पुरुष भी हैं गैरबराबरी का शिकार
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इस साल आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पुरुष-अधिकार की एक खामोश-सी आवाज खास तौर से सोशल मीडिया पर इस आशय के साथ उठी कि आखिर दुनिया अंतरराष्ट्रीय मर्द दिवस कब मनाएगी। गूगल ट्रेंड्स के मुताबिक आठ मार्च की सुबह ब्रिटेन में तो यह एक गर्मागर्म विषय था और लोग इसे सबसे ज्यादा सर्च कर रहे थे। सोशल मीडिया पर हाल में उठी इस बहस या सवाल के साथ चर्चित कॉमेडियन रिचर्ड हेरिंग का एक जवाब भी चर्चा में है, जो दावा करते हैं कि 1999 के बाद से छिटपुट स्तर पर दुनिया में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय मर्द दिवस मनाया जाता है। हेरिंग पुरुष अधिकारों की रक्षा के लिए ‘गोफंडमी’ नामक अभियान भी चलाते हैं, जिसके जरिये वे पैसा जुटाकर पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी आत्महत्याओं की रोकथाम जैसे मसलों पर लोगों की मदद करते हैं।
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बहरहाल, पुरुषों के अधिकार की यह बहस इस सवाल के साथ आगे बढ़ती है कि जब यह दुनिया अकेले मर्दों की बनाई नहीं है, महिलाओं की भी इसमें बराबर की भागीदारी है, तो पीड़ित के रूप में सिर्फ महिलाओं पर ही विचार क्यों किया जाता है। क्या मर्द को कभी दर्द नहीं होता, इत्यादि।
एकाध साल पहले सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के दो सांसदों ने उत्तर प्रदेश में यह मांग उठाई थी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर सांविधानिक हैसियत वाला राष्ट्रीय पुरुष आयोग भी बने। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बारे में पत्र भी लिखा था। इन्हीं में से एक सांसद (हरिनारायण राजभर) ने यह दावा भी किया था कि आज की तारीख में पत्नी प्रताड़ित कई पुरुष जेलों में बंद हैं, लेकिन कानून के एकतरफा रुख और जगहंसाई के डर से वे अपने ऊपर होने वाले घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। कई तो आत्महत्या तक करने को विवश हैं।
हालांकि इस मामले में एक बड़ी सच्चाई यह है कि हमारे देश में अभी तक ऐसा कोई सरकारी अध्ययन या सरकारी सर्वेक्षण नहीं हुआ है, जो यह पता लगाए कि मर्द भी घरेलू हिंसा के शिकार होते हैं। एनजीओ ‘सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन‘ और ‘माई नेशन‘ के एक ऑनलाइन शोध में यह बात सामने आई कि देश के 98 फीसदी भारतीय पति तीन साल की रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके हैं। इसकी रिपोर्ट में बताया गया कि जब पुरुषों ने पत्नी और उसके मायके वालों की ओर से घरेलू प्रताड़ना-हिंसा से जुड़ी अपनी समस्याओं के बारे में बताना चाहा तो कोई सुनने को ही तैयार नहीं हुआ। इसके विपरीत सभी ने उन्हें हंसी का पात्र बना दिया।
पुरुष आयोग की मांग के समर्थन में जो कई तर्क दिए जाते हैं, उनमें एक यह है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के जो कानून बने हैं, उनके दुरुपयोग से मर्दों को प्रताड़ित किया जाता रहा है। इसकी एक बड़ी मिसाल धारा 498-ए है। अमेरिका के जिस कानून से प्रेरित होकर धारा 498-ए बनाई गई, वह अमेरिकी कानून जेंडर निरपेक्ष है और उसमें पुरुषों की प्रताड़ना के मामले भी समानता से देखे जाते हैं। दहेज प्रताड़ना का यह कानून किस स्तर तक एकतरफा है, इसका उदाहरण कुछ साल पहले यह मिला था कि 498-ए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों में से 94 फीसदी लोग (प्री और पोस्ट ट्रायल में) दोषी नहीं पाए गए। यही नहीं, ट्रायल पूरा होने के बाद 85 फीसदी दोषी नहीं पाए गए, लेकिन इन्हें भी बिना किसी जांच के गिरफ्तार किया गया था।
यह सही है कि हमारे देश में सदियों से एक परिपाटी के रूप में महिलाएं हर स्तर पर पुरुषों के मुकाबले कई तरह की प्रताड़नाएं झेलती रही हैं, लेकिन ऐसी समस्याएं कुछ पुरुषों की भी हो सकती हैं- इस बारे में भी अब विचार की जरूरत बनती है।