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हिंदी खेल प्रसारण के मसीहा

Thu, 27 Sep 2018 06:46 PM IST
प्रकाश भंडारी
प्रकाश भंडारी Updated Thu, 27 Sep 2018 06:46 PM IST
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Messiah of Hindi Sports broadcast
जसदेवसिंह

और लंबी सिटी बज गई तथा भारतीय हिंदी खेल प्रसारण के मसीहा की आवाज थम गई। 87 वर्ष के जसदेव सिंह के निधन से भारतीय खेल प्रसारण को अपार क्षति हुई है। साठ के दशक में जब खेलों की कमेंटरी केवल क्रिकेट और वह भी अंग्रेजी तक सीमित थी, तब जसदेवसिंह, रवि चतुर्वेदी, सुशील दोषी, जोगाराव और रमेश श्रीवास्तव ने हिंदी कमेंटरी के शुरुआती दौर में उसे अमली जामा पहनाया। वैसे आकाशवाणी, कलकत्ता से हिंदी से बहुत पहले बांग्ला भाषा में कमेंटरी करने की शुरुआत हो चुकी थी। बांग्ला में कमेंटरी की शुरुआत और उसकी सफलता को देखते हुए 1960 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा हिंदी में कमेंटरी को प्रोत्साहन देने की योजना बनाई गई। आकाशवाणी के उच्चाधिकारियों को संदेह था कि खेलों के हिंदी प्रसारण को खेलों के नियम और शब्दावलियों के अंग्रेजी रूप के कारण सफलता मिलेगी या नहीं। हिंदी के आरंभिक कमेंटरेटरों ने इसका रास्ता निकाला। पुरानी दिल्ली के क्रिकेट प्रेमी तब बॉलर को गेंदबाज और बैट्समैन को बल्लेबाज कहते थे। इसी प्रकार 100 रन या सेंचूरी बनाने वाले बल्लेबाज को सैकड़ा कहते थे। रवि चतुर्वेदी ने ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग हिंदी कमेंटरी में किया।


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1960-61 में टेड डैक्सटर के नेतृत्व में इंग्लैंड की क्रिकेट टीम आई थी। कानपुर में टेस्ट मैच था, आकाशवाणी लखनऊ ने फैसला किया कि प्रसारण हिंदी में किया जाए। दिल्ली में तब विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रवि चतुर्वेदी, इलाहाबाद के जोगा रॉव और कानपुर के रमेश श्रीवास्तव ने पहली बार पूरे टेस्ट मैच के पांचों दिन अलग से हिंदी कमेंटरी की। उस दिन हिंदी खेल प्रसारण का विधिवत जन्म हुआ।

आगे चलकर हिंदी और अंग्रेजी का बारी-बारी से प्रसारण हुआ और यहीं से हिंदी खेल प्रसारण की शृंखला शुरू हुई। टोकियो ओलंपिक की कमेंटरी को जसदेवसिंह के तीव्र प्रवाह और भाषा की सरलता के कारण खूब सराहा गया। सुदूर दक्षिण में भी हिंदी की हॉकी कमेंटरी को खेल प्रेमियों ने सुना। टोकियो ओलंपिक में भारत ने पाकिस्तान को परास्त कर पुनः स्वर्ण पदक जीता। इस पूरे मैदानी दृश्यों को टोकियो के मैदान से रनिंग कमेंटरी के जरिये अपनी जादुई आवाज से जिस तरह जसदेवसिंह ने बयां किया उस दिन हिंदी की खेल कमेंटरी स्थापित हुई। आगे चलकर इसे जसदेवसिंह की अमरवाणी ने और समृद्धि दी।
जसदेवसिंह अपनी हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा शैली, मैदान के मंजर को बयां करने का अनूठा अंदाज और गेंद के साथ-साथ तीव्रता और वेग से चलकर आंखों देखा हाल ऐसे सुनाते थे, जैसे महाभारत काल में संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को सुनाया करते थे। जसदेव रेडियो युग के संजय के रूप में पहचाने लाने लगे। रेडियो युग की समाप्ति के बाद हिंदी कमेंटरी जब टेलीविजन तक पहुंची, तो जसदेवसिंह हिंदी कमेंटरी के पर्याय माने जाने लगे थे।

गणतंत्र दिवस परेड, स्वतंत्रता दिवस, सैनिक परेड, विभिन्न शासकीय समारोहों और राजनेताओं की अंतिम यात्रा आदि के सजीव प्रसारण से जसदेवसिंह को प्रसिद्धि मिली। टीवी प्रसारण में भी जसदेवसिंह रेडियो की तरह सफल रहे। जसदेवसिंह ने भौंपू से जयपुर में होने वाले खेलों की कमेंटरी शुरू की थी। जयपुर के इस लाडले ने नौ ओलंपिक खेलों, आठ विश्व कप हॉकी और छह एशियाई खेलों के अलावा देश-विदेश से क्रिकेट की कमेंटरी की। पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित जसदेव की वाणी को खेल प्रसारण में उनके योगदान को देखते हुए ओलंपिक के सबसे बड़े सम्मान ‘ओलम्पिक ऑर्डर’ से नवाजा गया। जसदेवसिंह ने हिंदी खेल प्रसारण को जो सम्मान दिलाया, उसका परिणाम यह हुआ कि आज सभी बड़े खेल प्रसारण हिंदी में किए जाते हैं।

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