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प्रवास पर टिकी बुनियाद

Tue, 25 Dec 2018 06:39 PM IST
Nootan Gupta बद्री नारायण
बद्री नारायण Published by: Nootan Gupta Updated Tue, 25 Dec 2018 06:39 PM IST
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Migration is Foundation
प्रवासियों पर राजनीति
इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप से लेकर कमलनाथ तक, अपने समाज की बढ़ती बेरोजगारी के लिए प्रवासियों को दोष देने का रिवाज चल पड़ा है। यह एक प्रकार से जिम्मेदारी निभाने में अपनी विफलता का ठीकरा किसी दूसरे के सिर पर फोड़ कर मुक्त होने के एहसास जैसा है।

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अमेरिका, फ्रांस और नीदरलैंड्स जैसे मुल्क वैश्वीकरण का मजा तो लूटना चाहते हैं, किंतु वैश्वीकरण की प्रक्रिया में ही अपने मुल्कों में आ रहे श्रमिक बहाव की गति से बचना चाहते हैं। ये इन कामगारों का, चाहे वे आईटी सेक्टर के हों या घरों में काम करने वाले श्रमिक हों, लाभ तो लेना चाहते हैं, परंतु उनकी कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं। इसके लिए अपने समाज के आर्थिक संकट के लिए दोष बाहर से आने वाले प्रवासियों पर मढ़ा जाता है। साथ ही इसके लिए जातिगत या एवं नस्लीय तर्कों का उपयोग कर अस्मितापरक उग्र उभारों को हवा भी दी जाती है।

तर्क यह गढ़ा जाता है कि बाहर से आकर ये प्रवासी हमारे समाज के श्रम एवं रोजगार के अवसरों को अधिग्रहीत कर ले रहे हैं, फलतः हमारे यहां के युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। ऐसा ही तर्क हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने व्यक्त किया है, जिस पर विवाद जारी है।

न केवल रोजगार पर कब्जा, बल्कि प्रायः हरेक विपत्ति के लिए प्रवासियों को ही दोषी माना जाता है। चोरी हो, हिंसा हो, प्रायः प्रवासियों को ही शक की निगाह से देखा जाता है। कई जगह तो उन्हें उन समाजों में 'डर्ट' (गंदगी) के रूप में देखा जाता है। प्रवासियों में दिख रहा 'अदरनेस' (भिन्नता) हम स्वीकार नहीं कर पाते। हम चाहते हैं कि हमारे समाज में जो भी हो, हमारे जैसा ही दिखे। इसलिए फ्रांस में सिखों की पगड़ी नागवार लगती है, वहीं नीदरलैंड्स में तुर्की की महिलाओं के बुर्के को शक की निगाह से देखा जाने लगता है।

मुंबई, सूरत और बंगलूरू में उत्तर भारतीयों को अपनी समस्या का कारण माना जाने लगता है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे प्रवासियों की भाषा, संस्कृति, रहन-सहन की इसी विविधता को बर्दाश्त नहीं कर पाने के कारण उन्हें मात्र मराठी में संवाद करने की सीख देने लगते हैं। विविधता समाज की शक्ति होती है, इसे खत्म करना समाज को अधिनायकवाद के रास्ते पर ले जाने जैसा होता है।

प्रवसन समाजों को अनेक संस्कृतियों एवं विविधताओं को देखने, सुनने और महसूस करने का अवसर देता है। हमें विविधताओं को जीने योग्य एक सामाजिक मानुष में तब्दील करता है। यह हमें ज्यादा से ज्यादा मानवीय बनाता है। साथ ही प्रवसन के कारण संबंधित देश या प्रदेश में ऐसा बहुलरूपी समाज बनता है, जिसमें एकरसता नहीं रह जाती।

कोई भी समाज प्रवसन की प्रक्रिया में ही बनता है। अगर आप सामाजिक बसाव का इतिहास देखें, तो सभी कभी न कभी, कहीं न कहीं से आए ही होते हैं। सभी बसे हुए जन प्रवासी ही होते हैं। इसीलिए 'मूल निवासी', आदिम निवासी की अवधारणा समाज वैज्ञानिक के बीच सदा से ही सवालों के घेरे में रही है। इसलिए अपने को मूल निवासी मानकर दूसरों को वहां से निकालने की बात करना मात्र राजनीति है, इसका कोई तार्किक आधार नहीं है।

पिछड़ी जगहों से लोग रोजी-रोटी की तलाश में अर्द्ध विकसित कस्बों एवं शहरों की ओर जाते हैं, अर्द्धविकसित जगहों से प्रवासी विकसित जगहों की ओर, विकसित जगहों से अति विकसित शहरों की ओर जाते हैं। यही श्रमशक्ति ही 'मेट्रो पोल' को बनाती है, जो संबंधित समाज में अति आधुनिक सुविधाओं को निर्मित करने, उन्हें बनाए रखने में अपना खून-पसीना चुआती है। ऊंचे महल, बहुमंजिला अपार्टमेंट, मॉल, सड़क, मेट्रो परिवहन ये सब प्रवासी श्रमिक ही बनाते हैं। दुनिया के बड़े समाज वैज्ञानिकों के निर्देशन में 2005 में बनी वर्ल्ड ह्यूमन डेवलेपमेंट रिपोर्ट माइग्रेशन के प्रश्न पर बनी थी।

दुनिया के अनेक मुल्कों में प्रवसन पर किए गए अध्ययन के आधार पर इस रिपोर्ट ने प्रवासियों के बारे में बनने एवं बनाए जाने वाले अनेक मिथकों को आंकड़ों के माध्यम से ध्वस्त कर साबित किया था कि प्रवासी जहां बसते हैं, वहां के समाज के आर्थिक विकास, रोजगार के अवसरों के निर्माण, आधारभूत सुविधाएं निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये प्रवासी फ्रांस, नीदरलैंड्स, अमेरिका जैसे मुल्कों में गंदगी फैलाने का कारण नहीं बनते, बल्कि इन मुल्कों के महानगरों को साफ-सुथरा करते एवं रखते हैं। इन सारे मुल्कों में ज्यादातर सफाई कर्मी प्रवासी ही हैं। 

यूरोप एवं अमेरिका की सारी समृद्धि प्रवासियों के श्रम से ही निर्मित हुई है। यूरोपीय आधुनिकता के लिए धन उपनिवेशों से आए हैं, उपनिवेशों में मालिकों के गन्ना, चावल, कोको की खेती में भारत, इंडोनेशिया तथा अफ्रीकी देशों से लाए गए श्रमिकों ने ही तीव्रगति से उत्पाद को बढ़ाया था, जो यूरोप में औद्योगिक विकास का कारण बन पाया था। मुंबई, कोलकाता, नोएडा, फरीदाबाद, सूरत के आर्थिक जीवन का अगर विश्लेषण करें, तो साफ जाहिर होता है कि बिना प्रवासियों के यहां का आर्थिक व्यापार चल नहीं सकता। उनके बिना यह चरमरा कर गिर जाएगा।

क्या डोनाल्ड ट्रंप से लेकर उद्धव ठाकरे एवं कमलनाथ तक को दैनंदिन जीवन में दिखने वाली इन सच्चाइयों का भान नहीं है या इसके पीछे राजनीतिक खेल है। शायद यह एक प्रकार के उन्मत्त उपराष्ट्रीयताओं की राजनीति करने की एक कोशिश है, जिससे अस्मिता की राजनीति उभरती है। यही अस्मिता की राजनीति सुलगते हुए आगे बढ़कर पक्ष एवं विपक्ष में राजनीतिक गोलबंदी का करण बनती है।

यही राजनीतिक गोलबंदी आगे चलकर चुनावी मौसम में कई बार वोटों की लहलहाती फसलों में तब्दील होती है। अस्मिताओं की राजनीति का मूलाधार है, माटी पुत्र की अवधारणा, जिसे मूल निवासी, आदिम निवासी भी कहा जाता है।

जबकि अगर कोई भी अपने गांव, कस्बा एवं शहर के बसाव का अध्ययन करे, तो पता चलता है कि सभी कभी न कभी इतिहास के किसी न किसी मोड़ पर प्रवास करके ही आए हैं। कारवां आता गया, एवं बस्तियां बनती गईं। 

लेखक, गोबिंद बल्लभ सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के निदेशक हैं
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