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चीन में कुमारजीव की स्मृतियां, बौद्ध मत की धारा को नई दिशा दी थी

Sun, 24 Nov 2019 06:34 AM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Sun, 24 Nov 2019 06:34 AM IST
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Memories of Kumarajiva in China, New direction was given to the stream of Buddhism
कुमारजीव - फोटो : twitter

किसी भी देश का सबसे बड़ा अभिशाप स्मृतिलोप होता है, और औपनिवेशिक दासता का पहला परिणाम अतीत के गौरव तथा महापुरुषों को भुलाए जाने में प्रकट होता है। विदेशी शासकों की भाषा, उनके लेखन और सम्राटों के प्रति अनुराग 'दास मानस' का प्रतीक है जो आज भी दिखता है।


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किसी भी देश का सबसे बड़ा अभिशाप स्मृतिलोप होता है, और औपनिवेशिक दासता का पहला परिणाम अतीत के गौरव तथा महापुरुषों को भुलाए जाने में प्रकट होता है। विदेशी शासकों की भाषा, उनके लेखन और सम्राटों के प्रति अनुराग 'दास मानस' का प्रतीक है जो आज भी दिखता है।

चीन का 'बौद्ध मन' कुमारजीव को भुलाए जाने के पीछे शायद यही कारण रहा हो। चौथी शती (ई) के इस युवा बौद्ध भिक्षु के पिता कुमारायन, श्रीनगर के निकट हरवन निवासी थे, जिनका विवाह कुचा (सिंक्यिांग की काशी या कश्गर के पास) की राजकुमारी जीवा या जीवा से हुआ था।

दोनों ने अपने अपने नाम का अर्द्धांश अपने पुत्र को देकर नाम रखा- कुमारजीव। यही कुमारजीव कश्मीर में बौद्ध मत के ग्रंथों का पारायण कर चीन गए तथा अनेक संघर्षों, कारावास से गुजरते हुए चीन के राष्ट्र गुरु के पद पर अभिषिक्त हुए।

उन्होंने चीन में बौद्ध मत की धारा को नया रूप, अर्थ और दिशा दी तथा चीन के समाज को गढ़ने वाले कहलाए। वे वेदांत तथा बौद्ध ग्रंथों के आचार्य थे। उन्होंने मूल संस्कृत बौद्ध ग्रंथोंके शास्त्रीय चीनी भाषा में अनुवाद बहुस्तरीय (कुछ विद्वानों के अनुसार 26 स्तरीय) पद्धति विकसित की, ताकि संस्कृत ग्रंथों के शब्दानुवाद को समझे बिना रटते जाने के बजाय समाज चीनी समाज सहज, सरल, सुगम चीनी में उन ग्रंथों के वास्तविक भाव को ह्रदयंगम कर सके। कुमारजीव की कथा अद्भत और रोंगटे खड़ी कर देने की हद तक रोमांचक है।

आज भी चीन के मानस पर युवा-वृद्ध सहित कुमारजीव का प्रभाव दिखता है। चीनी भाषा में कुमारजीव को चमोलि'शव यानी प्राचीन चीनी भाषा के अनुसार अनिंद्य, अनन्य प्रभायुक्त, कहा जाता है, परंतु कुमारजीव, यह नाम भी प्रचलित है। कुमारजीव के जीवनपथ से जुड़े स्थानों पर उनके नाम से बड़े भव्य मंदिर हैं, मठ हैं, स्मारक तथा बौद्ध विहार-पगौडा बने हैं, जहां चीनी बौद्ध भिक्षु ऊं मणि पद्मे हुं तथा त्रिपिटक बौद्ध ग्रंथ के मंत्रों से पूजा करते हैं।

गत दस वर्षों से मैं कुमारजीव के जीवन का अध्ययन कर रहा था और बहुत इच्छा थी कि जिस पथ से कुमारजीव चीन गए उसका अनुसरण करते हुए मैं एक नवीन वृत्तांत लिखूं। चीन के गहन अध्येता एवं भारत-चीन ज्ञान संपदा के महान आचार्य डॉ लोकेश चंद्र एवं निर्मला शर्मा व शशिबाला द्वारा कुमारजीव पर लिखित ग्रंथों ने यह काम और करणनीय बना दिया।

इंदिरा गांधी कला संस्कृति केंद्र ने 2011 में कुमारजीव पर वैश्विक सेमिनार किया था, जिसमें चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड जैसे देशों से आए विद्वानों ने कुमारजीव के जीवन तथा विचारों पर प्रबोधन किया था।

पर विडंबना देखिए कि भारत की पाठ्य पुस्तकों में व्हेन सांग और फाह्यान के बारे में तो पढ़ाया जाता रहा, जो चीन से भारत आए थे और जिनके यात्रा वृत्तांतों में तत्कालीन भारत की महान विरासत के दर्शन होते हैं। किंतु जो भारतीय आचार्य चीन गए, वहां के मानस को बदला, हिमालय की ऊंचाइयों तथा बर्फानी रेगिस्तान पार किए, भाषा-भूषा के भेद दूर किए, सुदूर एक अत्यंत भिन्न समाज को बौद्ध मत में दीक्षित किया, उनके बारे में भारत की किसी भी पाठ्य पुस्तक में एक पंक्ति भी कहीं नहीं लिखी गई।

हमें दस वर्षों की साधना और जिद के बाद इस वर्ष अवसर मिला कि कुमारजीव के जीवन-पथ से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण स्थानों की यात्रा कर सकें। चीन का सुप्रसिद्ध विशाल सिचुआन विश्वविद्यालय इस यात्रा हेतु स्थानीय सहयोग तथा मार्ग दर्शन के लिए तैयार हो गया। भारत के संस्कृति व पर्यटन राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल और विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने इस यात्रा को समर्थन दिया। इस यात्रा में युवा सांसद तेजस्वी सूर्य भी साथ थे।

कुमारजीव का जन्म 344 से 350 ई. का माना जाता है। सात वर्ष की आयु में ही वह अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण प्रसिद्ध हो गए थे। उन्हें हजारों बौद्ध सूत्र कंठस्थ थे। उनकी मां को युवावस्था में ही वैराग्य हो गया।  पर बौद्ध भिक्षुणी बन भारत जा बसने से पूर्व उन्होंने अपने पुत्र को चीन में बौद्ध मत प्रसारित करने का निर्देश दिया।

हमारे साथ सिचुआन विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों यान शिजिंग, लियु च्यावेई, जेंग शियांग्यु तथा हे चीवेई और तीन शोध छात्र थे। कुल 1,150 किलोमीटर की यह यात्रा तुएनहांग में श्वेत अश्व पगोडा, लांचाऊ, चियाउगान, भोगाओ गुफाएं, कुवेई में कुमारजीव मंदिर (जहां वे 17 वर्ष रहे) चाओतांग मंदिर, कुमारजीव की समाधि (जहां 70 वर्ष की आयु में उनको निर्वाण प्राप्त हुआ) सरीरा स्तूप से गुजरते हुए शिआनमें ह्वेंगसान के स्मारक मंदिर तक पहुंची।

यह यात्रा उस चीन से भी परिचित करा पाई जो अभी तक अपरिचित ही था- धार्मिक तथा भारत के प्रति अनन्य प्रेम रखने वाली अंतर्धारा का चीन। हर क्षेत्र में भारत, संस्कृत, हिंदू संबंधों की छाप दिखती है। गोंगचाऊ के पास काइयुआन मंदिर में महावीर हाल है, जहां शिव, लक्ष्मी, नरसिंह, बाल कृष्ण के बहुत सुंदर तमिल शैली के प्रस्तर चित्र व मूर्तियां हैं।

पहली बार चीन आए तेजस्वी सूर्य ने कहा, 'चीन आकर मुझे नए भारत के दर्शन हुए।' चीन में भारत दर्शन का भाव बढ़ना चाहिए, अमेरिका, यूरोप चाहे छूट जाए पर जहां हमारे पूर्वजों ने संस्कृति के सेतु बांधे और वे आज भी पूजित हैं, वहां जाने का प्रयास जरूर करें। कुमारजीव यही सिखा गए हैं।  
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