प डेविड मिस्र-इस्राइल समझौते के बाद समीकरण बदलते गए। शक्तिशाली इस्राइल से कोई इस्लामिक देश उलझना नहीं चाहता। सऊदी अरब से इस्राइली संबंध तेजी से सुधार पर है। तुर्की और ईरान के विदेश-रक्षा नीतियों के केंद्र में इस्राइल विरोध है, जो उनकी आंतरिक राजनीति में काम आता है।

अमेरिकी हमले के इस सुलेमानी एपिसोड के बाद पश्चिम एशिया की बिसात पर इन चारों खिलाड़ियों में से कोई ऐसा नहीं रह गया है, जो फिर किसी खतरनाक चाल का आगाज करे। यह संभव नहीं लगता कि कोई देश इस यथास्थिति को आगे लंबे समय तक भंग करने का प्रयास करेगा। एक मिसाइल हमले से अमेरिका ने अपनी खो रही 'बिग ब्रदर' की हैसियत पुनः प्राप्त कर ली है।
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